घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ३५
मैं सतगुरु का वर्णन कैसे करूँ-क्योंकि उनकी पहचान के अगम्य लक्षण हैं। जिनकी स्मृति
(सूरति) या शरीर रचना लाखों-लाखों रूपों में होते हुए भी अलक्ष्य (अलख) है। सन्तों की कृपा ही
सतगुरु की भेंट या निशानी (सहिदानी) हैं॥
उनकी स्मृति रसभरी कन्दराएँ हैं, सतगुरु रूपी कमल मदमस्त दिखाई पड़ते हैं। तुलसी साहब जैसा
तुच्छ व्यक्ति तो उनके विषय में कुछ भी नहीं जानता। वह तो उनके चरणों के प्रति संसक्ति को ही सब
कुछ मानता है॥
अपनी जिस स्मृति को सतगुरु ने दिखा दिया है उसके लिए वह नित्य-प्रति आवेगपूर्वक शून्य
मण्डल पर दौड़कर जाता है। उस ब्रह्मांड को देखते हुए मैं निरन्तर उस पर विचरण (शैल-सैर) करता
रहता हुआ आदि से अन्त तक उसके रहस्य को देखता रहता हूँ॥
मैंने उसके आदि मध्य अन्त सबको देखा है। मैं तुलसीदास उसी को कहकर सुना रहा हूं। इस शरीर
(पिंड) में ब्रह्मांड छिपा समाहित है और इसी में उस अगम्य निराकार ब्रह्म की निवास स्थली देखी है॥
आदि और अगाध ब्रह्मांड इस पिंड में ही है-सुरति ज्ञान का प्रसार (फैली) हुआ और मैंने अलक्ष्य
ब्रह्म का लक्ष्य साध लिया।
इसी पिंड के अगम्य ब्रह्मांड मैं (उसी की कृपा से) उसे देख सका। तुलसी साहब कहते हैं कि
उसी की कृपा से उस अगाध तत्त्व को देखकर मैंने लोगों को सुनाया है। मुझे पिंड में स्थित ब्रह्मांड
दिखाई पड़ा और उस पिंड स्थित ब्रह्मांड का मैं तुलसी साहब यहाँ (घट रामायण के रूप में) बखान
या वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ सोरठा ॥
पिंड माहिं ब्रह्मांड, देखा निज घट जोड़ कै ॥
गुरु पद पदम प्रकास, सत प्रयाग असनान करि ॥
अर्थ-गुरु चरणों के सत्प्रकाश रूपी प्रयाग में स्नान करके ही मैंने अपने शरीर में ही इसी पिंड में
ब्रह्मांड को समझकर देखा है॥
॥ दोहा ॥
बूझै कोइ कोइ संत, आदि अंत जा ने लखी।
परचै परम प्रकास, जिन अकास अम्बर चखी ॥
अर्थ-इसे कोई कोई अर्थात् बिरला संत ही जानता है (और इसे वही जानता है) जिसने आदि तथा
अन्त दोनों को देख लिया है। जिस सन्त ने साधना के शून्याकाश में आकाश का स्वाद चख लिया है,
उसी से उस दिव्य परम प्रकाश का परिचय भी है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तोल तरास, तत बिबेक अन्दर कही।
बूझेंगे निज दास, जिन घट परचे पाइया ॥ १ ॥
पानी पवन निवास, कँवल बास बिधि सब कही।
जीव काल और स्वाँस, और अकास उतपति भई ॥ २ ॥
भीतर देखि प्रकास, सब ब्रह्मांड बिधि यों कही।
रावन राम संबाद, आदि अंत निज जोड़ कै ॥ ३ ॥