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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

घट रामायण / ३३
मैं तौ चरन भाव चित चेरा। मोहिं अति अधम जानि कै हेरा॥
मैं तौ प्रति प्रति दास तुम्हारा। संत बिना कोई पावै न पारा॥
संत दयाल कृपा सुखदाई। तुम्हारी सरन अधम तरि जाई॥
आदि न अंत संत बिन कोई। तुलसी तुच्छ सरन में सोई॥
जो कुछ करहिं करहिं सोइ संता। संत बिना नहिं पावै पंथा॥
मोरे इष्ट संत श्रुति सारा। सतगुरु संत परम पद पारा॥
सतगुरु सत्तपुरुष अबिनासी। राह दीन लखि काटी फाँसी॥
कँवलकंज सतगुरु पद वासी। सूरति कीन दीन निज दासी॥
सूरति निरत आदि अपनाई। सतगुरु चरन सरन लौ लाई॥
बार बार सतगुरु बलिहारी। तुलसी अधम अघ नाहिं बिचारी॥
बन्दौं सब चर अचर समाना। जानौ तुलसी दास निदाना॥
मैं किंकर पर दया बिचारा। अनहित प्रिये करौ हित सारा॥
सब के चरन बन्दि सिर नाई। प्रिये लार लै प्रीति जनाई॥
तुम प्रति भूल बंद अस गाई। बार बार चरनन सिर नाई॥
पुनि बन्दौं सतगुरु सत भावा। जिनसे बस्तु अगोचर पावा॥
सतगुरु अगम अरूप अकाया। जिनकी गति मति संतन पाया॥
सतगुरु की कस करहुँ बखानी। सूरति दीन्ही अगम निसानी॥
लख लख अलख सुरति अलगानी। संतकृपा सतगुरु सहदानी॥
सूरति सैल पेल रस राती। सतगुरु कंज पदम मदमाती॥
तुलसी तुच्छ कुछ नहिं जानै। सतगुरु चरन सरन रत मानै॥
सूरति सतगुरु दीन्हि जनाई। नित नित चढ़ै गगन पर धाई॥
सैल करै ब्रह्मांड निहारा। देखै आदि अंत पद सारा॥
निरखा आदि अंत मधि माहीं। सोइ सोइ तुलसी भाखि सुनाई॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड समाना। तुलसी देखा अगम ठिकाना॥
पिंड ब्रह्मांड में आदि अगाधा। पेली सुरति अलख लख साधा॥
पिंड ब्रह्मांड अगम लख पाया। तुलसी निरखि अगाध सुनाया १॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड दिखाना। ता की तुलसी करो बखाना॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि उनके चरणों की शरण की संसक्ति स्वीकार करके मैं सर्वप्रथम
स्वामी सतगुरु की बन्दना करता हूँ॥
१. मुं० दे० प्र० की पुस्तक में "अगाध सुनाया" की जगह "परख गत गाया" और आगे की कड़ी में
"दिखाना" की जगह "समाना" है।