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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

२४ / घट रामायण
सखि सुरति मंज समान संजम। मैल मन संग दुख खलै ॥ २ ॥
सुनि सुलभ लखन लखाव सजनी। दुलभ दृढ़ कलिमल दलै ॥
मोहिं दीन लीन जो चीन्ह चेरी। तपन बिच तन मन जलै ॥ ३ ॥
सखि चरन सरन निवास निसदिन। दुख दवा मोहिं अब मिलै ॥
गुरु सरन मन्त्र मिलाप तुलसी। जबर सँग जुलमी टलै ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! गुरु को साथ लेकर उसमें भाव एवं लोक के प्रति भेदभाव दर्शित करो-मालुम
नहीं, उनके साहचर्य से आध्यात्मिक रहस्य किस मार्ग में मिल जाएं। जिस यन्त्र से लोक वासनाओं के
प्यास का पतन हो पल पल उसके विषय में सोचो और यह भी स्मरण करो कि गुरु को अन्तिम रूप से
स्वीकार करके मन किस प्रकार साधना लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता जाए ॥ १ ॥
गुणों की कन्दरा के प्रवेश करने पर मन की आश्चर्यजनक गति दिखाई पड़ती है और सहस्रार तक
अन्य साधन कैसे रह सकते हैं। हे सखि! सुरति में निमज्जित (मंज) और वैसा ही संयम आवश्यक है।
मैले यंत्र के साथ निश्चित ही चित्त यहाँ दुखी रहता है ॥ २ ॥
हे सजनी! उन सर्व सुलभ लक्षणों (लखन) को दिखावो जो दृढ़तापूर्वक दुर्लभ कलिमल का दलन
कर दे। गुरु इस दीन को दासी के रूप में पहचान लिया है और अब ईश्वर के विरह में मेरे तन मन दोनों
जल रहे हैं ॥
हे सखी! मेरा निवास तो अब गुरुचरणों में हो रहा है और इसीलिए दुःख रूपी दावाग्नि मिलती
हैं, किन्तु समीप नहीं आते। तुलसी साहब कहते हैं कि गुरु द्वारा मिले मंत्र से मेरा तादात्म्य हो उठा है-
अतः शक्तिमान का साथ है और कलिकाल का जुल्म टल गया है॥ ४ ॥
॥ छन्द ९ ॥
जब बल बिकल दिल देखि बिरहिन। गुरु मिलन मारग दई ॥
सखि गगन गुरु पद पार सतगुरु। सुरति अंस जो आवई ॥ १ ॥
सुरति अंस जो जीव घर गुरु। गगन बस कंजा मई ॥
अलि गगन धार सवार आई। ऐन बस गोगुन रही ॥ २ ॥
सखि ऐन सूरति पैन पावै। नील चढ़ि निरमल भई ॥
जब दीप सीप सुधारि सजि कै। पछिम पट पद में गई ॥
गुर गगन कंज मिलाप करि कै। ताल तज सुन धुनि लई ॥ ३ ॥
सुनि सब्द से लखि सब्द न्यारा। प्रालबद जद क्या कही ॥
जेहि पार सतगुरु धाम सजनी। सुरति सजिभजि मिलिरही ॥ ४ ॥
अस अलल अंड अकार डारै। उलटि घर अपने गई ॥
येहि भाँति सतगुरु साथ भेंटे। कर अलो आनँद लई ॥ ५ ॥
दुख दाउ कर्म निवास निस दिन। धाम पिया दरसत वहीं ॥
सतगुरु दया दिल दीन तुलसी। लखत भै निरभै भई ॥ ६ ॥
अर्थ-जब इस विरहिणी के हृदय को गुरु ने व्याकुल देखा, अपने मिलन द्वारा उसे (आगे का)
मार्ग दिखाया) हे सखी! गुरु गगन-गुफा के उस पार हैं और जब 'सुरति' का प्रकाश (आवेग) आता
है॥ १ ॥

घट रामायण / २५
जीव जो सुरति साधना का अंश है, गुरु के घर में आकर गगन की शून्य गुहा में रहते हुए
कमलमय हो गया। हे सखि! गगन की सहस्त्रारधार में अपने को सँवारती हुई केवल देखने भर के
लिए इन्द्रिय गुणों से जुड़ी दिखती है-अन्यथा वह स्वयं गुरुमय हो उठी है॥२॥
हे सखि! वह उस सहस्त्रार के नील पर्वत पर चढ़कर निर्मल हो उठी और उसकी लौकिक चेतना
विलुप्त हो उठी और वह आत्मा जब अपने दीप्त स्वरूप को थोड़ा और सुधार कर तथा साजसज्जा
करके उस पश्चिमी छोर पर पहुँची (सहस्त्रार बिन्दु के अनाहत नाद के पास) तो उस गुरु के द्वारा
आकाश (शून्याकाश) के सहस्त्रार कमल से मिल करके उसने अनाहद नाद की ध्वनि को सुना॥३॥
शब्द सुनकर तथा शब्दातीत ध्वनि की प्रतीति करके पहले से कहे जाते हुए लोक शब्दों की
निरर्थकता (प्राल बद) के विषय में क्या कहा जाए? हे सजनी! जिसके उस पार सद्गुरु की निवास
स्थली है, मैं सुरति के साथ सजी-धजी उनसे मिल पड़ी॥४॥
ऐसे अंडाकार संसार (अलल) अर्थात् ब्रह्मांड का त्याग करके मैं इससे अलग अब अपनी शून्य
स्थली गगन गुफा में पहुँच गई। इस प्रक्रिया द्वारा मैंने सतगुरु से भेंट किया और हे सखि! सारा आनन्द
प्राप्त कर लिया॥५॥
अपने पति परमात्मा के धाम में रहती हुई दुःख, दावाग्नि एवं कर्म की स्थली रूपी इस संसार को
निर्लिप्त भाव से द्रष्टा की भाँति देखती रहती हूँ। तुलसी साहब कहते हैं कि यह दीनहीन जीव सद्गुरु के
दयाभाव से दर्शक की भाँति इस संसार को देखता हुआ निर्भय हो उठा॥६॥
॥छन्द १०॥
अलि आदि अजर दयाल सतगुरु। मर्म कहौ कहँ लगि कहूँ॥
उस कुटिल खोट मलीन बुधि मैं। चित छली मनमत रहूँ॥१॥
धर धोइ सतगुरु सरस साबुन। ज्ञान सिल जल मल बह्यो॥
सखि मैल मन जस चिकट कपरा। उजल हिये अलि अस भयो॥२॥
जब आदि अटल अनादि रँग में। चटक रँग सतगुरु दयो॥
कहुँ कौन सिफति सुनाइ सजनी। अचल सलिता सिंध लह्यो॥३॥
सिंध सब्द सतगुरु सुरति सलिता। अलि मिलन अस बिधि भयो॥
सिंध बुन्द तन मन बन बिराटा। बूझ बिन बादै बह्यो॥४॥
जब उलटि घर अलि आदि चीन्हेँ। दीन दिल सतगुरु लयो॥
सखि आदि अंत समाद समझी। बरनि बिधि जस जस कह्यो॥५॥
सखि संत सतगुरु बरनि बरनौ। भाखि समझि सुनावही॥
गुरु चारि तन अस्थान अलि सुनि। समझि भेद लखावही॥६॥
सखि प्रथम गुरु सुनि कँवल कंजा। सहस दल पल पावही॥
सखि दुसर गुरु गढ़ गगन ऊपर। कँवल दुइ दल गावही॥
अलि तीनि गुरु तन माहिं पेखौ। चौकवल स्रुति लावही॥७॥
सतलोक चौथे चार सतगरु। अगम सिंध कहावही॥
जबँ सुरति शब्द मिलाप सजनी। संत वोहि घर जावही॥८॥
सखि मूल संत दयाल सतगुरु। पिउ निहाली मोहि करी॥
सत सुरति सिंधु सुधारि तुलसी। सार पद ज़द लखि परी॥९॥

