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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

३४ / घट रामायण
जिन्होंने इस साधना से उपकृत करके मुझे सुरति तथा निरति का ज्ञान कराया है, उसके बाद, ऐसे
सन्तों की मैं वन्दना करता हूँ।
जिन सन्तों ने मुझे सुरति का ज्ञान कराया और तत्त्व को देखने की दृष्टि सुधारी ( सिहारी )
बलिहारी हैं, मैं ऐसे सन्तों के चरणों की शरण में हूँ॥
ऐसे शूरमा सन्तों की शरण में मैं आया और उन्होंने 'सुरति साधना' को समझाया और उनके द्वारा
ही मैं बलशाली तत्त्वज्ञ सन्तों के रहस्य को समझ पाया॥
मैं अज्ञानी, दीन व्यक्ति समर्पित भाव से जब गुरु की शरण में गया तब सन्तों के चरणों में रहकर
सतगुरु को पहचाना॥
सतगुरु अगम्य समुद्र की भांति आनन्ददायी हैं, जिन्होंने मुझको सत्य के गृह तक पहुँचने की रीति
तथा राह दिखाई हैं॥
मैं बार-बार सन्त के चरण कमलों में अपना शीश झुकाता हूँ क्योंकि दीन (संसक्ति रहित) होकर
ही सन्तों के ज्ञान (उनकी अवस्थाओं) का गान कर सकता हूँ-अन्यथा नहीं॥
मुझे दीन समझकर सन्तों ने मुझे ज्ञान चक्षु प्रदान किया और फिर मैं उनकी चरणों की शरण में
जाकर और उसे धारण करके यह (घट रामायण) कही॥
मैं तो उनके चरणों में दास्य (चेरा) भाव से आया और मुझे अत्यन्त अधम समझ कर उन्होंने देखा
(स्वीकार किया)॥
हे प्रभु! मैं तो आपके दास का दास (प्रति प्रति दास) हूँ-इन सन्तों के बिना इस संसार से किसी को
मुक्ति पाना सम्भव नहीं है॥
संत दयालु हैं, उनकी कृपा आनन्ददायी है, आपकी कृपा से अधम (पापी जन) भी मुक्ति प्राप्त
कर लेते हैं।
कोई भी व्यक्ति अपने आदि स्वरूप और अन्तिम स्वरूप को बिना सन्तों के नहीं प्राप्त कर सकता
(जान सकता), तुच्छ तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उन्हीं सन्त की शरण में हूँ॥
जो कुछ करणीय है, उसे सन्त जन ही करते हैं और बिना सन्त जन के ज्ञान मार्ग नहीं प्राप्त हो
सकता। वेदों के सार स्वरूप संत जन ही मेरे इष्ट है। सतगुरु की प्राप्ति परम पद संत जन की सहायता से
ही सम्भव है॥
सतगुरु (ब्रह्म) अविनासी सत्य पुरुष हैं। इसका (दास का) मार्ग कंटकमय व फाँस मय था, जिसे
समाप्त करके उसने रास्ता दिया। सतगुरु के चरणों में निवास करने वाले मुझ जैसे व्यक्ति का मन
सहस्रदल में स्थित है। अपने शिष्य को वे निरन्तर स्मरण आते हैं। वे उसे अपना दासत्व दे डालते है॥
सुरति-निरति आदि योग प्रक्रियाओं को अपना कर साधक (मैं) सतगुरु के चरणों के चरणों की
शरणागति में लौ लगा ली। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं बार-बार सतगुरु की बलिहारी जा रहा हूँ।
उन्होंने मुझ अधम को स्वीकार करते हुए उसके पापों को नहीं देखा॥
सम्पूर्ण सचराचर की मेरे समान ही उन्होंने एक समान मानव-दया की और उनके सारे अनहित को
हितमय कर दिया॥
सभी के चरणों पर शीश डालकर मैं बन्दना करता हूँ और अपने आन्तरिक स्नेह (लार-लाड़) से
सबके प्रति प्रीति प्रगट की। बार-बार चरणों में शीश डालकर तुम्हारी इस प्रकार की बन्दना करता हुआ
गा रहा हूँ॥
पुनः मैं सत्यभाव (निष्ठा) से सतगुरु की वन्दना करता हूँ, जिनकी कृपा से ही मैंने अदृश्य वस्तु को
प्राप्त किया है। सतगुरु अगम्य हैं, अरूप हैं, शरीर विहीन हैं-जिनके ज्ञान के विषय में संत भी नहीं
जानते॥