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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

घट रामायण / २५
जीव जो सुरति साधना का अंश है, गुरु के घर में आकर गगन की शून्य गुहा में रहते हुए
कमलमय हो गया। हे सखि! गगन की सहस्त्रारधार में अपने को सँवारती हुई केवल देखने भर के
लिए इन्द्रिय गुणों से जुड़ी दिखती है-अन्यथा वह स्वयं गुरुमय हो उठी है॥२॥
हे सखि! वह उस सहस्त्रार के नील पर्वत पर चढ़कर निर्मल हो उठी और उसकी लौकिक चेतना
विलुप्त हो उठी और वह आत्मा जब अपने दीप्त स्वरूप को थोड़ा और सुधार कर तथा साजसज्जा
करके उस पश्चिमी छोर पर पहुँची (सहस्त्रार बिन्दु के अनाहत नाद के पास) तो उस गुरु के द्वारा
आकाश (शून्याकाश) के सहस्त्रार कमल से मिल करके उसने अनाहद नाद की ध्वनि को सुना॥३॥
शब्द सुनकर तथा शब्दातीत ध्वनि की प्रतीति करके पहले से कहे जाते हुए लोक शब्दों की
निरर्थकता (प्राल बद) के विषय में क्या कहा जाए? हे सजनी! जिसके उस पार सद्गुरु की निवास
स्थली है, मैं सुरति के साथ सजी-धजी उनसे मिल पड़ी॥४॥
ऐसे अंडाकार संसार (अलल) अर्थात् ब्रह्मांड का त्याग करके मैं इससे अलग अब अपनी शून्य
स्थली गगन गुफा में पहुँच गई। इस प्रक्रिया द्वारा मैंने सतगुरु से भेंट किया और हे सखि! सारा आनन्द
प्राप्त कर लिया॥५॥
अपने पति परमात्मा के धाम में रहती हुई दुःख, दावाग्नि एवं कर्म की स्थली रूपी इस संसार को
निर्लिप्त भाव से द्रष्टा की भाँति देखती रहती हूँ। तुलसी साहब कहते हैं कि यह दीनहीन जीव सद्गुरु के
दयाभाव से दर्शक की भाँति इस संसार को देखता हुआ निर्भय हो उठा॥६॥
॥छन्द १०॥
अलि आदि अजर दयाल सतगुरु। मर्म कहौ कहँ लगि कहूँ॥
उस कुटिल खोट मलीन बुधि मैं। चित छली मनमत रहूँ॥१॥
धर धोइ सतगुरु सरस साबुन। ज्ञान सिल जल मल बह्यो॥
सखि मैल मन जस चिकट कपरा। उजल हिये अलि अस भयो॥२॥
जब आदि अटल अनादि रँग में। चटक रँग सतगुरु दयो॥
कहुँ कौन सिफति सुनाइ सजनी। अचल सलिता सिंध लह्यो॥३॥
सिंध सब्द सतगुरु सुरति सलिता। अलि मिलन अस बिधि भयो॥
सिंध बुन्द तन मन बन बिराटा। बूझ बिन बादै बह्यो॥४॥
जब उलटि घर अलि आदि चीन्हेँ। दीन दिल सतगुरु लयो॥
सखि आदि अंत समाद समझी। बरनि बिधि जस जस कह्यो॥५॥
सखि संत सतगुरु बरनि बरनौ। भाखि समझि सुनावही॥
गुरु चारि तन अस्थान अलि सुनि। समझि भेद लखावही॥६॥
सखि प्रथम गुरु सुनि कँवल कंजा। सहस दल पल पावही॥
सखि दुसर गुरु गढ़ गगन ऊपर। कँवल दुइ दल गावही॥
अलि तीनि गुरु तन माहिं पेखौ। चौकवल स्रुति लावही॥७॥
सतलोक चौथे चार सतगरु। अगम सिंध कहावही॥
जबँ सुरति शब्द मिलाप सजनी। संत वोहि घर जावही॥८॥
सखि मूल संत दयाल सतगुरु। पिउ निहाली मोहि करी॥
सत सुरति सिंधु सुधारि तुलसी। सार पद ज़द लखि परी॥९॥