२६ / घट रामायण
अर्थ-हे सखी ! मेरे सतगुरु आदितत्त्व हैं, अजर-अमर हैं, बड़े ही दयावान हैं, उनके रहस्य का कहाँ
तक वर्णन करूँ। उनके अभाव में इस कुटिल, भ्रष्ट, मलिन बुद्धि में छलिया चित्त को लेकर जन्मता
रहता हूँ॥ १॥
सतगुरु ने अत्यन्त आनन्दमयी साबुन से मेरा शरीर (घर) धो डाला और ज्ञान की शिला पर से
मलिन जल बह गया। हे सखि ! चिरकुट कपड़े जैसा मलिन मन अब इतना निर्मल एवं उज्ज्वल रूप का
हो उठा ॥ २॥
चित्त की इस उज्ज्वलता के वस्त्र पर अपने मूल रंग से रंगकर अब उसे और चटकदार बना दिया।
हे सखि ! फिर मैं उसका क्या वर्णन करूँ, जैसे कोई अचल नदी सिंधु रूप परमात्मा में जाकर मिल
उठी हो ॥ ३ ॥
इस प्रकार, सुरति नदी के सतगुरु सिंधु से मिलन हो उठा। सीमित तन मन में स्थित चेतना बिन्दु इस
संगम से विराट हो चली और मेरी यह समझ में न आया, कि वह मन कब ब्रह्म धारा में बह उठा ॥ ४॥
हे सखी ! जब उत्मनी दशा में अपने मूल आध्यात्मिक निवास की पहचान कर ली तो पता चला कि
यह दुर्बल दीन आत्म तत्त्व अब मेरा नहीं, सतगुरु का हो उठा। हे सखि ! आदि-अन्त तक मैंने उस
रचना को समझा और जैसा-जैसा मुझे बताया गया है, उसी प्रकार मैंने यहाँ (इस कृति में) उसका
वर्णन किया है ॥५॥
हे सखि ! सद्गुरु सन्त ने इसका जो कुछ भी वर्णन किया है, स्वयं समझने के बाद कहकर सुना
रहा हूँ। हे सखी! इन चार स्थलों का गुरु मुख से वर्णित स्वरूप सुनो और में (गुरुमुख से सुन
समझकर) उनका भेद बता रहा हूँ॥६॥
हे सखी! इन चारो में से प्रथम बिन्दु पर 'कँवल कंज' है जिसमें सहस्रार दल समाधि के क्षण
(पल) प्राप्त होता है। हे सखि ! दूसरा गगन गुहा के ऊपर स्थित सतगुरु का गढ़ है-जहाँ दो दलों वाला
कमल है। हे सखी! सतगुरु के शरीर को देखो, जहाँ चार दलों वाला कमल सुरति समाधि प्राप्त कराता
है (स्रुति लावहीं) ॥७॥
सतगुरु का चौथा लोक सत लोक है-जो अगम सिंधु के नाम से पुकारा जाता है-उसे 'अगम्य
सिंधु' भी कहा जाता है। इस सिन्धु से सुरति साधना का संगम होता है और संतों की चित्त दशा निरन्तर
वहीं जाकर निवास करती है ॥८॥
हे सखि! जगत के मूल (परमात्मा रूप) संत तथा दयालु सत्यगुरु ने मुझे पति परमात्मा के लिए
व्याकुल बना दिया है। तुलसी साहब कहते हैं कि सत् सुरति समाधि रूपी समुद्र को सुधारो, तभी वह
परमात्मा रूपी सार तत्त्व दिखाई पड़ सकता है ॥९॥
॥ छन्द ११ ॥
लख अगम भेद अलोक अलि री। संत सतगुरु मोहिं कह्यौ ॥
तिहुँ लोक से री अलोक न्यारा। पार मारग मोहिं दयौ ॥ १॥
सिंध सब्द सतगुरु किरनि चेला। सुरति सब्द मिलावही ॥
सतलोक सिंध सम्हार अलि लख। मिलन समझ सुनावही ॥ २॥
सखि सिंध बुन्द मिलाप सतगुरु। किरनि सुरज कहावही ॥
सखि समुद जल जस भरत बदरा। भूमि बरस बहावही ॥ ३॥
अलि सिमटि नीर समीर सलिता। सिंध समझि समावही ॥
सखि सिंध बुन्द जो सिष्य सतगुरु। गवन गत मत गावही ॥ ४॥
सखि जलहि जल बल एक करिकै। भूमि भर्म नसावही ॥

घट रामायण / २७
चित चीन्ह जैसे खेल चौपड़। जुग नरद घर आवही ॥ ५ ॥
जिमि किरनि भास निवास रबि में। गगन मर्म मिलावही ॥
अलि गगन नास अकास बिनसै। रबि रहन नहिं पावही ॥ ६ ॥
अलि सिंधु सूरज ब्रह्म कहि नद। किरनि जीव कहावही ॥
सब ठाट बाट बिराट बिनसै। सुरज कहँ होइ रहावही ॥ ७ ॥
सखि सुरज ब्रह्म विनास किरनी। जब अकास नसाइये ॥
सखि सुरज कहौ केहि ठाम रहि। सोइ समझ खोज लगाइये ॥ ८ ॥
अर्थ-हे री सखी! इस अगम्य (अध्यात्मिक) लोक को देखकर संत सतगुरु ने मुझसे कहा। यह
आध्यात्मिक लोक तीनों लोकों से विलक्षण है और इस लोक में प्रवेश का मार्ग मुझे गुरु ने ही बताया
है ॥ १ ॥
इस ज्ञान के बाद मुझे लगने लगा कि सिन्धु शब्द ही सतगुरु है और उस जल की चमक शिष्य है।
गुरु तथा शिष्य को सुरति ध्यान ही एक करता है। हे सखि! देखो, इस सिन्धु में ही 'सत् लोक' समाया
हुआ है और शिष्यगण सिन्धु तथा बिन्दु के मिलन के अनुभव का ही गुणगान करके सुनाते रहते
हैं॥२॥
हे सखि! सिन्धु एवं शिष्य रूपी बिन्दु का मिलाप ही सतगुरु (ब्रह्म) है। यह सम्मिलन उसी प्रकार
है, जैसे सूर्य और उसकी किरणों का मिलाप। हे सखि, समुद्र का जल जैसे अपने में आत्मसात् करके
बादल पुनः उसे भूमि पर बरसाता है-उसी प्रकार शिष्य भी सत्गुरु के सम्पर्क में ब्रह्मानुभूति से आत्म
साक्षात्कार करके उसे पुनः लोक में जन समुदाय के बीच रखता है ॥ ३ ॥
हे सखि! वही जल तथा वायु तथा तालाबों को सिन्धु समझकर उसमें पुनः समाविष्ट हो उठता है।
ठीक उसी प्रकार, शिष्य तथा सतगुरु बिन्दु तथा समुद्र हैं जो परस्पर एक दूसरे से परिपक्व होकर पुनः
उन्हीं में मिल जाते हैं। अतः एक दूसरे से मिले होने के उनके स्वरूप का मैं वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥
हे सखि! साधक शिष्य तथा गुरु दोनों जल को ही जल के माध्यम से ही एक रूप करके भूमि
(माया) होने का भ्रम दूर करते हैं। अपने चित्त से पहचानों जैसे चौपड़ खेल के खिलाड़ी दो हैं किन्तु
एक ही घर को लौटते हैं ॥ ५ ॥
जिस प्रकार किरणों के प्रकाश का निवास सूर्य में है और आकाश इस मर्म का नियन्ता है। हे
सखि! उसी प्रकार, जैसे आकाश का विनाश होने के बाद समझ शून्य नष्ट हो जायेगा और वहाँ सूर्य
रहने नहीं पाएगा ॥ ६ ॥
जब आकाश नष्ट हो जाएगा तो हे सखि! सूरज की किरणें भी विनष्ट हो उठेंगी-तब बताओं, वह
सूरज कहाँ है, किस स्थान पर चला गया, सोच समझ कर खोज करो ॥ ८ ॥
सोइ धाम ठाम ठिकात सजनी। घर समझ जहँ जाइये ॥
नहिं और आस बिनास सबको। कोइ रहन नहिं पाइये ॥ ९ ॥
सखि नीर छीर मिलाप समुन्दर। बदर फिरि भरि लावहीं ॥
जल बरसि नद मिलि समुंद आवै। जाइ पुनि फिरि आवही ॥ १० ॥
अस जीव आवागवन माहीं। ब्रह्म जीव कहावही ॥
बस कर्म काल बिनास निस दिन। अगम घर नहिं पावही ॥ ११ ॥
अलि समुन्द आदि बुन्याद कह सोइ। स्त्रोत केहि घर गावही ॥

२८ / घट रामायण
करि खोजि रोज बिचारि मन में। गैल गुरु सँग पावही ॥ १२ ॥
सखि संत चरन निवास चेरी। अधर समझ सुनावही ॥
लखि सिंध बुन्द से अगम आगे। देखि समझि समावही ॥
सोइ समझ सतगुरु सार सजि के। लेख लखन लखावही ॥ १३ ॥
जिमि धार मिलि जल मीन चढ़िके। अधर घर धसि धावही ॥
अलि अमर लोक निवास करिके। सुख अचल जुग पावही ॥ १४ ॥
गुरु कंज सतगुरु मज मिलि के। अंज अमल पिलावही ॥
सज सुरति निरति सम्हार मिलिके। पिलि पुरुष पिय पावही ॥ १५ ॥
एरी अगम दीनदयाल सतगुरु। हाल हरष निहारही ॥
तुलसिदास बिलास कहि अस। संत अज अरथावही ॥ १६ ॥
अर्थ-हे सजनी! उस स्थान को खोजो क्योंकि वही आत्मा का मूल निवासस्थल है, वही उसका
ठिकाना है (ठाँव) है, और वह साधक का घर है तथा उसी को ही अपना समझ कर वहीं जाओ। सभी
के लिए अन्य कोई निवास स्थली की आशा नहीं है तथा वह अन्यत्र नहीं रहने पाएगा ॥ ९ ॥
हे सखि! आत्मा तथा ब्रह्म का मिलाप, नीर-क्षीर मिलन समुद्र से सम्बद्ध है और बादल पुनः पुनः
उसी से ले जाते तथा वहीं दे आते हैं। बादल जल बरसते हैं, वह नदी में आता है और नदी के द्वारा गया
हुआ जल पुनः समुद्र में आता है ॥ १० ॥
इस प्रकार, जीव जगत में आवागमन के कारण केवल जीव कहलाता है और कर्म तथा काल के
प्रभाव से यह विनाशधर्मी जीव अज्ञानता वश ब्रह्म का सानिध्य नहीं प्राप्त करता ॥ ११ ॥
हे सखि! उसी अनादि समुद्र को निर्गुण ब्रह्म समझें, वही जगत का मूल तथा आदि आधार है।
उसका स्रोत कहाँ है, किसी को पता नहीं है। मन में अच्छी तरह से प्रतिदिन विचार करके देखो, उसे
पाने का मार्ग (गैल) गुरु सान्निध्य से ही प्राप्त किया जा सकता है ॥ १२ ॥
हे सखि! सन्त-चरणों में निवास करके उनकी दासी बनो और वे अन्तः लोक में स्थित उस ब्रह्म
विद्या के विषय में बताएँगे। उस मूल ब्रह्म तत्त्व को बिन्दु और सिन्धु के मिलन की दशा के भी आगे
समझकर, देखकर उसमें विलीनता प्राप्त करो ॥ १३ ॥
जिस प्रकार जल तथा धारा पर जलस्थित मछली चढ़कर अपने अन्तर्तम में स्थित निवास में प्रवेश
करके दौड़ती है-नितान्त सहजभाव से, वैसे ही, साधक उस अमर लोक में निवास करता हुआ अनन्त
-अनन्त युगों तक आनन्द प्राप्त करेगा ॥ १४ ॥
गुरु रूपी कमल और सतगुरु (ब्रह्म) रूपी सौन्दर्य (का मंत्र) मिलकर निर्मल अमृत (अंज) का
पान कराएँगे। इस प्रकार सुरति-निरति के सौन्दर्य से सज्जित स्वयं पति रूपी ब्रह्म के सान्निध्य का सुख
प्राप्त करोगे ॥ १५ ॥
अरी री! सखी!! सर्वथा अगम्य दीन दयालु प्रभु ही सतगुरु हैं-प्रतिक्षण हर्षपूर्वक वे भक्त की दशा
देखते रहते हैं। तुलसी साहब उनके इस निर्गुणमयी लीला-विलास का सन्त महात्माओं के लिए गान
करते हुए उनके अजत्व की अर्थमीमांसा करते हैं ॥ १६ ॥
॥ दोहा ॥
तुलसी अगम निवास, सुरति बास बस घर किया ॥
पिया परम रस मूल, सो अतूल अंदर हिया ॥ १ ॥

