घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / २९
फूली बन फुलवारि, भीतर घट के कहि कही॥
खग मृग सरवर ताल, गुरु निहाल करि लखि लई॥ २॥
अर्थ-तुलसीसाहब बताते हैं कि ब्रह्म का निवास ऐसे स्थान पर है जो सर्वथा अगम्य है। सुरतियोग
के फलस्वरूप मैंने भी वहीं अपनी निवास स्थली बना ली। वह मेरा ब्रह्म पति आनन्द का अधिष्ठान है
और वह अतुलनीय विलक्षण मेरे हृदय के अन्तरतम में है॥ १॥
उसके साथ रहने पर इस शरीर के अन्तरतम की पुष्प वाटिका खिल उठी है और इसी शरीर में
उसकी कृपा से मैं पक्षी, मृग (वन पशु), सरोवर, ताल आदि सब कुछ देख रहा हूँ॥ २॥
॥ सोरठा ॥
तन मन ब्रह्मांड पसार, अंड अंड नौखंड लौं।
सो घट लखन मँझार, करत सैल ब्रह्मांड की॥ १॥
सतगुरु गगन गुहार, गगन मगन स्रुति मिलि रही।
मन्दिर मगन निहार, कंज भान भिन के कही ॥ २॥
अर्थ-इस शरीर तथा मन के अन्दर ब्रह्मांड फैल उठा है, अंडों की भाँति ब्रह्मांड जैसे इसी में स्थित
हो। मैं इस (वाणी) के अन्दर ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की जैसे सैर (सैल) कर रहा हूँ॥ १॥
इस पिंड रूपी आकाश में सतगुरु (ब्रह्म) की ही वाणी सुनाई पड़ रही है-उस प्रभु की ध्वनि इसी
हृदयाकाश में इसी सुरति के साथ विलीन भी हो रही है। मैं आनन्दित भाव से आत्मा के अधिष्ठान रूप
शून्य गगन के उस मंदिर को देख रहा हूँ, जहाँ भिन्न-भिन्न कमल हैं और भिन्न-भिन्न सूर्य बताये जाते
हैं॥ २॥
॥ दोहा ॥
भास भवन घट में लखी, सलिल कँवल के माहिँ।
पदम पार बेनी बसी, लसी अधर चढ़ि धाइ॥
अर्थ-ब्रह्म का अधिष्ठान मैंने शरीर में अनुभव किया, यहीं बिना जल के कमल देखा-इस कमल
के उस पार बनी हुई त्रिवेणी (सहस्रार की सन्धिस्थली) दिखाई पड़ी-यह सब हमने अन्दर-अन्दर ही
दौड़ते हुए शून्य शिखर पर चढ़कर देखा॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तोल निहार, गुरु अगम पद पदम हीं।
कर दृग ऐन अधार, पार परस पट भवन में॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने भलीभाँति तौलकर (मूल्यांकन करके) देख लिया है कि गुरु
के चरण-कमल ही अगम्य (को जानने के हेतु) हैं। इस संसार के रहस्य को आवृत किए हुए पट
(परदे) को देखने के लिए गुरु के ज्ञान दान से प्राप्त निर्मल दृष्टि को ही आधार बनाओ॥
॥ शब्द चरचरी ॥
तुलसिदास भास भवन, देखा घट माहीं।
लाई स्रुति सलिल कँवल, पदमन पर जाई॥ टेक॥
सतगुरु गिरि गगन, मगन, मंदिर मानौ अजूब।