घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ / घट रामायण
मैं मति मान अपूर, कूर कुटिल न्यारे किये।
हिये तिमर तन दूर, तूर तमक तन की गई॥२॥
मो मन सुरति अयान, जानि सुरति सत रीति ले।
गहि कर संत सुजान, मान मनी मद छाँड़ि के॥३॥
मैं मति सत सम नाहिं, पाइ पकरि लारै लई।
सतगुरु दीन दयाल, जाल काट न्यारी करी॥४॥
सतगुरु चरन निवास, बिमल बास बिधि लखि परी।
धरी जो तुलसीदास, भास चमक चढ़ि चाँप धरि॥५॥
सतगुरु परम उदार, दल दरिद्र सब दूरि करि।
संपति सुरति बिचार, निधि निहार सच्छै लखा॥६॥
अर्थ-सन्त की चरणधूलि ने ही मुझे रहस्य के मूल तत्त्व को दिया है। मेरी मति निरति और सुरति
के कारण सबल हो उठी और तुच्छ वस्तु के सदृश उन्होंने मन को (लोकमन को) नष्ट कर दिया॥१॥
मुझ अपूर्ण बुद्धि के व्यक्ति की क्रूरता, कुटिलता को गुरु ने मुझसे अलग किया। मेरे हृदय का
अँधेरा दूर हुआ और शरीर का अहम् और गर्व (तूर तमक) दूर हो गया॥२॥
सुरति-समाधि तथा ज्ञान से सर्वथा अज्ञानी मेरे चित्त ने सत्य रीति (सही-सही तरीके से) से सुरति
को समझा और इस प्रकार मन के मान एवं मद विकार का परित्याग करके सज्जन संत का हाथ
पकड़ा (सहारा लिया)॥३॥
मैं अपनी मति के अनुसार सत्यमय नहीं था-गुरु के चरणों को पकड़ कर उसी में अपनी निष्ठा
(लारै) लगाई और दीनों के प्रति अत्यधिक दयाभाव रखने वाले मेरे गुरु ने मायिक संसक्ति (जाल)
को काटकर मुझे उससे मुक्त कर दिया॥४॥
सतगुरु के चरणों की छाया में निवास करने से निर्मल (पवित्र) निवास की विधि मुझे दिखाई पड़
गई। इस तुलसी साहब ने उसे ग्रहण करके अदृश्य में प्रकाशित तत्त्व को देखकर समझा॥५॥
मेरे सतगुरु परम उदारमना हैं, मेरी दरिद्रता के सारे समूहों को उन्होंने विनष्ट किया। उनके ज्ञान दर्शन
के बाद ही मुझे सुरति ज्ञान जैसी संपत्ति समझ में आई और उसी के माध्यम से अपूर्व ज्ञान रूपी निधि
को देखकर 'अनाहत नाद' जैसे शब्द से साक्षात्कार किया है॥६॥
भेद पिंड और ब्रह्मांड का
॥ चौपाई ॥
परथम बन्दौं सतगुरु स्वामी। तुलसी चरन सरनि रति मानी॥
पुनि बन्दौं संतन सरनाई। जिन पुनि सुरत निरत दरसाई॥
चरन सरन संतन बलिहारी। सूरति दीन्ही लखन सिहारी॥
सरन सूर सूरति समझाई। सतगुरु सूर मरम लख पाई॥
मैं मतिहीन दीन दिल दीन्हा। संत सरल सतगुरु को चीन्हा॥
सतगुरु अगम सिंध सुखदाई। जिन सत गेह रीति दरसाई॥
पुनि पुनि चरन कँवल सिर नाऊँ। दीन होइ संतन गति गाऊँ॥
दीन जानि दीन्ही मोहिं आँखी। मैं पुनि चरन सरनगहि भाखी॥