घट रामायण / २९
फूली बन फुलवारि, भीतर घट के कहि कही॥
खग मृग सरवर ताल, गुरु निहाल करि लखि लई॥ २॥
अर्थ-तुलसीसाहब बताते हैं कि ब्रह्म का निवास ऐसे स्थान पर है जो सर्वथा अगम्य है। सुरतियोग
के फलस्वरूप मैंने भी वहीं अपनी निवास स्थली बना ली। वह मेरा ब्रह्म पति आनन्द का अधिष्ठान है
और वह अतुलनीय विलक्षण मेरे हृदय के अन्तरतम में है॥ १॥
उसके साथ रहने पर इस शरीर के अन्तरतम की पुष्प वाटिका खिल उठी है और इसी शरीर में
उसकी कृपा से मैं पक्षी, मृग (वन पशु), सरोवर, ताल आदि सब कुछ देख रहा हूँ॥ २॥
॥ सोरठा ॥
तन मन ब्रह्मांड पसार, अंड अंड नौखंड लौं।
सो घट लखन मँझार, करत सैल ब्रह्मांड की॥ १॥
सतगुरु गगन गुहार, गगन मगन स्रुति मिलि रही।
मन्दिर मगन निहार, कंज भान भिन के कही ॥ २॥
अर्थ-इस शरीर तथा मन के अन्दर ब्रह्मांड फैल उठा है, अंडों की भाँति ब्रह्मांड जैसे इसी में स्थित
हो। मैं इस (वाणी) के अन्दर ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की जैसे सैर (सैल) कर रहा हूँ॥ १॥
इस पिंड रूपी आकाश में सतगुरु (ब्रह्म) की ही वाणी सुनाई पड़ रही है-उस प्रभु की ध्वनि इसी
हृदयाकाश में इसी सुरति के साथ विलीन भी हो रही है। मैं आनन्दित भाव से आत्मा के अधिष्ठान रूप
शून्य गगन के उस मंदिर को देख रहा हूँ, जहाँ भिन्न-भिन्न कमल हैं और भिन्न-भिन्न सूर्य बताये जाते
हैं॥ २॥
॥ दोहा ॥
भास भवन घट में लखी, सलिल कँवल के माहिँ।
पदम पार बेनी बसी, लसी अधर चढ़ि धाइ॥
अर्थ-ब्रह्म का अधिष्ठान मैंने शरीर में अनुभव किया, यहीं बिना जल के कमल देखा-इस कमल
के उस पार बनी हुई त्रिवेणी (सहस्रार की सन्धिस्थली) दिखाई पड़ी-यह सब हमने अन्दर-अन्दर ही
दौड़ते हुए शून्य शिखर पर चढ़कर देखा॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तोल निहार, गुरु अगम पद पदम हीं।
कर दृग ऐन अधार, पार परस पट भवन में॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने भलीभाँति तौलकर (मूल्यांकन करके) देख लिया है कि गुरु
के चरण-कमल ही अगम्य (को जानने के हेतु) हैं। इस संसार के रहस्य को आवृत किए हुए पट
(परदे) को देखने के लिए गुरु के ज्ञान दान से प्राप्त निर्मल दृष्टि को ही आधार बनाओ॥
॥ शब्द चरचरी ॥
तुलसिदास भास भवन, देखा घट माहीं।
लाई स्रुति सलिल कँवल, पदमन पर जाई॥ टेक॥
सतगुरु गिरि गगन, मगन, मंदिर मानौ अजूब।

३० / घट रामायण
कंजा भजि भलक भान, कोटिन छबि छाई॥ १॥
बेनी मजन अनूप, रहिनी अन्दर अरूप।
चंदा रबि रैनि दिवस, तारे नभ नाही॥ २॥
बरनन लखि अलख ऐन, स्याम सिखर निकर कंद।
निरता स्रुति समझि सूर, पकज अपनाई॥ ३॥
अंडा अंबुज अतूल, बेलि बृच्छ अधर मूल।
फूला फल बन निवास, ललित लता छाई॥ ४॥
भंवर भृंग लसि सुगंध, उरझे रस बस बिलास।
आनंद सीतल समीर, सखर तट माई॥ ५॥
जहँ जहँ दृग देखि जात, खगपति कृति नभ उड़ात।
बन बन मृग चरत जात, कोकिल करकाई॥ ६॥
धरिकै धस धरन डोर, दृढ़कै चढ़ि कड़क कोक।
धधकत धसि धधक नीर, फूटा पुल जाई॥ ७॥
भाखा भीतर बयान, सज्जन सुनि समझि साथ।
अद्बुद अज अजर बात, संतन लखवाई॥ ८॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि ब्रह्म भवन का ज्ञान (भास) मुझे हो गया है और वह शरीर
(घट) के अन्दर ही है। मैं शरीर के अन्दर स्थित इस भवन में जाकर स्थित कमल को सुरति रूपी
जल में आया॥ टेक॥
सतगुरु ब्रह्म गगन (शून्य) पर्वत पर मग्न हैं-उनका मंदिर (भवन) मानों मंदिर न होकर कोई
अजूबा हो। वहाँ गगन-गुफा में स्थित कमल दल का ध्यान करो (भजि) उसी के माध्यम से कोटि-
कोटि छवियों से अलंकृत सूर्य सुन्दर प्रतीत (झलक) होगा॥ १॥
उस इंडा-पिंगला एवं सुषुम्ना रूपी त्रिवेणी का स्नान अनुपम है, उसके अन्दर चित्त का निवास तो
और भी अनुपम है। यहाँ रात-दिन चन्द्र एवं सूर्य निरन्तर बने रहते हैं किन्तु उस आकाश में तारे नहीं
हैं॥ २॥
उस अलक्ष्य गृह का रूप देखकर तथा उसके श्यामल (शून्य) शिखरों के समूह का अनुभव
करके जो लोकवासनाओं से विरक्त जन एवं समाधि सिद्ध योगिजन (सूर) हैं, वे उस सहस्रार कमल
को अपना लेते हैं-अर्थात् अपनी समाधि सहस्रार में लगाए रहते हैं॥ ३॥
उस सहस्रार कमल को सम्हालने वाला ब्रह्मांड अतुलनीय है, उसके नीचे लताएँ, वृक्ष तथा
लटकती हुई जड़ें हैं-उस वन के परिसर में निवास है, फल-फूल मंडित ललित लताएँ छाई हुई हैं॥ ४॥
साधना विलास सुगंधि और रस में आनन्दित (उलझे) भ्रमर समूह फैले है। उस सरोवर के तट पर
शीतल वायु आनन्द दे रही है॥ ५॥
जहाँ जहाँ नेत्रों की दृष्टि जाती है, गरुण आकाश में उड़ते जैसे दिखते हैं। वन-वन में मृग समूह
चरते दिखते हैं तथा कोकिला कुहुकती रहती है॥ ६॥
हे साधक! इस शून्य में समाधि की डोरी पकड़ कर उसमें प्रवेश करो और पूरी दृढ़ता से उस
अविचल कमल में अध्यवसित (प्रविष्ट) होओ। तुम्हारे प्रवेश काल में शून्य सरोवर का वह जल
धधकता है (धधकेगा) और उसका सेतु फूटने-सा लगेगा (किन्तु हे साधक! तुम विचलित न
होना)॥ ७॥

