घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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समस्त दृश्यों को देख लिया है। जिसने सुरति के पके हुए मूल तत्त्व का आस्वादन कर रखा है—उसकी
संसक्ति सबद तथा सुरति से पूरी तरह से जुड़ जाती है॥ २ ॥
॥ दोहा ॥
सतगुरु पुर पद पार, ये अगार अदबुद कही।
भौ बुधि भेष मँझार, सार लार सूझै नहीं॥
अर्थ—सतगुरु के चरणों के उस पार वह समाधि में चित्रित अद्भुत रूप से वर्णित नगर है। हमारी
बुद्धि तो भवसागर में नाना रूपों में फँसी है—यह ब्रह्म वासना तो उसे सूझती तक नहीं॥ १ ॥
॥ छन्द ॥
गुरु पद कंज लखाइ घट परचे पाई। सुरति समानी सिंध मई॥
देखा वह द्वारा अगम पसारा। दस दिस फोड़ अकास गई॥
नाम निअच्छर छर नहिं अच्छर। देख अगाध अनाद लई॥
पार भीतर जाना घट परमाना। जेइ जेइ संत अगार कही॥
जिनकी रज पावन राम औ रावन। निः अच्छर सत सार सही॥
पंडित और ज्ञानी यह नहिं जानी। भेष भेद गति नाहिं लई॥
सब जग संसारा काल की जारा। सकल पसारा भेष मई॥
रागी बैरागी भौ रस त्यागी। साँगी पाँगी भरम बही॥
ग्यानी बिज्ञानी वन वस जानी। संत पंथ मत राह नहीं॥
जोगी सन्यासी काल की फाँसी। परमहंस परमान नहीं॥
निज गावै बेदा जानै न भेदा। सास्त्र संघ जिन राह लई॥
संतन गति न्यारी सुनौ बिचारी। चौथे पद के पार कही॥
कोइ करिहै संका महामति रँका। सतसंगति सम सूझ नहीं॥
तुलसी मति-हीना पायौ चीन्हा। संत कृपा घट घाट लई॥
॥ छन्द ॥
अर्थ—गुरु चरण कमलों को दिखाकर, पिण्ड का परिचय प्राप्त करके सुरति अगाध समाधि समुद्र
में विलीन हो गई। उसके पश्चात् ही वह अगम्य एवं अपार द्वार देखा और तब दसों द्वारों को तोड़कर
वह ज्ञानदृष्टि शून्याकाश में खो गई॥
वह निरंजन वर्ण शून्य (नि अच्छर) है, वह क्षरणशील न होकर, अक्षरणशील है, उस अगाध तथा
अनादि तत्त्व को मैंने देख लिया। उसे मैंने घर के भीतर स्थित ही समझा और उसके लिए प्रमाण घट ही
है। उसे ही सभी ने सन्तों का निवास गृह बताया है॥
जिसकी पवित्र रज से राम और रावण उत्पन्न हुए हैं—वह वाणी शून्य का एकमात्र सही-सही यही
सारतत्त्व है। न उसका कोई वेष है, न उसका कोई भेद है और न उसकी कोई भिन्न ज्ञान दशा (गति)
है—पंडित और ज्ञानीजन उसे आज तक नहीं समझ पाए हैं।
समस्त संसार काल की पत्नी है और वह अनेक वेष धारण करके समस्त स्थानों पर फैली है।
उसके भ्रम में उरासे वशीभूत होकर रागवासना ग्रस्त, विरागीजन, इस संसार (भौ) का रस त्याग करने
वाले सन्यासी (साँगी) सभी उसमें रम जाते हैं॥