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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

घट रामायण / १०५
सुनो! उसी मन को ब्रह्म कहा गया है और उसी का नाम निरंजन जाना जाता है। निरंजन की ज्योति
यही कही जाती है और ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उसके पुत्र हैं॥
उसी ने ही पिंड एवं ब्रह्मांड की रचना कर रखी है-सातों द्वीप तथा नवों खण्ड की उसी के रचे हुए
हैं। इनको निरंजन रूप ज्योति समझो। सन्तों ने उन्हीं को 'काल' कहकर बखाना है॥
यम के सहायक इस काल ने संसार में (मृत्यु का) जाल डाल रखा है और जैसे निषाद या
मल्लाह जाल में मछली पकड़ कर मार डालते हैं, वैसे काल भी (सबका विनाश करता है) काल ही
निरंजन के दसों अवतार है और उसने जीव को सांसारिक कर्म जाल में बांध रखा है॥
तीर्थ, नियमाचरण, व्रत एवं ब्रह्म का कर्म भाव माना जाता है। जिस राम का यह संसार निरन्तर
जाप करता रहता है, वह बार-बार इस भवसागर में बार-बार भ्रमित होता है॥
सारा संसार अंधा (अंद-अंध) है, उसे यह भवसागर का बंधन (फंद) सूझता नहीं, सामने रहते
हुए भी उसे देख नहीं पा रहा है, वह अन्धा हो गया है॥
॥दोहा॥
आदि अंत का भेद कह तुलसी देखा सही।
लेखा अगम अलेख लखि अगाध अदबुद कहा॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने आदि अन्त का भेद सही-सही देखा है, उस अकथनीय और
अलक्ष्य को मैंने देखा है-और उसे देखकर ही मैं उसकी अगाध एवं अद्भुत कथा कह रहा हूँ॥
॥छन्द॥
तुलसी गति गाई अगम सुनाई। सुन्न सुन्न भिन्न भिन्न कही॥
जस जस जेहि लेखा निज निज देखा। आदि अन्त गति सार भई॥
संतन गति गाई महुँ पुनि पाई। जो उतपति सब आदि भई॥
जिनही जिन जानी सबहि बखानी। तुलसी उनके लार लई॥
अर्थ-तुलसी ने अगम्य तत्त्व के ज्ञान को गाकर सुनाया और शून्य के भिन्न-भिन्न रूपों का वर्णन
किया। अपने प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा जिसे-जिस-जिस रूप में देखा-मैंने आदि अन्त से युक्त उनके सार
तत्त्व का वर्णन किया॥
जो इनकी अनादिमयी उत्पत्ति है, उसकी गति का गान सन्तों ने किया। जिन-जिन्होंने इसे समाया,
उन्होंने इसका वर्णन किया है-तुलसीदास तो उनके प्रेम में डूबे हुए हैं॥
॥सोरठा॥
सब में कहा विचार सार पार गति पाइकै।
बूझै बूझनहार जिन में चाखा अगम रस॥१॥
तुलसी तिरन समान अगम भान घटि लखि परा।
सूझा निज घर धाम यह अनाम गति यों कही॥२॥
अर्थ-उस सार तत्त्व के उस पार उसके ज्ञान को प्राप्त करके, सबमें उसके प्रति क्या विचार हैं-
उसका वर्णन कोई बूझने वाला ही कर सकता है और विशेष कर वह जिसने उस अगम के रस के सार
तत्त्व को चख लिया है॥१॥
इस घट में वह अगम्य ज्ञान सूर्य तृण के समान दिखाई पड़ा है-उसी से यह आत्मगृह सुझाई पड़ा है,
उस (सन्त ही) ने उस अनाम की गति को इस प्रकार वर्णित कर सकता है॥२॥