घट रामायण / ३१
हे सज्जनों! मैं घट-ब्रह्मांड के भीतर की स्थिति का वर्णन मैं कर चुका, इसे सुनें और साथ-साथ
समझ लें। यही सर्वाधिक अद्भुत, अज एवं मृत्युमुक्त चर्चा (बात) है और इसे सन्तों को मैंने दिखा
दिया है॥ ८॥
॥ सोरठा ॥
भान भवन घट वास, लखि अकास अन्दर गई।
लीला गिरि चित चास, दीपक मंदिर मरम जस ॥ १ ॥
अर्थ-जब सूर्य के प्रकाशमय भवन में शरीर तथा चित्त का निवास हुआ तब वहाँ शून्याकाश
देखकर विलासवती आत्मा उसमें प्रवेश कर गई। उसके मन में अब लोला गिरि की साध (चास) हो
गई है और यह उसी प्रकार है-जैसे मंदिर के अन्दर दीप (प्रभा) का रहस्य अर्थात् मन्दिर एवं दीपक
दोनों एक दूसरे को प्रकाशित करते हैं-उसी प्रकार शून्याकाश में आत्मा परमतत्त्व एक दूसरे को
आलोकित करने लगे ॥ १॥
॥ दोहा ॥
लखि प्रकास पद तेज, सेज गवन गढ़ गगन में।
पति प्रिय प्रेम बिलास, तुलसिदास दस गिरा में॥ २॥
अर्थ-प्रकाश के इसके तेजोमय स्वरूप (पद) को देखकर शून्याकाश रूपी दुर्ग में स्थित पति
(ब्रह्म) की शय्या पर उसने गमन किया। दसों द्वार वाले उस भवन में जाकर, तुलसी साहब कहते हैं
कि, वह अपने प्रियतम पति के विलास में डूब गई ॥ २॥
॥ सोरठा ॥
मैं मति ऐन अयान, गुरु बयान मो को कह्यौ।
लह्यौ गगन सोइ जान, सतगुरु मंजन पदम हीं॥ ३॥
सतगुरु अगम अपार, सार समझि तुलसी कियो।
दया दीन निरधार, मोहिं निकार बाहिर लियो॥ ४॥
अर्थ-अज्ञान भरे चित्त वाले मुझ शिष्य को गुरु ने इस अध्यात्म विद्या का वर्णन किया-फिर ब्रह्म
रूपी गुरु के चरणों का प्रक्षालन करता हुआ मैंने ज्ञानदृष्टि से उसे शून्य आकाश को समझा॥ ३॥
मेरे सतगुरु अगम्य हैं, अपार हैं, मैंने उनके होने का मूल तत्त्व समझकर उन्हें गुरु माना। बिना
किसी कारण के अर्थात् अकारण इस दीनजन पर उनकी दया बनी रही, वे सतगुरु ही हैं-जिन्होंने इस
मायामय संसार से निकालकर मुझे मुक्त कर दिया॥ ४॥
॥ दोहा ॥
सतगुरु संत दयाल, करि निहाल मो को दियो।
मूरति सिन्ध सुधार, सार पार जद लखि पर्यो॥ ५॥
अर्थ-सतगुरु ही वह दयावान् सन्त हैं, जिन्होंने मुझे वह परम तत्त्व देकर विह्वल बना दिया। सुरति
साधना द्वारा सिन्धु के मार्ग को सुधारा और मैं और इस भवसागर के पार जैसे दिखाई पड़ने लगा॥ ५॥
॥ सोरठा ॥
संत चरन पद धूर, मूर मरम मो को दई।
भई निरति श्रुति सूर, लइ समान मन चूर करि॥ १॥

३२ / घट रामायण
मैं मति मान अपूर, कूर कुटिल न्यारे किये।
हिये तिमर तन दूर, तूर तमक तन की गई॥२॥
मो मन सुरति अयान, जानि सुरति सत रीति ले।
गहि कर संत सुजान, मान मनी मद छाँड़ि के॥३॥
मैं मति सत सम नाहिं, पाइ पकरि लारै लई।
सतगुरु दीन दयाल, जाल काट न्यारी करी॥४॥
सतगुरु चरन निवास, बिमल बास बिधि लखि परी।
धरी जो तुलसीदास, भास चमक चढ़ि चाँप धरि॥५॥
सतगुरु परम उदार, दल दरिद्र सब दूरि करि।
संपति सुरति बिचार, निधि निहार सच्छै लखा॥६॥
अर्थ-सन्त की चरणधूलि ने ही मुझे रहस्य के मूल तत्त्व को दिया है। मेरी मति निरति और सुरति
के कारण सबल हो उठी और तुच्छ वस्तु के सदृश उन्होंने मन को (लोकमन को) नष्ट कर दिया॥१॥
मुझ अपूर्ण बुद्धि के व्यक्ति की क्रूरता, कुटिलता को गुरु ने मुझसे अलग किया। मेरे हृदय का
अँधेरा दूर हुआ और शरीर का अहम् और गर्व (तूर तमक) दूर हो गया॥२॥
सुरति-समाधि तथा ज्ञान से सर्वथा अज्ञानी मेरे चित्त ने सत्य रीति (सही-सही तरीके से) से सुरति
को समझा और इस प्रकार मन के मान एवं मद विकार का परित्याग करके सज्जन संत का हाथ
पकड़ा (सहारा लिया)॥३॥
मैं अपनी मति के अनुसार सत्यमय नहीं था-गुरु के चरणों को पकड़ कर उसी में अपनी निष्ठा
(लारै) लगाई और दीनों के प्रति अत्यधिक दयाभाव रखने वाले मेरे गुरु ने मायिक संसक्ति (जाल)
को काटकर मुझे उससे मुक्त कर दिया॥४॥
सतगुरु के चरणों की छाया में निवास करने से निर्मल (पवित्र) निवास की विधि मुझे दिखाई पड़
गई। इस तुलसी साहब ने उसे ग्रहण करके अदृश्य में प्रकाशित तत्त्व को देखकर समझा॥५॥
मेरे सतगुरु परम उदारमना हैं, मेरी दरिद्रता के सारे समूहों को उन्होंने विनष्ट किया। उनके ज्ञान दर्शन
के बाद ही मुझे सुरति ज्ञान जैसी संपत्ति समझ में आई और उसी के माध्यम से अपूर्व ज्ञान रूपी निधि
को देखकर 'अनाहत नाद' जैसे शब्द से साक्षात्कार किया है॥६॥
भेद पिंड और ब्रह्मांड का
॥ चौपाई ॥
परथम बन्दौं सतगुरु स्वामी। तुलसी चरन सरनि रति मानी॥
पुनि बन्दौं संतन सरनाई। जिन पुनि सुरत निरत दरसाई॥
चरन सरन संतन बलिहारी। सूरति दीन्ही लखन सिहारी॥
सरन सूर सूरति समझाई। सतगुरु सूर मरम लख पाई॥
मैं मतिहीन दीन दिल दीन्हा। संत सरल सतगुरु को चीन्हा॥
सतगुरु अगम सिंध सुखदाई। जिन सत गेह रीति दरसाई॥
पुनि पुनि चरन कँवल सिर नाऊँ। दीन होइ संतन गति गाऊँ॥
दीन जानि दीन्ही मोहिं आँखी। मैं पुनि चरन सरनगहि भाखी॥

प्रथम खण्ड: घट-घट राम एवं सुरति-शब्द योग निरूपण

घट रामायण / ३३
मैं तौ चरन भाव चित चेरा। मोहिं अति अधम जानि कै हेरा॥
मैं तौ प्रति प्रति दास तुम्हारा। संत बिना कोई पावै न पारा॥
संत दयाल कृपा सुखदाई। तुम्हारी सरन अधम तरि जाई॥
आदि न अंत संत बिन कोई। तुलसी तुच्छ सरन में सोई॥
जो कुछ करहिं करहिं सोइ संता। संत बिना नहिं पावै पंथा॥
मोरे इष्ट संत श्रुति सारा। सतगुरु संत परम पद पारा॥
सतगुरु सत्तपुरुष अबिनासी। राह दीन लखि काटी फाँसी॥
कँवलकंज सतगुरु पद वासी। सूरति कीन दीन निज दासी॥
सूरति निरत आदि अपनाई। सतगुरु चरन सरन लौ लाई॥
बार बार सतगुरु बलिहारी। तुलसी अधम अघ नाहिं बिचारी॥
बन्दौं सब चर अचर समाना। जानौ तुलसी दास निदाना॥
मैं किंकर पर दया बिचारा। अनहित प्रिये करौ हित सारा॥
सब के चरन बन्दि सिर नाई। प्रिये लार लै प्रीति जनाई॥
तुम प्रति भूल बंद अस गाई। बार बार चरनन सिर नाई॥
पुनि बन्दौं सतगुरु सत भावा। जिनसे बस्तु अगोचर पावा॥
सतगुरु अगम अरूप अकाया। जिनकी गति मति संतन पाया॥
सतगुरु की कस करहुँ बखानी। सूरति दीन्ही अगम निसानी॥
लख लख अलख सुरति अलगानी। संतकृपा सतगुरु सहदानी॥
सूरति सैल पेल रस राती। सतगुरु कंज पदम मदमाती॥
तुलसी तुच्छ कुछ नहिं जानै। सतगुरु चरन सरन रत मानै॥
सूरति सतगुरु दीन्हि जनाई। नित नित चढ़ै गगन पर धाई॥
सैल करै ब्रह्मांड निहारा। देखै आदि अंत पद सारा॥
निरखा आदि अंत मधि माहीं। सोइ सोइ तुलसी भाखि सुनाई॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड समाना। तुलसी देखा अगम ठिकाना॥
पिंड ब्रह्मांड में आदि अगाधा। पेली सुरति अलख लख साधा॥
पिंड ब्रह्मांड अगम लख पाया। तुलसी निरखि अगाध सुनाया १॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड दिखाना। ता की तुलसी करो बखाना॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि उनके चरणों की शरण की संसक्ति स्वीकार करके मैं सर्वप्रथम
स्वामी सतगुरु की बन्दना करता हूँ॥
१. मुं० दे० प्र० की पुस्तक में "अगाध सुनाया" की जगह "परख गत गाया" और आगे की कड़ी में
"दिखाना" की जगह "समाना" है।

