घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ / घट रामायण
सखि सुरति मंज समान संजम। मैल मन संग दुख खलै ॥ २ ॥
सुनि सुलभ लखन लखाव सजनी। दुलभ दृढ़ कलिमल दलै ॥
मोहिं दीन लीन जो चीन्ह चेरी। तपन बिच तन मन जलै ॥ ३ ॥
सखि चरन सरन निवास निसदिन। दुख दवा मोहिं अब मिलै ॥
गुरु सरन मन्त्र मिलाप तुलसी। जबर सँग जुलमी टलै ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! गुरु को साथ लेकर उसमें भाव एवं लोक के प्रति भेदभाव दर्शित करो-मालुम
नहीं, उनके साहचर्य से आध्यात्मिक रहस्य किस मार्ग में मिल जाएं। जिस यन्त्र से लोक वासनाओं के
प्यास का पतन हो पल पल उसके विषय में सोचो और यह भी स्मरण करो कि गुरु को अन्तिम रूप से
स्वीकार करके मन किस प्रकार साधना लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता जाए ॥ १ ॥
गुणों की कन्दरा के प्रवेश करने पर मन की आश्चर्यजनक गति दिखाई पड़ती है और सहस्रार तक
अन्य साधन कैसे रह सकते हैं। हे सखि! सुरति में निमज्जित (मंज) और वैसा ही संयम आवश्यक है।
मैले यंत्र के साथ निश्चित ही चित्त यहाँ दुखी रहता है ॥ २ ॥
हे सजनी! उन सर्व सुलभ लक्षणों (लखन) को दिखावो जो दृढ़तापूर्वक दुर्लभ कलिमल का दलन
कर दे। गुरु इस दीन को दासी के रूप में पहचान लिया है और अब ईश्वर के विरह में मेरे तन मन दोनों
जल रहे हैं ॥
हे सखी! मेरा निवास तो अब गुरुचरणों में हो रहा है और इसीलिए दुःख रूपी दावाग्नि मिलती
हैं, किन्तु समीप नहीं आते। तुलसी साहब कहते हैं कि गुरु द्वारा मिले मंत्र से मेरा तादात्म्य हो उठा है-
अतः शक्तिमान का साथ है और कलिकाल का जुल्म टल गया है॥ ४ ॥
॥ छन्द ९ ॥
जब बल बिकल दिल देखि बिरहिन। गुरु मिलन मारग दई ॥
सखि गगन गुरु पद पार सतगुरु। सुरति अंस जो आवई ॥ १ ॥
सुरति अंस जो जीव घर गुरु। गगन बस कंजा मई ॥
अलि गगन धार सवार आई। ऐन बस गोगुन रही ॥ २ ॥
सखि ऐन सूरति पैन पावै। नील चढ़ि निरमल भई ॥
जब दीप सीप सुधारि सजि कै। पछिम पट पद में गई ॥
गुर गगन कंज मिलाप करि कै। ताल तज सुन धुनि लई ॥ ३ ॥
सुनि सब्द से लखि सब्द न्यारा। प्रालबद जद क्या कही ॥
जेहि पार सतगुरु धाम सजनी। सुरति सजिभजि मिलिरही ॥ ४ ॥
अस अलल अंड अकार डारै। उलटि घर अपने गई ॥
येहि भाँति सतगुरु साथ भेंटे। कर अलो आनँद लई ॥ ५ ॥
दुख दाउ कर्म निवास निस दिन। धाम पिया दरसत वहीं ॥
सतगुरु दया दिल दीन तुलसी। लखत भै निरभै भई ॥ ६ ॥
अर्थ-जब इस विरहिणी के हृदय को गुरु ने व्याकुल देखा, अपने मिलन द्वारा उसे (आगे का)
मार्ग दिखाया) हे सखी! गुरु गगन-गुफा के उस पार हैं और जब 'सुरति' का प्रकाश (आवेग) आता
है॥ १ ॥