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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

घट रामायण / १०३
हमारा सम्पूर्ण ज्ञान विस्तार हमसे ही हुआ है, संसार में सब कहने के लिए है-पिंड, उसके तत्त्व
एवं ब्रह्मांडादि किसी के विस्तार में कोई मदद नहीं करते ॥ ६ ॥
पृथ्वी, आकाश सभी का नाश होगा-अग्नि, वायु तथा जल भी नष्ट होने वाले हैं-केवल इस सृष्टि
में हम ही हम बचे रहेंगे ॥ ७ ॥
ब्रह्मा, वेद, विष्णु नष्ट हो जाएँगे तथा विष्णु, शिव भी नहीं बच पाएँगे-यह सम्पूर्ण विराट ( पृथ्वी,
जल, वायु, अग्नि-शून्यादि से सर्वत्र ब्रह्मांड रूप में व्याप्त) भी नहीं बचेगा और मैं किसी (किन सब की
बचै) बात कहूँ ॥ ८ ॥
हमारा अन्त कोई नहीं देख पाएगा और कोई सन्त ही हमें देखेगा। तुलसी साहब कहते हैं कि हमारी
आत्मिक सत्ता अन्तहीन (बेअंत) है-उसके अन्त (समाप्ति) के विषय में कौन कह सकता है ॥ ९॥
॥ दोहा ॥
बाइस सुनु बर्त्तमान, सुरति छान भिनि भिनि कही।
जानै संत सुजान, जिन चढ़ि देखा भेद सब ॥
अर्थ-सुनो, इसके बाईस रूप हैं-और इस सुरति के स्थानों को भिन्न-भिन्न रूपों में समझाया गया
है। इसके विषय में वही चतुर सन्तजन जानते हैं, जिन्होंने सुरति समाधि के शिखर पर चढ़कर इसके
भेदों को देखा है॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी संत चरन बलिहारी। चढ़े अगम जिन सुरति सम्हारी॥
लख लख जस जस भेद सुनाई। साखी सब्द ग्रंथ में गाई॥
महुँ पुनि चरन लागि लख बोला। जस जस कृपा संत कर खोला॥
संत चरन सूरति भइ चेरी। मति उन सब बिधि भाँति निबेरी॥
मैं उनकी चरनन बलिहारी। मोहि सों अजान जान कियो लारी॥
सुन्न सुन्न बाइस कर लेखा। खुलि हिये नैन सुरति से देखा॥
और सुन्न का भाखौं लेखा। कोड़ निज संत सुरति से देखा॥
तुलसी बूझी मोर अबूझी। जो कोड़ संत सैल कर सूझी॥
मैं अपनी गति कस कस भाखी। कहैं संत जिन देखी आँखी॥
मैं किंकर उन पर निज दासा। जिन जिन देखा अगम तमासा॥
सोइ सोइ देखि देखि कै भाखी। नैन से देखि पेखि उर आँखी॥
छै सुन्न का पुनि भेद बताऊँ। न्यारा भिन्न भिन्न दरसाऊँ॥
कौन सुन्न में कौन निवासा। ता कर भेद कहौं परकासा॥
प्रथम सुन्न में है निःनामी। ता की गति मति संतन जानी॥
दूजी सुन्न का भाखौं लेखा। जहँवाँ सत्तनाम को देखा॥
तीजी सुन्न सब्द एक होई। सुरति सैल कोड़ संत बिलोई॥
चौथी सुन्न कहौं समझाई। पारब्रह्म तहँ रह्यो समाई॥
संत ताहि परमातम भाखी। सो पुनि देखा दिये की आँखी॥