३४ / घट रामायण
जिन्होंने इस साधना से उपकृत करके मुझे सुरति तथा निरति का ज्ञान कराया है, उसके बाद, ऐसे
सन्तों की मैं वन्दना करता हूँ।
जिन सन्तों ने मुझे सुरति का ज्ञान कराया और तत्त्व को देखने की दृष्टि सुधारी ( सिहारी )
बलिहारी हैं, मैं ऐसे सन्तों के चरणों की शरण में हूँ॥
ऐसे शूरमा सन्तों की शरण में मैं आया और उन्होंने 'सुरति साधना' को समझाया और उनके द्वारा
ही मैं बलशाली तत्त्वज्ञ सन्तों के रहस्य को समझ पाया॥
मैं अज्ञानी, दीन व्यक्ति समर्पित भाव से जब गुरु की शरण में गया तब सन्तों के चरणों में रहकर
सतगुरु को पहचाना॥
सतगुरु अगम्य समुद्र की भांति आनन्ददायी हैं, जिन्होंने मुझको सत्य के गृह तक पहुँचने की रीति
तथा राह दिखाई हैं॥
मैं बार-बार सन्त के चरण कमलों में अपना शीश झुकाता हूँ क्योंकि दीन (संसक्ति रहित) होकर
ही सन्तों के ज्ञान (उनकी अवस्थाओं) का गान कर सकता हूँ-अन्यथा नहीं॥
मुझे दीन समझकर सन्तों ने मुझे ज्ञान चक्षु प्रदान किया और फिर मैं उनकी चरणों की शरण में
जाकर और उसे धारण करके यह (घट रामायण) कही॥
मैं तो उनके चरणों में दास्य (चेरा) भाव से आया और मुझे अत्यन्त अधम समझ कर उन्होंने देखा
(स्वीकार किया)॥
हे प्रभु! मैं तो आपके दास का दास (प्रति प्रति दास) हूँ-इन सन्तों के बिना इस संसार से किसी को
मुक्ति पाना सम्भव नहीं है॥
संत दयालु हैं, उनकी कृपा आनन्ददायी है, आपकी कृपा से अधम (पापी जन) भी मुक्ति प्राप्त
कर लेते हैं।
कोई भी व्यक्ति अपने आदि स्वरूप और अन्तिम स्वरूप को बिना सन्तों के नहीं प्राप्त कर सकता
(जान सकता), तुच्छ तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उन्हीं सन्त की शरण में हूँ॥
जो कुछ करणीय है, उसे सन्त जन ही करते हैं और बिना सन्त जन के ज्ञान मार्ग नहीं प्राप्त हो
सकता। वेदों के सार स्वरूप संत जन ही मेरे इष्ट है। सतगुरु की प्राप्ति परम पद संत जन की सहायता से
ही सम्भव है॥
सतगुरु (ब्रह्म) अविनासी सत्य पुरुष हैं। इसका (दास का) मार्ग कंटकमय व फाँस मय था, जिसे
समाप्त करके उसने रास्ता दिया। सतगुरु के चरणों में निवास करने वाले मुझ जैसे व्यक्ति का मन
सहस्रदल में स्थित है। अपने शिष्य को वे निरन्तर स्मरण आते हैं। वे उसे अपना दासत्व दे डालते है॥
सुरति-निरति आदि योग प्रक्रियाओं को अपना कर साधक (मैं) सतगुरु के चरणों के चरणों की
शरणागति में लौ लगा ली। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं बार-बार सतगुरु की बलिहारी जा रहा हूँ।
उन्होंने मुझ अधम को स्वीकार करते हुए उसके पापों को नहीं देखा॥
सम्पूर्ण सचराचर की मेरे समान ही उन्होंने एक समान मानव-दया की और उनके सारे अनहित को
हितमय कर दिया॥
सभी के चरणों पर शीश डालकर मैं बन्दना करता हूँ और अपने आन्तरिक स्नेह (लार-लाड़) से
सबके प्रति प्रीति प्रगट की। बार-बार चरणों में शीश डालकर तुम्हारी इस प्रकार की बन्दना करता हुआ
गा रहा हूँ॥
पुनः मैं सत्यभाव (निष्ठा) से सतगुरु की वन्दना करता हूँ, जिनकी कृपा से ही मैंने अदृश्य वस्तु को
प्राप्त किया है। सतगुरु अगम्य हैं, अरूप हैं, शरीर विहीन हैं-जिनके ज्ञान के विषय में संत भी नहीं
जानते॥

घट रामायण / ३५
मैं सतगुरु का वर्णन कैसे करूँ-क्योंकि उनकी पहचान के अगम्य लक्षण हैं। जिनकी स्मृति
(सूरति) या शरीर रचना लाखों-लाखों रूपों में होते हुए भी अलक्ष्य (अलख) है। सन्तों की कृपा ही
सतगुरु की भेंट या निशानी (सहिदानी) हैं॥
उनकी स्मृति रसभरी कन्दराएँ हैं, सतगुरु रूपी कमल मदमस्त दिखाई पड़ते हैं। तुलसी साहब जैसा
तुच्छ व्यक्ति तो उनके विषय में कुछ भी नहीं जानता। वह तो उनके चरणों के प्रति संसक्ति को ही सब
कुछ मानता है॥
अपनी जिस स्मृति को सतगुरु ने दिखा दिया है उसके लिए वह नित्य-प्रति आवेगपूर्वक शून्य
मण्डल पर दौड़कर जाता है। उस ब्रह्मांड को देखते हुए मैं निरन्तर उस पर विचरण (शैल-सैर) करता
रहता हुआ आदि से अन्त तक उसके रहस्य को देखता रहता हूँ॥
मैंने उसके आदि मध्य अन्त सबको देखा है। मैं तुलसीदास उसी को कहकर सुना रहा हूं। इस शरीर
(पिंड) में ब्रह्मांड छिपा समाहित है और इसी में उस अगम्य निराकार ब्रह्म की निवास स्थली देखी है॥
आदि और अगाध ब्रह्मांड इस पिंड में ही है-सुरति ज्ञान का प्रसार (फैली) हुआ और मैंने अलक्ष्य
ब्रह्म का लक्ष्य साध लिया।
इसी पिंड के अगम्य ब्रह्मांड मैं (उसी की कृपा से) उसे देख सका। तुलसी साहब कहते हैं कि
उसी की कृपा से उस अगाध तत्त्व को देखकर मैंने लोगों को सुनाया है। मुझे पिंड में स्थित ब्रह्मांड
दिखाई पड़ा और उस पिंड स्थित ब्रह्मांड का मैं तुलसी साहब यहाँ (घट रामायण के रूप में) बखान
या वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ सोरठा ॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड, देखा निज घट जोड़ कै ॥
गुरु पद पदम प्रकास, सत प्रयाग असनान करि ॥
अर्थ-गुरु चरणों के सत्प्रकाश रूपी प्रयाग में स्नान करके ही मैंने अपने शरीर में ही इसी पिंड में
ब्रह्मांड को समझकर देखा है॥
॥ दोहा ॥
बूझै कोइ कोइ संत, आदि अंत जा ने लखी।
परचै परम प्रकास, जिन अकास अम्बर चखी ॥
अर्थ-इसे कोई कोई अर्थात् बिरला संत ही जानता है (और इसे वही जानता है) जिसने आदि तथा
अन्त दोनों को देख लिया है। जिस सन्त ने साधना के शून्याकाश में आकाश का स्वाद चख लिया है,
उसी से उस दिव्य परम प्रकाश का परिचय भी है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तोल तरास, तत बिबेक अन्दर कही।
बूझेंगे निज दास, जिन घट परचे पाइया ॥ १ ॥
पानी पवन निवास, कँवल बास बिधि सब कही।
जीव काल और स्वाँस, और अकास उतपति भई ॥ २ ॥
भीतर देखि प्रकास, सब ब्रह्मांड बिधि यों कही।
रावन राम संबाद, आदि अंत निज जोड़ कै ॥ ३ ॥

