घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 150 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ / घट रामायण
करि खोजि रोज बिचारि मन में। गैल गुरु सँग पावही ॥ १२ ॥
सखि संत चरन निवास चेरी। अधर समझ सुनावही ॥
लखि सिंध बुन्द से अगम आगे। देखि समझि समावही ॥
सोइ समझ सतगुरु सार सजि के। लेख लखन लखावही ॥ १३ ॥
जिमि धार मिलि जल मीन चढ़िके। अधर घर धसि धावही ॥
अलि अमर लोक निवास करिके। सुख अचल जुग पावही ॥ १४ ॥
गुरु कंज सतगुरु मज मिलि के। अंज अमल पिलावही ॥
सज सुरति निरति सम्हार मिलिके। पिलि पुरुष पिय पावही ॥ १५ ॥
एरी अगम दीनदयाल सतगुरु। हाल हरष निहारही ॥
तुलसिदास बिलास कहि अस। संत अज अरथावही ॥ १६ ॥
अर्थ-हे सजनी! उस स्थान को खोजो क्योंकि वही आत्मा का मूल निवासस्थल है, वही उसका
ठिकाना है (ठाँव) है, और वह साधक का घर है तथा उसी को ही अपना समझ कर वहीं जाओ। सभी
के लिए अन्य कोई निवास स्थली की आशा नहीं है तथा वह अन्यत्र नहीं रहने पाएगा ॥ ९ ॥
हे सखि! आत्मा तथा ब्रह्म का मिलाप, नीर-क्षीर मिलन समुद्र से सम्बद्ध है और बादल पुनः पुनः
उसी से ले जाते तथा वहीं दे आते हैं। बादल जल बरसते हैं, वह नदी में आता है और नदी के द्वारा गया
हुआ जल पुनः समुद्र में आता है ॥ १० ॥
इस प्रकार, जीव जगत में आवागमन के कारण केवल जीव कहलाता है और कर्म तथा काल के
प्रभाव से यह विनाशधर्मी जीव अज्ञानता वश ब्रह्म का सानिध्य नहीं प्राप्त करता ॥ ११ ॥
हे सखि! उसी अनादि समुद्र को निर्गुण ब्रह्म समझें, वही जगत का मूल तथा आदि आधार है।
उसका स्रोत कहाँ है, किसी को पता नहीं है। मन में अच्छी तरह से प्रतिदिन विचार करके देखो, उसे
पाने का मार्ग (गैल) गुरु सान्निध्य से ही प्राप्त किया जा सकता है ॥ १२ ॥
हे सखि! सन्त-चरणों में निवास करके उनकी दासी बनो और वे अन्तः लोक में स्थित उस ब्रह्म
विद्या के विषय में बताएँगे। उस मूल ब्रह्म तत्त्व को बिन्दु और सिन्धु के मिलन की दशा के भी आगे
समझकर, देखकर उसमें विलीनता प्राप्त करो ॥ १३ ॥
जिस प्रकार जल तथा धारा पर जलस्थित मछली चढ़कर अपने अन्तर्तम में स्थित निवास में प्रवेश
करके दौड़ती है-नितान्त सहजभाव से, वैसे ही, साधक उस अमर लोक में निवास करता हुआ अनन्त
-अनन्त युगों तक आनन्द प्राप्त करेगा ॥ १४ ॥
गुरु रूपी कमल और सतगुरु (ब्रह्म) रूपी सौन्दर्य (का मंत्र) मिलकर निर्मल अमृत (अंज) का
पान कराएँगे। इस प्रकार सुरति-निरति के सौन्दर्य से सज्जित स्वयं पति रूपी ब्रह्म के सान्निध्य का सुख
प्राप्त करोगे ॥ १५ ॥
अरी री! सखी!! सर्वथा अगम्य दीन दयालु प्रभु ही सतगुरु हैं-प्रतिक्षण हर्षपूर्वक वे भक्त की दशा
देखते रहते हैं। तुलसी साहब उनके इस निर्गुणमयी लीला-विलास का सन्त महात्माओं के लिए गान
करते हुए उनके अजत्व की अर्थमीमांसा करते हैं ॥ १६ ॥
॥ दोहा ॥
तुलसी अगम निवास, सुरति बास बस घर किया ॥
पिया परम रस मूल, सो अतूल अंदर हिया ॥ १ ॥