घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० / घट रामायण
कंजा भजि भलक भान, कोटिन छबि छाई॥ १॥
बेनी मजन अनूप, रहिनी अन्दर अरूप।
चंदा रबि रैनि दिवस, तारे नभ नाही॥ २॥
बरनन लखि अलख ऐन, स्याम सिखर निकर कंद।
निरता स्रुति समझि सूर, पकज अपनाई॥ ३॥
अंडा अंबुज अतूल, बेलि बृच्छ अधर मूल।
फूला फल बन निवास, ललित लता छाई॥ ४॥
भंवर भृंग लसि सुगंध, उरझे रस बस बिलास।
आनंद सीतल समीर, सखर तट माई॥ ५॥
जहँ जहँ दृग देखि जात, खगपति कृति नभ उड़ात।
बन बन मृग चरत जात, कोकिल करकाई॥ ६॥
धरिकै धस धरन डोर, दृढ़कै चढ़ि कड़क कोक।
धधकत धसि धधक नीर, फूटा पुल जाई॥ ७॥
भाखा भीतर बयान, सज्जन सुनि समझि साथ।
अद्बुद अज अजर बात, संतन लखवाई॥ ८॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि ब्रह्म भवन का ज्ञान (भास) मुझे हो गया है और वह शरीर
(घट) के अन्दर ही है। मैं शरीर के अन्दर स्थित इस भवन में जाकर स्थित कमल को सुरति रूपी
जल में आया॥ टेक॥
सतगुरु ब्रह्म गगन (शून्य) पर्वत पर मग्न हैं-उनका मंदिर (भवन) मानों मंदिर न होकर कोई
अजूबा हो। वहाँ गगन-गुफा में स्थित कमल दल का ध्यान करो (भजि) उसी के माध्यम से कोटि-
कोटि छवियों से अलंकृत सूर्य सुन्दर प्रतीत (झलक) होगा॥ १॥
उस इंडा-पिंगला एवं सुषुम्ना रूपी त्रिवेणी का स्नान अनुपम है, उसके अन्दर चित्त का निवास तो
और भी अनुपम है। यहाँ रात-दिन चन्द्र एवं सूर्य निरन्तर बने रहते हैं किन्तु उस आकाश में तारे नहीं
हैं॥ २॥
उस अलक्ष्य गृह का रूप देखकर तथा उसके श्यामल (शून्य) शिखरों के समूह का अनुभव
करके जो लोकवासनाओं से विरक्त जन एवं समाधि सिद्ध योगिजन (सूर) हैं, वे उस सहस्रार कमल
को अपना लेते हैं-अर्थात् अपनी समाधि सहस्रार में लगाए रहते हैं॥ ३॥
उस सहस्रार कमल को सम्हालने वाला ब्रह्मांड अतुलनीय है, उसके नीचे लताएँ, वृक्ष तथा
लटकती हुई जड़ें हैं-उस वन के परिसर में निवास है, फल-फूल मंडित ललित लताएँ छाई हुई हैं॥ ४॥
साधना विलास सुगंधि और रस में आनन्दित (उलझे) भ्रमर समूह फैले है। उस सरोवर के तट पर
शीतल वायु आनन्द दे रही है॥ ५॥
जहाँ जहाँ नेत्रों की दृष्टि जाती है, गरुण आकाश में उड़ते जैसे दिखते हैं। वन-वन में मृग समूह
चरते दिखते हैं तथा कोकिला कुहुकती रहती है॥ ६॥
हे साधक! इस शून्य में समाधि की डोरी पकड़ कर उसमें प्रवेश करो और पूरी दृढ़ता से उस
अविचल कमल में अध्यवसित (प्रविष्ट) होओ। तुम्हारे प्रवेश काल में शून्य सरोवर का वह जल
धधकता है (धधकेगा) और उसका सेतु फूटने-सा लगेगा (किन्तु हे साधक! तुम विचलित न
होना)॥ ७॥