घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ३९
अब पानी के विषय में विचार सुनो। इन चारों ने मिलकर पृथ्वी को आकार दिया है। इस प्रकार
पाँचों तत्त्व उत्पन्न हुए हैं और अपने-अपने द्वारा इन्होंने पिंड की सज्जा की है॥
पानी की बूँद ने सृष्टि उत्पन्न की। उसी में चैतन्य तत्त्व प्रविष्ट हो गया। अब मैं जल का वर्णन
करता हूँ। उसे मैंने भिन्न-भिन्न पिंडों में इस प्रकार देखा है॥
मैं विधिपूर्वक उसकी विधि का वर्णन कर रहा हूँ। छत्तींस प्रकार के जल हैं और उसकी पचासी
प्रकार की धाराएँ हैं। जिन-जिन जलों को मैं तुम्हें बतलाऊँगा और उन छत्तीसों जलरूपों का वर्णन
करके सुनाऊँगा। नाना प्रकार के रूपों से मैं उनका नाम बताऊँगा और उन जलों के अलग-अलग नामों
का वर्णन करूँगा।
॥ नीर के नाम ॥
॥ चौपाई ॥
जल अजीत परथम करि गाऊँ। करता जल दूसर कर नाऊँ॥
और अनूप तीसर जल कीन्हा। चौथा मुक्ति नीर को चीन्हा॥
नीर पाँच पुरइनि परमाना। अंबुज षष्टम नीर बखाना॥
नीर सात बिषया झर होई। नीर आठ अटला सुर सोई॥
नवाँ नीर नाटक दुख भेदा। दसवाँ नीर दसौ मन छेदा॥
एकादस नीर काल को जाना। द्वादस नीर जिव करै पयाना॥
तेरवाँ नीर पुरुष कौ ध्याना। जो बूझै घट परचै जाना॥
जीव नीर चौधा में भूला। पंद्रह नीर भीर सहै सूला॥
सोला नीर कनक कर संगी। सत्रा नीर रूप रस रंगी॥
अठरा नीर बोल दे नाऊँ। उन्निस नीर कुसुम रंग राऊ॥
बिसवाँ नीर कलंगी गाई। निज घट भीतर परचा पाई॥
इकिस नीर सुख सागर धामा। भँवरकंज उरझा तेहि ठामा॥
बाइस नीर मूल घट राजा। तेइस नीर निरासू बाजा॥
नीर चौबिसवाँ चतुर सुजाना। पच्चिस नीर मेघ परमाना॥
छब्बिस नीर कहौं मैं काला। सताइस नीर घनासुर नाला॥
अठाइस नीर रूप द्वै आना। उन्तिस नीर अभया दृग दाना॥
तिसवाँ नीर आहि बल भारी। इकतिस नीर आहि संसारी॥
बतिस नीर निरगुन है सीठा। तैंतिस आलस नीर है मीठा॥
चौंतिस नीर सरोसिल नाऊँ। पृथ्वी पैंतिस नीर बताऊँ॥
छत्तिस नीर कामिनी बासा। ब्रह्मा बिस्नु का भोग बिलासा॥
जीव जंतु जल जीव निवासा। ये सब परे काल की फाँसा॥
छत्तिस नीर नाम निरधारा। सो कोइ साधू करै बिचारा॥
आगे कहौं पचासी पवना। ता कर नाम भेद गुन बरना॥