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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

१०६ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
नभ घट भूमी भान दिखाना। लखि लखि लखा भेद जिन जाना ॥
अर्थ-आकाश में, घट में तथा भूमि में सूर्य दिखाई पड़ा-जिन्होंने इसके भेदों को जाना है-उसे
बार-बार देखकर समझा है॥
॥ सोरठा ॥
घट भूमी बिच भान, जानि भेद भिन जिन कही।
सखि सुन देस बयान, रमक रीति उलटी लखी ॥
अर्थ-घटाकाश की भूमि के बीच में सूर्य है-जिनके भेदों को समझकर सन्तों ने भिन्न भिन्न रूपों में
कहा है। हे सखी! उस देश का वर्णन सुनों-वहाँ की व्यवस्था रीति (रमक रीति) उल्टी दिखाई पड़ती
हैं॥
॥ कहेरा ॥
सुन हो सखी इक दिसवा। भूमी ऊगै भान।
दिसवा की उलटी रीति। साधू पालै प्रीति॥ टेक ॥
मछरी गगन पर गाजा। चंदा चुनै नाम।
दिसवा उरध-मुख कुइया। गइया चुगै चाम ॥ १॥
गगन उठै धधकारी। धरै सूरति ध्यान।
खम्भा न महल अटारी। प्यारी पिव धाम॥ २॥
तारा अवर नहिं पानी। बानी उठै बिन तान।
खिरकी खुली बिन द्वारे। पारे परे ठाम ॥ ३ ॥
नइया कुटी भौ पारा। उतरै बिन दाम।
तुलसी अगम गम जानी। श्रुति पायो जिन नाम ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! उस एक देश (दिशा) बारे में सुनो, सूर्य पृथ्वी पर उगता है। उस देश (दिशा) की
उल्टी चलन है-सन्तजन प्रीति में फँसे रहते हैं॥
आकाश में मछलियाँ उछलती रहती हैं या शोर करती रहती है चन्द्रमा केवल (राम) नाम को
चुनता है। उस देश में कुएँ ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की तरह मुँह वाले) होते हैं और गाएँ चमड़े को खाती रहती
हैं॥ १॥
गगन रह-रह कर धधक उठता है, और सुरति का ध्यान लगा रहता है। न खम्भा है, न महल है, न
अटारी है-बिना किसी आश्रय के प्रिया अपने पति के धाम पर निवास करती है॥ २ ॥
नीचे (अवर) कोई तालाब (तारा) तथा जल नहीं है, और वहाँ बिना तान के वाणी उठती रहती है।
बिना द्वार के खिड़की खुली हुई है और उसके आगे ही (रहने लायक) स्थान भी है॥ ३॥
सन्त नाव से उस कुटी के पार हो जाता है किन्तु कोई उतराई नहीं देनी पड़ती। तुलसी साहब कहते
हैं कि मैंने अगम्य को समझ लिया है और वेदों में (ज्ञान के प्रकाश में) अपना नाम प्राप्त कर
लिया है॥ ४ ॥