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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

घट रामायण / १०१
उसके चरणों को पहचान कर मैं आगे बीसवें शून्य में पहुँची, और आगे इक्कीसवें शून्य में आनन्द
धाम सत्य पुरुष था॥ ११॥
हे सखी! उसके बाद सामने के प्रिय नगर को पारकर मैं 'सत्यलोक' पहुँची और अगमपुर पर दौड़े
कर चढ़ी तथा वहाँ पति को पाकर उस तक पहुँची॥ १२॥
सत्यपुरुष को पाने की, (इस प्रकार मेरी) मेरी प्रतिज्ञा पूरी हुई और पति की सेज प्राप्त की। उस
भवन के मध्य मैंने जो कुछ पाया, उसे वैसा ही बता दिया॥ १३॥
बाइसवाँ शून्य आगे है-उसे समझकर कोई प्राप्त करेंगे। जिन-जिन सन्तों ने यहाँ पर्वत शिखरों पर
विश्राम किया है, वही उसे बताएँगे॥ १४॥
तुलसी साहब कहते हैं कि यह शरीर रूई की भाँति नश्वर है, मूलात्मा तो चित्त में निवास करती है।
जिन्होंने इसके रहस्य को नहीं समझा है, वे वेद के भवजाल में फँसे है॥ १५॥
॥ सोरठा ॥
स्रुति पद परम निवास, चढ़ि अकास पति पै गई।
पिय पद सुरतिबिलास, सेज बास जल जस कही॥ १॥
पिय मोरे दीनदयाल, काटि जाल न्यारी करी।
अमर बुटी अज माल, सो पियाइ मो कौ दई॥ २॥
पिय पद पूर पियास, अमी पियाइ अमर करी।
सूरति अगम निवास, महल बास अपने करी॥ ३॥
अर्थ-वेद के परम स्थलस्वरूप उस परम निवास में स्थित शून्याकाश पर चढ़कर वह पति के पास
गई। प्रिय के उस निवास स्थल (पद) के सुरति विलास में जैसे-जैसे वर्णित है, तदनुसार उसने (प्रियतम
की) सेज पर रही॥ १॥
मेरा पति दीन दयाल है और उसने मेरी माया की जाल को काटकर मुझे उससे अलग किया और
अजपाजाप अभी माला की अमर बूटी मुझे पिला दी॥ २॥
प्रिय पद के साथ ही मेरी प्यास पूरी हुई और उसने अमृत पिलाकर अमर कर दिया। मेरा निवास
सुरति समाधि के अगम महल में हो गया और अपने साथ उस महल में रख लिया॥ ३॥
॥ दोहा ॥
पिय प्रभुता निज धाम, काम टहल मो कौ कही।
रही भवन के माहिं, अमल बास मो पै नहीं॥
अर्थ-उसकी प्रभुता उसके उस भवन में दिखी और उसने अपने भवन में टहल (भृत्य कर्म) के
लिए कहा। मैं इस तरह उसके भवन में रही-मुझ पर माया के नशे की गंध अब लेश मात्र भी नहीं रही॥
॥ सोरठा ॥
पृथ्वी पवन अकास, नीर नास सब होइँगे।
अगिन सूर अरु चंद, बँद बास पुनि पुनि नसै॥
अर्थ-पृथ्वी, आकाश, जल, वायु इन सबका विनाश होगा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र ये सभी माया की
गंध के वश (बंद) में हैं, सब का बार-बार विनाश होगा॥