घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ / घट रामायण
अर्थ-हे सखी ! मेरे सतगुरु आदितत्त्व हैं, अजर-अमर हैं, बड़े ही दयावान हैं, उनके रहस्य का कहाँ
तक वर्णन करूँ। उनके अभाव में इस कुटिल, भ्रष्ट, मलिन बुद्धि में छलिया चित्त को लेकर जन्मता
रहता हूँ॥ १॥
सतगुरु ने अत्यन्त आनन्दमयी साबुन से मेरा शरीर (घर) धो डाला और ज्ञान की शिला पर से
मलिन जल बह गया। हे सखि ! चिरकुट कपड़े जैसा मलिन मन अब इतना निर्मल एवं उज्ज्वल रूप का
हो उठा ॥ २॥
चित्त की इस उज्ज्वलता के वस्त्र पर अपने मूल रंग से रंगकर अब उसे और चटकदार बना दिया।
हे सखि ! फिर मैं उसका क्या वर्णन करूँ, जैसे कोई अचल नदी सिंधु रूप परमात्मा में जाकर मिल
उठी हो ॥ ३ ॥
इस प्रकार, सुरति नदी के सतगुरु सिंधु से मिलन हो उठा। सीमित तन मन में स्थित चेतना बिन्दु इस
संगम से विराट हो चली और मेरी यह समझ में न आया, कि वह मन कब ब्रह्म धारा में बह उठा ॥ ४॥
हे सखी ! जब उत्मनी दशा में अपने मूल आध्यात्मिक निवास की पहचान कर ली तो पता चला कि
यह दुर्बल दीन आत्म तत्त्व अब मेरा नहीं, सतगुरु का हो उठा। हे सखि ! आदि-अन्त तक मैंने उस
रचना को समझा और जैसा-जैसा मुझे बताया गया है, उसी प्रकार मैंने यहाँ (इस कृति में) उसका
वर्णन किया है ॥५॥
हे सखि ! सद्गुरु सन्त ने इसका जो कुछ भी वर्णन किया है, स्वयं समझने के बाद कहकर सुना
रहा हूँ। हे सखी! इन चार स्थलों का गुरु मुख से वर्णित स्वरूप सुनो और में (गुरुमुख से सुन
समझकर) उनका भेद बता रहा हूँ॥६॥
हे सखी! इन चारो में से प्रथम बिन्दु पर 'कँवल कंज' है जिसमें सहस्रार दल समाधि के क्षण
(पल) प्राप्त होता है। हे सखि ! दूसरा गगन गुहा के ऊपर स्थित सतगुरु का गढ़ है-जहाँ दो दलों वाला
कमल है। हे सखी! सतगुरु के शरीर को देखो, जहाँ चार दलों वाला कमल सुरति समाधि प्राप्त कराता
है (स्रुति लावहीं) ॥७॥
सतगुरु का चौथा लोक सत लोक है-जो अगम सिंधु के नाम से पुकारा जाता है-उसे 'अगम्य
सिंधु' भी कहा जाता है। इस सिन्धु से सुरति साधना का संगम होता है और संतों की चित्त दशा निरन्तर
वहीं जाकर निवास करती है ॥८॥
हे सखि! जगत के मूल (परमात्मा रूप) संत तथा दयालु सत्यगुरु ने मुझे पति परमात्मा के लिए
व्याकुल बना दिया है। तुलसी साहब कहते हैं कि सत् सुरति समाधि रूपी समुद्र को सुधारो, तभी वह
परमात्मा रूपी सार तत्त्व दिखाई पड़ सकता है ॥९॥
॥ छन्द ११ ॥
लख अगम भेद अलोक अलि री। संत सतगुरु मोहिं कह्यौ ॥
तिहुँ लोक से री अलोक न्यारा। पार मारग मोहिं दयौ ॥ १॥
सिंध सब्द सतगुरु किरनि चेला। सुरति सब्द मिलावही ॥
सतलोक सिंध सम्हार अलि लख। मिलन समझ सुनावही ॥ २॥
सखि सिंध बुन्द मिलाप सतगुरु। किरनि सुरज कहावही ॥
सखि समुद जल जस भरत बदरा। भूमि बरस बहावही ॥ ३॥
अलि सिमटि नीर समीर सलिता। सिंध समझि समावही ॥
सखि सिंध बुन्द जो सिष्य सतगुरु। गवन गत मत गावही ॥ ४॥
सखि जलहि जल बल एक करिकै। भूमि भर्म नसावही ॥