३६ / घट रामायण
अर्थ-तुलसीदास कहते हैं कि मैंने भली भांति मूल्यांकन करके (तोल) एवं सुस्पष्ट (तरास) कर
पिंड में निहित तत्त्व का वर्णन किया है। इसको वही शिष्य प्राप्त करेंगे (समझेंगे) जिन्होंने पिंड रचना से
परिचय प्राप्त कर लिया है॥ १॥
इस पिंड की निवास-स्थली जल तथा वायु है और इसी में सहस्त्रार कमल का निवास है, ऐसा
सभी ने बताया है। इन्हीं दो तत्त्वों से जीव, काल, श्वास तथा आकाश की उत्पत्ति हुई है॥ २॥
इस घट के भीतर घटाकाश में प्रकाश को देखकर समस्त ब्रह्मांड का वर्णन (इस प्रकार) रावण
राम संवाद के रूप में इसके आदि अन्त को देखकर किया॥ ३॥
॥ चौपाई ॥
जो कोई घट का परचा पावै। कँवल भेद ता को दरसावै॥
भिन्न भिन्न कँवलन बिधि गाई। स्वाँसा भिन्न बिधी दरसाई॥
निज निज तत्त कहेऊ मैं जानी। परखेंगे कोइ संत सुजानी॥
मैं गति नीच कींच कर सानी। कहत लजाउँ अगम गति जानी॥
जो अपनी गति कहहुँ बिचारी। तौ मन मोट होत अधिकारी॥
मैं किंकर संतन कर दासा। घट घट देखा तत्त निवासा॥
ता की गति ग्रन्थन में गाई। बूझै जिन सत संगति पाई॥
सूरति सार सब्द जिन पाया। दस गृह सैल जिन करी अकाया॥
अर्थ-जो कई व्यक्ति इस घट (पिंड) से परिचय प्राप्त कर लेता है, उसे सहस्त्रार कमल का रहस्य
ज्ञात हो जाता है। कमलों की भिन्न-भिन्न दशाओं का वर्णन किया गया है, और श्वास के भिन्न-भिन्न
रूप बताये गये हैं॥ १॥
मैं समझकर भिन्न-भिन्न तत्त्वों का वर्णन करूँगा और उसे कोई चतुर मर्मज्ञ संत ही समझेंगे। काया
के निकृष्ट कीचड़ में सनी हुई अपनी मति द्वारा मैं उस निर्गुण की अगम्य गति (ज्ञान) कहने में लज्जा
का अनुभव करता हूँ॥ २॥
यदि मैं अपनी गति (ज्ञान) का विचार कर वर्णन करता हूँ तो मेरी यह ज्ञानाधिकार सम्बद्ध मति
मोटी (अज्ञान से परिपूर्ण) समझी जाएगी। मैं तो दास हूं और विशेषकर सन्तों की और मैंने प्रत्येक घट-
घट में उसी का निवास देखा है॥ ३॥
उसके ज्ञान का वर्णन अनेक ग्रन्थों में किया गया है जिसने सत्संगति की है, वही उसे समझ सकता
है, जिसने सुरति समाधि का शब्द प्राप्त कर रखा है और जिसने शरीर के दसों गृहों में स्थित पर्वतों को
कायामुक्त कर रखा है॥ ४॥
॥ सोरठा ॥
जिन मानी परतीत, अधर रीति जा ने लखी।
सब गति कहहुँ अजीत, सत्त बचन परमान कै॥ १॥
तुलसी सब्द सम्हार, वार पार सगरी लखी।
पकी चखी स्रुति सार, लार सब्द सूरति गई॥ २॥
अर्थ-जिन्होंने विश्वास किया और जिसने पिंड के अधर (अन्दर) की दशाएँ देख ली हैं, उनके
वचन सत्यनिष्ठा के प्रमाण है॥ १॥
तुलसी साहब कहते हैं कि जिसने अनाहत शब्द को सम्हाल रखा है और इस पार-उस पार के

घट रामायण / ३७
समस्त दृश्यों को देख लिया है। जिसने सुरति के पके हुए मूल तत्त्व का आस्वादन कर रखा है—उसकी
संसक्ति सबद तथा सुरति से पूरी तरह से जुड़ जाती है॥ २ ॥
॥ दोहा ॥
सतगुरु पुर पद पार, ये अगार अदबुद कही।
भौ बुधि भेष मँझार, सार लार सूझै नहीं॥
अर्थ—सतगुरु के चरणों के उस पार वह समाधि में चित्रित अद्भुत रूप से वर्णित नगर है। हमारी
बुद्धि तो भवसागर में नाना रूपों में फँसी है—यह ब्रह्म वासना तो उसे सूझती तक नहीं॥ १ ॥
॥ छन्द ॥
गुरु पद कंज लखाइ घट परचे पाई। सुरति समानी सिंध मई॥
देखा वह द्वारा अगम पसारा। दस दिस फोड़ अकास गई॥
नाम निअच्छर छर नहिं अच्छर। देख अगाध अनाद लई॥
पार भीतर जाना घट परमाना। जेइ जेइ संत अगार कही॥
जिनकी रज पावन राम औ रावन। निः अच्छर सत सार सही॥
पंडित और ज्ञानी यह नहिं जानी। भेष भेद गति नाहिं लई॥
सब जग संसारा काल की जारा। सकल पसारा भेष मई॥
रागी बैरागी भौ रस त्यागी। साँगी पाँगी भरम बही॥
ग्यानी बिज्ञानी वन वस जानी। संत पंथ मत राह नहीं॥
जोगी सन्यासी काल की फाँसी। परमहंस परमान नहीं॥
निज गावै बेदा जानै न भेदा। सास्त्र संघ जिन राह लई॥
संतन गति न्यारी सुनौ बिचारी। चौथे पद के पार कही॥
कोइ करिहै संका महामति रँका। सतसंगति सम सूझ नहीं॥
तुलसी मति-हीना पायौ चीन्हा। संत कृपा घट घाट लई॥
॥ छन्द ॥
अर्थ—गुरु चरण कमलों को दिखाकर, पिण्ड का परिचय प्राप्त करके सुरति अगाध समाधि समुद्र
में विलीन हो गई। उसके पश्चात् ही वह अगम्य एवं अपार द्वार देखा और तब दसों द्वारों को तोड़कर
वह ज्ञानदृष्टि शून्याकाश में खो गई॥
वह निरंजन वर्ण शून्य (नि अच्छर) है, वह क्षरणशील न होकर, अक्षरणशील है, उस अगाध तथा
अनादि तत्त्व को मैंने देख लिया। उसे मैंने घर के भीतर स्थित ही समझा और उसके लिए प्रमाण घट ही
है। उसे ही सभी ने सन्तों का निवास गृह बताया है॥
जिसकी पवित्र रज से राम और रावण उत्पन्न हुए हैं—वह वाणी शून्य का एकमात्र सही-सही यही
सारतत्त्व है। न उसका कोई वेष है, न उसका कोई भेद है और न उसकी कोई भिन्न ज्ञान दशा (गति)
है—पंडित और ज्ञानीजन उसे आज तक नहीं समझ पाए हैं।
समस्त संसार काल की पत्नी है और वह अनेक वेष धारण करके समस्त स्थानों पर फैली है।
उसके भ्रम में उरासे वशीभूत होकर रागवासना ग्रस्त, विरागीजन, इस संसार (भौ) का रस त्याग करने
वाले सन्यासी (साँगी) सभी उसमें रम जाते हैं॥

३८ / घट रामायण
ध्यान धारण करने वाले, विज्ञानी सन्यासीगण, वन में निवास करने वाले संत के मार्ग का
अनुसरण करने वाले तथा अनेक अनेक साधुजन, योगी, सन्यासी के लिए यह माया काल की फाँस
है-परमहंसों का तो कोई प्रमाण ही नहीं है॥
ये अपने ज्ञान (या वेद) का वर्णन करते रहते हैं किन्तु उसके रहस्य को नहीं जानते। शास्त्र
सिन्धुओं का जिन शास्त्रज्ञों ने मार्ग ग्रहण कर रखा है, इसे विचार करके सुनो कि संतों की गति
विलक्षण होती है (वे सर्वज्ञ हैं) किन्तु चौथे पद (निर्वाण पद) की कोई सीमा नहीं है॥
यदि कोई इस बात पर संदेह करता है तो वह महामति से रहित है। वैसे, सत्संगति के बिना कोई
ज्ञान सूझता नहीं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं बुद्धिहीन व्यक्ति भी संतों की कृपा से ज्ञानदृष्टि प्राप्त की
और उस परम तत्त्व को पिंड रूपी तट (घट घाट) पर प्राप्त किया॥
॥ सोरठा ॥
पानी पवन निवास, कँवल बास बिधि सब कही।
सब्द सुरति कर बास, वै निरास अच्छर रहत ॥ १ ॥
कह्यो ग्रन्थ घट सार, गुरु परचै निज कँवल में।
जिन जिन पाय निवास, सो लखिहैं ये भेद सब ॥ २ ॥
अर्थ-जल तथा वायु में निवास करके प्रत्येक प्रकार से सहस्रार में वास (सुगंधि)द्वारा एहसास
कराते हुए शब्द रूप में वे सुरति समाधि में निवास करते हैं। उसे अक्षररहित समझकर सन्यासी योगी
आदि उसमें स्थित रहते हैं॥ १ ॥
पिंड के इस सार तत्त्व का वर्णन इस ग्रंथ में मैं कर रहा हूँ। गुरु द्वारा परिचित कराने पर अपने ही
ब्रह्म कमल में वह दिखाई पड़ा। जिन-जिन सन्तों ने अपने चित्त में आत्मतत्त्व का विश्राम प्राप्त कर
लिया है-वे इसके इन भेदों को देखेंगे॥ २॥
॥ चौपाई ॥
अब ब्रह्मांड का भाखौं लेखा। भिन्न भिन्न घट भीतर देखा॥
पाँच तत्त का कहौं बिचारा। अगिनि अकास नीर निरधारा॥
पृथ्वी पवन सकल कर भेदा। पिंड ब्रह्मांड का रच्यो निबेडा॥
लखि अकास बाई सँग आई। दोइ मिलि निज अगिनी उपजाई ॥
अब पानी का सुनौ बिचारा। ये चारौ मिलि मही अकारा॥
ऐसे पाँच तत्त उपराजा। निज तन कीन्ह देह कर साजा॥
पानी बुँद सृष्टि उपजाई। ता में चेतन सत्त समाई॥
अब पानी का भाखौं लेखा। भिन्न भिन्न घट भीतर देखा॥
ता की बिधि बिधि कहौं बिचारा। छत्तिस नीर पचासी धारा॥
जोड़ जोड़ नीर नाम बतलाऊँ। नीर छतीसो बरनि सुनाऊँ॥
बिधि बिधि नाम नीर समझाऊँ। नाम नीर भिन्न भिन्न दरसाऊँ॥
अर्थ-अब मैं ब्रह्मांड के विषय में वर्णन करता हूँ। उसे मैंने भिन्न-भिन्न पिंडों (घटों) के भीतर
देखा है। पंच तत्त्वों पर मैं सबसे पहले विचार कर रहा हूँ। अग्नि, आकाश, जल ये तीनों पृथक् हैं॥
पृथ्वी तथा वायु सभी के भेद हैं और इस प्रकार इनसे पृथ्वी तथा ब्रह्मांड की रचना हुई है। आकाश
को देखो, उसके साथ वायु उत्पन्न हुई है। इन दोनों ने मिलकर अग्नि को पैदा किया है॥

