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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 186 में से

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पृष्ठ 112

१०२ गरीबदास जी की बानी
पलक बीच में सिरे की सैर करता, अगर दीप के धाम चलावता हूँ॥
कहूँ बात बैराट के घाट की जी, ज्ञानी ज्ञान कूँ पाय कर बूड़ जाते ।
इक झिलमिली सिंध है दीप दरिया, कोई ब्रह्मज्ञानी जहाँ जाय नहाते॥
बहै गंग कैलास आकासमाहीं, संभु१ सीस पर सैल है अगम रासा२ ।
जहँ दत्त गोरख नहीं ध्यान ध्यानी, अचल नूर ही नूर देखो तमासा॥
अरसकुरस के बाग में कौन माली, जहँ नूर जहूर के कंद३ हैं जी ।
कहै दास गरीब सँभाल भइया, देखो चाखते नहीं सो अंध हैं जी ॥
( ७ )
खबरदार होय खेलना यार भाई, चिदानंद की चाँदनी बीच रहना।
पग पीठ उलटा नहीं फेरिये जी, सब्द सवाल के सुने से सीस देना॥
कुफल जड़ी हैयार महबूब मेरे, सप्तपुरी का भेद नहिं भेदता है ।
उलट पवन द्वादस के दीप जाई, षट कमल कूँ मूढ़ नहिं छेदता है ॥
ब्रह्म लोक की बात सुन रीझ जाता, रँग रोसनी दीप नहिं दीखता है।
तप जोग कर भक्ति भय मान भाई, अब साखि सब्दी कहा सीखता है॥
गुल सफा की गली में नफस४ कूँ गाड़ दे, मार ले मोरचा तीर तुक्का।
सीस कूँ काट कर हाथ महबूब५ दे, इश्क कूँ छोड़ दे कहाँ लुका६ ॥
मन्सूर७ कूँ देख मौसूल८ यूँ हूजिये, अनल ही हक्क बोलै दिवाना ।
सीस कर कटे हैं रुधिर मुख धोवता, इश्क नहिं छोड़ सूली चढ़ाना ॥
इश्क ही इश्क में फूँक तन दिया है, बहै है अस्थि६ दरियाव माहीं ।
कहै दास गरीब यह इश्क साँचा सही, अमर मन्सूर है हक्क साँई ॥
( ८ )
जल थल के बीच में रम रहा तू, देख दीदार दर हाल है रे ।
वह सेत सुभान१० जहान माहीं, जो अजब महबूब अकाल है रे ॥
(१) संभु = शिव । (२) राशि = समूह । (३) कन्द मूल । (४) नफस = इच्छा ।
(५) प्रीतम । (६) छिपा । (७) मनसूर फकीर अनल हक्क (= हम ही खुदा हैं) कहते
थे जिन्हें मुसलमानों ने सूली चढ़ा दिया । (८) मौसूल = भगवंत के साथ एक हो जाना ।
(६) हाड़ । (१०) सुबहान = पवित्र ।