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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 31

३८ / घट रामायण
ध्यान धारण करने वाले, विज्ञानी सन्यासीगण, वन में निवास करने वाले संत के मार्ग का
अनुसरण करने वाले तथा अनेक अनेक साधुजन, योगी, सन्यासी के लिए यह माया काल की फाँस
है-परमहंसों का तो कोई प्रमाण ही नहीं है॥
ये अपने ज्ञान (या वेद) का वर्णन करते रहते हैं किन्तु उसके रहस्य को नहीं जानते। शास्त्र
सिन्धुओं का जिन शास्त्रज्ञों ने मार्ग ग्रहण कर रखा है, इसे विचार करके सुनो कि संतों की गति
विलक्षण होती है (वे सर्वज्ञ हैं) किन्तु चौथे पद (निर्वाण पद) की कोई सीमा नहीं है॥
यदि कोई इस बात पर संदेह करता है तो वह महामति से रहित है। वैसे, सत्संगति के बिना कोई
ज्ञान सूझता नहीं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं बुद्धिहीन व्यक्ति भी संतों की कृपा से ज्ञानदृष्टि प्राप्त की
और उस परम तत्त्व को पिंड रूपी तट (घट घाट) पर प्राप्त किया॥
॥ सोरठा ॥
पानी पवन निवास, कँवल बास बिधि सब कही।
सब्द सुरति कर बास, वै निरास अच्छर रहत ॥ १ ॥
कह्यो ग्रन्थ घट सार, गुरु परचै निज कँवल में।
जिन जिन पाय निवास, सो लखिहैं ये भेद सब ॥ २ ॥
अर्थ-जल तथा वायु में निवास करके प्रत्येक प्रकार से सहस्रार में वास (सुगंधि)द्वारा एहसास
कराते हुए शब्द रूप में वे सुरति समाधि में निवास करते हैं। उसे अक्षररहित समझकर सन्यासी योगी
आदि उसमें स्थित रहते हैं॥ १ ॥
पिंड के इस सार तत्त्व का वर्णन इस ग्रंथ में मैं कर रहा हूँ। गुरु द्वारा परिचित कराने पर अपने ही
ब्रह्म कमल में वह दिखाई पड़ा। जिन-जिन सन्तों ने अपने चित्त में आत्मतत्त्व का विश्राम प्राप्त कर
लिया है-वे इसके इन भेदों को देखेंगे॥ २॥
॥ चौपाई ॥
अब ब्रह्मांड का भाखौं लेखा। भिन्न भिन्न घट भीतर देखा॥
पाँच तत्त का कहौं बिचारा। अगिनि अकास नीर निरधारा॥
पृथ्वी पवन सकल कर भेदा। पिंड ब्रह्मांड का रच्यो निबेडा॥
लखि अकास बाई सँग आई। दोइ मिलि निज अगिनी उपजाई ॥
अब पानी का सुनौ बिचारा। ये चारौ मिलि मही अकारा॥
ऐसे पाँच तत्त उपराजा। निज तन कीन्ह देह कर साजा॥
पानी बुँद सृष्टि उपजाई। ता में चेतन सत्त समाई॥
अब पानी का भाखौं लेखा। भिन्न भिन्न घट भीतर देखा॥
ता की बिधि बिधि कहौं बिचारा। छत्तिस नीर पचासी धारा॥
जोड़ जोड़ नीर नाम बतलाऊँ। नीर छतीसो बरनि सुनाऊँ॥
बिधि बिधि नाम नीर समझाऊँ। नाम नीर भिन्न भिन्न दरसाऊँ॥
अर्थ-अब मैं ब्रह्मांड के विषय में वर्णन करता हूँ। उसे मैंने भिन्न-भिन्न पिंडों (घटों) के भीतर
देखा है। पंच तत्त्वों पर मैं सबसे पहले विचार कर रहा हूँ। अग्नि, आकाश, जल ये तीनों पृथक् हैं॥
पृथ्वी तथा वायु सभी के भेद हैं और इस प्रकार इनसे पृथ्वी तथा ब्रह्मांड की रचना हुई है। आकाश
को देखो, उसके साथ वायु उत्पन्न हुई है। इन दोनों ने मिलकर अग्नि को पैदा किया है॥