घट रामायण / ३९
अब पानी के विषय में विचार सुनो। इन चारों ने मिलकर पृथ्वी को आकार दिया है। इस प्रकार
पाँचों तत्त्व उत्पन्न हुए हैं और अपने-अपने द्वारा इन्होंने पिंड की सज्जा की है॥
पानी की बूँद ने सृष्टि उत्पन्न की। उसी में चैतन्य तत्त्व प्रविष्ट हो गया। अब मैं जल का वर्णन
करता हूँ। उसे मैंने भिन्न-भिन्न पिंडों में इस प्रकार देखा है॥
मैं विधिपूर्वक उसकी विधि का वर्णन कर रहा हूँ। छत्तींस प्रकार के जल हैं और उसकी पचासी
प्रकार की धाराएँ हैं। जिन-जिन जलों को मैं तुम्हें बतलाऊँगा और उन छत्तीसों जलरूपों का वर्णन
करके सुनाऊँगा। नाना प्रकार के रूपों से मैं उनका नाम बताऊँगा और उन जलों के अलग-अलग नामों
का वर्णन करूँगा।
॥ नीर के नाम ॥
॥ चौपाई ॥
जल अजीत परथम करि गाऊँ। करता जल दूसर कर नाऊँ॥
और अनूप तीसर जल कीन्हा। चौथा मुक्ति नीर को चीन्हा॥
नीर पाँच पुरइनि परमाना। अंबुज षष्टम नीर बखाना॥
नीर सात बिषया झर होई। नीर आठ अटला सुर सोई॥
नवाँ नीर नाटक दुख भेदा। दसवाँ नीर दसौ मन छेदा॥
एकादस नीर काल को जाना। द्वादस नीर जिव करै पयाना॥
तेरवाँ नीर पुरुष कौ ध्याना। जो बूझै घट परचै जाना॥
जीव नीर चौधा में भूला। पंद्रह नीर भीर सहै सूला॥
सोला नीर कनक कर संगी। सत्रा नीर रूप रस रंगी॥
अठरा नीर बोल दे नाऊँ। उन्निस नीर कुसुम रंग राऊ॥
बिसवाँ नीर कलंगी गाई। निज घट भीतर परचा पाई॥
इकिस नीर सुख सागर धामा। भँवरकंज उरझा तेहि ठामा॥
बाइस नीर मूल घट राजा। तेइस नीर निरासू बाजा॥
नीर चौबिसवाँ चतुर सुजाना। पच्चिस नीर मेघ परमाना॥
छब्बिस नीर कहौं मैं काला। सताइस नीर घनासुर नाला॥
अठाइस नीर रूप द्वै आना। उन्तिस नीर अभया दृग दाना॥
तिसवाँ नीर आहि बल भारी। इकतिस नीर आहि संसारी॥
बतिस नीर निरगुन है सीठा। तैंतिस आलस नीर है मीठा॥
चौंतिस नीर सरोसिल नाऊँ। पृथ्वी पैंतिस नीर बताऊँ॥
छत्तिस नीर कामिनी बासा। ब्रह्मा बिस्नु का भोग बिलासा॥
जीव जंतु जल जीव निवासा। ये सब परे काल की फाँसा॥
छत्तिस नीर नाम निरधारा। सो कोइ साधू करै बिचारा॥
आगे कहौं पचासी पवना। ता कर नाम भेद गुन बरना॥

४० / घट रामायण
भिनि भिनि नाम बिधी बतलाऊँ। पवन पचासी बरनि सुनाऊँ॥
पिंड में पवन पचासी बासा। सो निज भाखौं भेद खुलासा ॥
॥ नीर के नाम ॥
अर्थ-प्रथम 'अजीत' जल का वर्णन करता हूँ। दूसरे जल का नाम 'कर्त्ता' जल है। तीसरा जल,
अनूप है। चौथा पहचाना गया जल 'मुक्ति' जल है। पाँचवाँ जल 'पुरइन' के नाम से प्रमाण रखता है
और छठाँ जल 'अंबुज' जल कहा गया है। सातवाँ जल 'विषया' है और आठवाँ जल 'अटला सुर' है॥
नवा नीर दुख को नष्ट करने वाला 'नाटक' है। दसवाँ जल दसों द्वारों को छेदने वाला है। एकादश
नीर काल है-बारहवाँ जल जहाँ जीव प्रस्थान करता है (या जीव जल है)।।
तेरहवाँ जल 'पुरुष' का ध्यान है-जो उसे बूझता है, उसे पिंड का ज्ञान हो जाता है। चौदहवें जल में
जीव की संसक्ति है पन्द्रहवाँ जल वह है जिससे लोकपीड़ा झेली जाती है॥
सोलहवाँ जल स्वर्ण का साथी है और सत्रहवां जल रूपरस का आनन्द है। अट्ठारहवाँ जल 'बोल'
है और उन्नीसवाँ जल पुष्प रंग से श्रेष्ठ है। बीसवें जल की 'कलंगी' के नाम से पुकारा जाता है और
उसका परिचय अपने शरीर के भीतर ही होता है। इक्कीसवाँ जल सुख सागर धाम का है, उस स्थान पर
'भ्रमर-कमल' दोनों उलझे हैं॥
बाइसवाँ जल घट मूल का राजा है और तेईसवाँ जल निराशा में बजता रहता है। चौबीसवाँ जल
चतुर सुजान है और पच्चीसवाँ जल बादल का प्रमाण है॥
तीसवाँ जल बल का भार है और इकतीसवाँ जल संसारी है। बत्तीसवाँ जल निर्गुण ब्रह्म की सृष्टि
है और तैंसवाँ जल आलस नाम का मीठा जल है। चौंतीसवें जल का 'सरोसिल' नाम है और पृथ्वी को
पैंतीसवाँ जल बताता हूँ॥ छत्तीसवें जल में 'कामिनी' का निवास है-वह ब्रह्मा और विष्णु का भोग
विलास है॥
जीव जन्तुओं का जल जीवन में निवास है-ये सभी काल के वश में होते हैं। छत्तीस जलों का इस
प्रकार नाम निर्धारित है और इन पर बिरला साधु ही विचार करता है॥
आगे में पचासी वायु का वर्णन करता हूँ-उनका नाम तथा भेद यहाँ वर्णित है। उनके भिन्न-भिन्न
नाम और भेद यहाँ बतलाये गये हैं-उन पचासी वायुओं का वर्णन करके सुनाता हूँ।
इस पिंड के भीतर पचासी पवनों का निवास है। मैं उनका स्पष्ट भेद करके वर्णन करता हूँ॥
पवन के नाम
१. रजलाय पवन १४. उपजीत पवन २६. सुख रोग पवन
२. केदार पवन १५. जगजीत पवन २७. ज्ञान कुंभ पवन
३. विलंभ पवन १६. पर राज पवन २८. मैना ऊँचा पवन
४. समीर पवन १७. बलकुंभ पवन २९. त्रिकोध पवन
५. गुरभो पवन १८. पतराज पवन ३०. किवलास पवन
७. श्रुतिअंध पवन १९. बलभेद पवन ३१. करनास पवन
८. नलपती पवन २०. बारुन पवन ३२. रस नाग पवन
९. ब्रह्मराज पवन २१. कुभेर पवन ३३. जनजीत पवन
१०. मंदोष पवन २२. जगजाय पवन ३४. सकरीत पवन
११. सकल तेज पवन २३. बेधुन्ध पवन ३५. बेलोक पवन
१२. मन सोत पवन २४. सकलंध पवन ३६. मनमोष पवन
१३. जग जोत पवन २५. सल सोख पवन ३७. बेरूप पवन

घट रामायण-भाग १ / ४१
३८. सतसूक पवन ५४. उपमीत पवन ७०. पदमूर पवन
३९. बीज बन्द पवन ५५. दरतीत पवन ७१. करकीत पवन
४०. बीज बन्द पवन ५६. उपमार पवन ७२. धरजीत पवन
४१. अज सार पवन ५७. अभियार पवन ७३. मनमास पवन
४२. नितनाल पवन ५८. अतरीत पवन ७४. सरसूत पवन
४३. शब्दाल पवन ५९. ताइंत पवन ७५. अवधूत पवन
४४. गिरनाल पवन ६०. सुषमंद पवन ७६. आकाश पवन
४५. शुषपाल पवन ६१. असमद पवन ७७. जगबास पवन
४६. रूपान पवन ६२. सोराठ पवन ७८. सुनसूत पवन
४७. विधान पवन ६३. लैघाद पवन ७९. मनभूत पवन
४८. सुभपती पवन ६४. करिहाट पवन ८०. निरधार पवन
४९. छेरती पवन ६५. करुनाट पवन ८१. सतसार पवन
५०. उतरंग पवन ६६. बैराग पवन ८२. आसोग पवन
५१. तितरंत पवन ६७. लैजार पवन ८३. तन भोग पवन
५२. पुरवो पवन ६८. लैलार पवन ८४. जग जोग पवन
५३. सरभो पवन ६९. नदमूर पवन ८५. मन रोग पवन
।। चौपाई ।।
पवन पचासी भाखि सुनाई। कोइ साधू घट भीतर पाई॥
घट में पवन पचासी जाना। निरखा नैन सैन धरि ध्याना॥
साधु आदि कोई करै बिबेका। सोइ निज सार पवन का लेखा॥
तुलसी जिन जिन नैन निहारा। पवन पचासी बरनि सिहारा॥
जिन जिन घट की सैल सँवारा। पवन भवन सोइ गवन गुहारा॥
आगे सुनहु गगन का लेखा। सोला गगन पिंड में देखा॥
जिन जिन सैल सुरति से कीन्हा। सोला गगन भाखितेहि दीन्हा॥
जो सोला का भेद बतावै। सोह सज्जन सत साध कहावै॥
भिन्न भिन्न सोला बिधि भाखों। गगन नाम निज एक न राखौं॥
बिधि बिधि नाम कहौं समझाई। चित दे सुनौं गगन कर नाई॥
अर्थ-पचासी पवनों को कहकर बताया है। इसे कोई कोई साधु ही घट के भीतर प्राप्त करता है घट
पवनों को संख्या पचासी समझो। नेत्र दृष्टि पर ध्यान लगा कर ही इसे मैंने देखा या समझा था॥
कोई विलक्षण साधु ही इसका ज्ञान करता है-वही अपनी साधना के सार तत्त्व पवन का लेखा-
जोखा भी करता है। तुलसी साहब कहते हैं कि जिन-जिन इसे नेत्रों से देखा है-पचासी पवनों का वर्णन
करके वह आनन्दित होता है॥
जिस-जिस पिंड का पर्वत शिखर सँवारा गया है-उसी-उसी ने वायु स्थल के गमन को पुकारा है-
(वर्णन किया है) आगे आकाश का वर्णन देखो-मैंने सोलह आकाश इसी पिंड में देखा है॥१३॥

