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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

घट रामायण / २७
चित चीन्ह जैसे खेल चौपड़। जुग नरद घर आवही ॥ ५ ॥
जिमि किरनि भास निवास रबि में। गगन मर्म मिलावही ॥
अलि गगन नास अकास बिनसै। रबि रहन नहिं पावही ॥ ६ ॥
अलि सिंधु सूरज ब्रह्म कहि नद। किरनि जीव कहावही ॥
सब ठाट बाट बिराट बिनसै। सुरज कहँ होइ रहावही ॥ ७ ॥
सखि सुरज ब्रह्म विनास किरनी। जब अकास नसाइये ॥
सखि सुरज कहौ केहि ठाम रहि। सोइ समझ खोज लगाइये ॥ ८ ॥
अर्थ-हे री सखी! इस अगम्य (अध्यात्मिक) लोक को देखकर संत सतगुरु ने मुझसे कहा। यह
आध्यात्मिक लोक तीनों लोकों से विलक्षण है और इस लोक में प्रवेश का मार्ग मुझे गुरु ने ही बताया
है ॥ १ ॥
इस ज्ञान के बाद मुझे लगने लगा कि सिन्धु शब्द ही सतगुरु है और उस जल की चमक शिष्य है।
गुरु तथा शिष्य को सुरति ध्यान ही एक करता है। हे सखि! देखो, इस सिन्धु में ही 'सत् लोक' समाया
हुआ है और शिष्यगण सिन्धु तथा बिन्दु के मिलन के अनुभव का ही गुणगान करके सुनाते रहते
हैं॥२॥
हे सखि! सिन्धु एवं शिष्य रूपी बिन्दु का मिलाप ही सतगुरु (ब्रह्म) है। यह सम्मिलन उसी प्रकार
है, जैसे सूर्य और उसकी किरणों का मिलाप। हे सखि, समुद्र का जल जैसे अपने में आत्मसात् करके
बादल पुनः उसे भूमि पर बरसाता है-उसी प्रकार शिष्य भी सत्गुरु के सम्पर्क में ब्रह्मानुभूति से आत्म
साक्षात्कार करके उसे पुनः लोक में जन समुदाय के बीच रखता है ॥ ३ ॥
हे सखि! वही जल तथा वायु तथा तालाबों को सिन्धु समझकर उसमें पुनः समाविष्ट हो उठता है।
ठीक उसी प्रकार, शिष्य तथा सतगुरु बिन्दु तथा समुद्र हैं जो परस्पर एक दूसरे से परिपक्व होकर पुनः
उन्हीं में मिल जाते हैं। अतः एक दूसरे से मिले होने के उनके स्वरूप का मैं वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥
हे सखि! साधक शिष्य तथा गुरु दोनों जल को ही जल के माध्यम से ही एक रूप करके भूमि
(माया) होने का भ्रम दूर करते हैं। अपने चित्त से पहचानों जैसे चौपड़ खेल के खिलाड़ी दो हैं किन्तु
एक ही घर को लौटते हैं ॥ ५ ॥
जिस प्रकार किरणों के प्रकाश का निवास सूर्य में है और आकाश इस मर्म का नियन्ता है। हे
सखि! उसी प्रकार, जैसे आकाश का विनाश होने के बाद समझ शून्य नष्ट हो जायेगा और वहाँ सूर्य
रहने नहीं पाएगा ॥ ६ ॥
जब आकाश नष्ट हो जाएगा तो हे सखि! सूरज की किरणें भी विनष्ट हो उठेंगी-तब बताओं, वह
सूरज कहाँ है, किस स्थान पर चला गया, सोच समझ कर खोज करो ॥ ८ ॥
सोइ धाम ठाम ठिकात सजनी। घर समझ जहँ जाइये ॥
नहिं और आस बिनास सबको। कोइ रहन नहिं पाइये ॥ ९ ॥
सखि नीर छीर मिलाप समुन्दर। बदर फिरि भरि लावहीं ॥
जल बरसि नद मिलि समुंद आवै। जाइ पुनि फिरि आवही ॥ १० ॥
अस जीव आवागवन माहीं। ब्रह्म जीव कहावही ॥
बस कर्म काल बिनास निस दिन। अगम घर नहिं पावही ॥ ११ ॥
अलि समुन्द आदि बुन्याद कह सोइ। स्त्रोत केहि घर गावही ॥