घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ / घट रामायण
अर्थ-तुलसीदास कहते हैं कि मैंने भली भांति मूल्यांकन करके (तोल) एवं सुस्पष्ट (तरास) कर
पिंड में निहित तत्त्व का वर्णन किया है। इसको वही शिष्य प्राप्त करेंगे (समझेंगे) जिन्होंने पिंड रचना से
परिचय प्राप्त कर लिया है॥ १॥
इस पिंड की निवास-स्थली जल तथा वायु है और इसी में सहस्त्रार कमल का निवास है, ऐसा
सभी ने बताया है। इन्हीं दो तत्त्वों से जीव, काल, श्वास तथा आकाश की उत्पत्ति हुई है॥ २॥
इस घट के भीतर घटाकाश में प्रकाश को देखकर समस्त ब्रह्मांड का वर्णन (इस प्रकार) रावण
राम संवाद के रूप में इसके आदि अन्त को देखकर किया॥ ३॥
॥ चौपाई ॥
जो कोई घट का परचा पावै। कँवल भेद ता को दरसावै॥
भिन्न भिन्न कँवलन बिधि गाई। स्वाँसा भिन्न बिधी दरसाई॥
निज निज तत्त कहेऊ मैं जानी। परखेंगे कोइ संत सुजानी॥
मैं गति नीच कींच कर सानी। कहत लजाउँ अगम गति जानी॥
जो अपनी गति कहहुँ बिचारी। तौ मन मोट होत अधिकारी॥
मैं किंकर संतन कर दासा। घट घट देखा तत्त निवासा॥
ता की गति ग्रन्थन में गाई। बूझै जिन सत संगति पाई॥
सूरति सार सब्द जिन पाया। दस गृह सैल जिन करी अकाया॥
अर्थ-जो कई व्यक्ति इस घट (पिंड) से परिचय प्राप्त कर लेता है, उसे सहस्त्रार कमल का रहस्य
ज्ञात हो जाता है। कमलों की भिन्न-भिन्न दशाओं का वर्णन किया गया है, और श्वास के भिन्न-भिन्न
रूप बताये गये हैं॥ १॥
मैं समझकर भिन्न-भिन्न तत्त्वों का वर्णन करूँगा और उसे कोई चतुर मर्मज्ञ संत ही समझेंगे। काया
के निकृष्ट कीचड़ में सनी हुई अपनी मति द्वारा मैं उस निर्गुण की अगम्य गति (ज्ञान) कहने में लज्जा
का अनुभव करता हूँ॥ २॥
यदि मैं अपनी गति (ज्ञान) का विचार कर वर्णन करता हूँ तो मेरी यह ज्ञानाधिकार सम्बद्ध मति
मोटी (अज्ञान से परिपूर्ण) समझी जाएगी। मैं तो दास हूं और विशेषकर सन्तों की और मैंने प्रत्येक घट-
घट में उसी का निवास देखा है॥ ३॥
उसके ज्ञान का वर्णन अनेक ग्रन्थों में किया गया है जिसने सत्संगति की है, वही उसे समझ सकता
है, जिसने सुरति समाधि का शब्द प्राप्त कर रखा है और जिसने शरीर के दसों गृहों में स्थित पर्वतों को
कायामुक्त कर रखा है॥ ४॥
॥ सोरठा ॥
जिन मानी परतीत, अधर रीति जा ने लखी।
सब गति कहहुँ अजीत, सत्त बचन परमान कै॥ १॥
तुलसी सब्द सम्हार, वार पार सगरी लखी।
पकी चखी स्रुति सार, लार सब्द सूरति गई॥ २॥
अर्थ-जिन्होंने विश्वास किया और जिसने पिंड के अधर (अन्दर) की दशाएँ देख ली हैं, उनके
वचन सत्यनिष्ठा के प्रमाण है॥ १॥
तुलसी साहब कहते हैं कि जिसने अनाहत शब्द को सम्हाल रखा है और इस पार-उस पार के