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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

अरिल १०३
पारस की खान तो मुत्र की धार में, कहाँ मोती हीरा लाल है रे।
गलतान असमान में अजब मौला, इक सृष्टि तिरलोक कहा माल है रे१
जल बूँद सूँ जून२ जहान सब होत है, इक पलक के बीच पैमाल है रे।
पाखंड कूँ पूज पाखंड परलै गया, सृष्टि सूवा ठगा जाल है रे ॥
पत्थर के फेल से फैज पाई नहीं, सीस जम दूत कासाल है रे।
कौन मारै कहो कौन मर जात है, छाँड़ हंसा चला खाल३ है रे ॥
अगर मूल के फूल की बासना कहत हूँ, झिलमिली रंग रसाल है रे।
सेत ही हंस जहाँ सेत सरवर भर्यो, सेत ही कमल जहाँ ताल है रे ॥
बुदबुदे संख कहँ राव और रंक है, नजर दर नजर निहाल है रे।
दरियाव की लहर दरियाव लौलीन है, भँवर और फील जल झाल है रे
भर्म की बुरज सब सीत के कोट हैं४, अजब ख्याली रचा ख्याल है रे।
दास गरीब वह अमर निज ब्रह्म है, एक ही फूल फल डाल है रे ॥
॥ अरिल ॥
( १ )
मौला मगन मुरारि बिसंभर चीन्ह रे।
दिल अंदर दीदार अरस दुरबीन रे ॥ १ ॥
इला पिंगला फेर सुखमना ध्यावही।
त्रिकुटि झरोखे बैठि परम पद पावही ॥ २ ॥
झलकै सिंध अपार मुक्ति का धाम रे।
अचल अगोचर देख पुरुष बरियाम५ रे ॥ ३ ॥
निकट निरंजन नूर जहूर जुहारिये।
मीनी मारग खोज सिंध यूँ फारिये ॥ ४ ॥
नैनों ही में लाल बिसाल अलेख है।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब रूप नहिं रेख है ॥ ५ ॥
(१) एक तिर्लोक की सृष्टि क्या हैसियत रखती है उसकी रची हुई अनंत तिर्लोकियाँ
हैं। (२) योनि। (३) शरीर। (४) धुआँ का सा कोट जो जाड़े में आकाश में बन जाता
है। (५) श्रेष्ठ।