४२ / घट रामायण
सुरति ज्ञान से जिन-जिन पर्वतों से साक्षात्कार किया-उन्होंने सोलह आकाशों के विषय में बता दिया
है। जो इस सोलह आकाश का वर्णन करता है, वही सज्जन है, वही सच्चा साधु है॥
मैं सोलह आकाशों का वर्णन भिन्न-भिन्न रूपों में कर रहा हूँ। गगन (आकाश) का नाम देकर
एक भी न छोड़ूँगा। उनके विधि-विधि नामों को मैं समझाकर बताऊँगा। हे श्रोतागण! ध्यान देकर
आकाश की भाँति स्थिर चित्त से सुनो॥
॥ गगन के नाम। चौपाई॥
परथम गगन निसाधर मोषा। दूसर गगन पृथी पद पोषा॥
तीसर गगन बिरिछ सुर सोषा। चौथा गगन दिलंभी गोषा॥
पंचम गगन हिरा पद स्यामा। षष्टम गगन निरंजन नामा॥
सप्तम गगन पुलंधर चीन्हा। अष्टम गगन सफानल कीन्हा॥
कदलीकंद नवीं कर नामा। दसवीं गगन जमरस के ठामा॥
एकादस गगन हरि हिरदे नामा। द्वादस गगन अधर परमाना॥
तेरा गगन कलंगी रूपा। चौधा गगन है धुंध सरूपा॥
पद्रा गगन मुक्ति कर नामा। सोला गगन गुप्त निज धामा १ ॥
इतने गगन काया के माईं। सज्जन साध खोज कोइ पाई॥
सोला का कोई भेद बतावै। सोइ सोइ गगन गिरा गति गावै॥
तुलसी निरखि कहा निज लेखा। बूझि साध कोइ करै बिबेका॥
घट भीतर सब गगन बताया। भिनि भिनि नाम गगन गति गाया॥
इतने की कोइ जानै साधा। सो नहिं परै काल के फंदा॥
आगे भेद जो कहौं अनूपा। भँवर गुफा में जोति सरूपा॥
भँवर गुफा छै भाखि सुनाऊँ। जाकौ भिनि भिनि भेद बताऊँ॥
अर्थ-आकाश का प्रथम नाम निशाकर कहा गया है-दूसरा आकाश पृथ्वीपद बताया गया है।
तीसरा आकाश देववृक्ष सोषता है और चौथा गगन दिलंभी है-जो आकाश को प्रतिबिम्बित करता है॥
पंचम आकाश श्यामवर्ण का हीरापद है और छठें आकाश का निरंजन नाम है। सातवें आकाश को
'पुलंधर' के रूप में पहचाना है और आठवें आकाश का नाम सफानल है॥
नवें का नाम कंदली कंद है और दसवाँ गगन 'जमरस' के पास है। एकादश गगन का हृदय नाम है
और द्वादश आकाश अधर है। तेरहवाँ आकाश 'तेलंगी' रूप है-चौदहवाँ आकाश धुंध की भाँति है॥
पन्द्रहवाँ आकाश मुक्ति के नाम का है-सोलहवें गगन का धाम गुप्त है। इतने आकाश शरीर के
मध्य हैं। विरले सज्जन तथा साधु इसे खोज पाते हैं। जो आकाश में स्थित नाद की ध्वनि का गान करता
है, वही कोई विरला ही सोलह आकाश का भेद बता सकता है॥
तुलसी साहब ने उन्हें भलीभाँति देखकर अपना लेखा कहा है-कोई साधुजन ही इसको समझ कर
इसका विवेक कर सकता है। इसी घट के भीतर समस्त आकाश को बताया गया है। गगन की गति के
अनुसार साधुजनों ने उसका भिन्न-भिन्न नाम बताया है॥
१. मु० दे० प्र० की पुस्तक में कड़ी ८ में 'गुप्त निज' की जगह 'मुक्ति कर' छपा है (जो कि ठीक नहीं हो
सकता क्योंकि वहीं नाम पंद्रहवें गगन का है)।

घट रामायण / ४३
कई साधु इतने तत्त्वों का जब ज्ञान कर लेता है तो वह काल के फंदे में नहीं पड़ता। आगे जो उसके
अनुपम भेदों का वर्णन करेगा-वह भ्रमर गुफा में ज्योति स्वरूप समझा जाएगा। मैं अब छः भ्रमर
गुफाओं का वर्णन करता हुआ उनके भिन्न-भिन्न भेदों को बता रहा हूँ॥
॥ भँवर गुफा के नाम ॥
परथम बेहद नाम सुनइया। भँवर गुफा बिच बास करइया ॥
दूसर नाम निरखि निरधारी। तीसर नाम मुक्ति पद प्यारी ॥
चौथा नाम उनमुनी स्यामा। सोइ सब जोगिन का बिसरामा ॥
पंचम नाम हरी हद सूना। छठवाँ चदर अधर पर धूना ॥
छई छर भँवर गुफा दरसाई। तुलसी नैन नजरि में आई ॥
आगे भाखों भेद निहारा। छै त्रिकुटी घट माहिं सिहारा ॥
जा कौ नाम ठाम दरसाऊँ। भिनि भिनि भाव भेद समझाऊँ ॥
अर्थ-भ्रमर गुफा का प्रथम नाम 'बेहद' सुना गया है-वह भ्रमर गुफा के बीच निवास करता है।
दूसरा भेद 'नरधारी' नाम से समझो। तीसरा नाम 'प्रिय' मुक्तिपद है। चौथा नाम भेद श्यामल उनमनी है-
वही सम्पूर्ण योगियों के लिए विश्राम स्वरूप है। पाँचवाँ नाम ( भेद ) हरीहद शून्य है। छठवाँ 'चंदर' है-
जिसका स्थल ओष्ठ है। छठवाँ भँवर गुफा में 'छर' के रूप में दिखाई पड़ता है-तुलसी साहब कहते हैं
कि वह निरन्तर दृष्टि में आती रहती है।
घट के भीतर स्थित छः त्रिकुटियों का वर्णन करता हूँ आगे मैं उनके भेदों को देखकर वर्णन कर
रहा हूँ। मैं इन त्रिकुटियों का नाम तथा स्थान बताऊँगा और उनके भिन्न-भिन्न भाव भेदों को भी
समझाऊँगा ॥
॥ त्रिकुटी के नाम - चौपाई ॥
प्रथम कहौं रुकमन्दर नाऊँ। काल कौ चक्र फिरै तेहि ठाऊँ ॥
दूसर बली बिजै बल सोई। षटदल कँवल फूल जहँ होई ॥
तीसर नाम मुकर मनि जोई। मन बुधि निद्रा से सुख सोई ॥
चौथा नाम सब्दनी होई। नौ नाड़ी सुपने दे सोई ॥
पंचम नाम गोमती गाऊँ। अठदल कँवल फूल तेहि ठाऊँ ॥
हंसमुखी छठवीं कर नामा। हंस बिहंग बसै तेहि ठामा ॥
अर्थ-प्रथम त्रिकुटी का नाम एकमन्दर है। उस स्थान पर काल चक्र विचरण करता रहता है। दूसरे
का नाम बली है जो अपने विजय बल से युक्त है तथा उसके पास ही घट दल कमल पुष्प स्थित
है ॥ १॥
तीसरे का नाम 'मुकुरमणि' है, जहाँ मन और बुद्धि निद्रा में सुखपूर्वक सोते रहते हैं। चौथी त्रिकुटी
का नाम शब्दनी है-वह नौ नाड़ियों को स्वप्न में रखकर सोती रहती है। ॥२॥
पाँचवाँ नाम गोमती है, उस स्थान पर अष्ट दल कमल फूल के रहता है। छठें का नाम हंस मुखी
है-उस स्थान पर 'हंस पक्षी' निवास करते हैं ॥ ३ ॥
॥ दोहा ॥
छै त्रिकुटी बिधि बिध कही, दृग निज नैन निहार।
तुलसिदास घट भीतरे, देखि कही सब सार ॥