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सर्वकोश
गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

सवैया ६५
त्रिकुटी ताना भर नाम नली,१ एकै लख पूरन पेटा२ है ॥१॥
इक बिद पिछान जहान रचा, कोइ बाप कहै कोइ बेटा है ।
कोइ पीतसरे३ कोइपाति४ लगा, कोइ ससुर भया समधेटा५ है॥२॥
जद काल महा बली पकड़ लिया, मरघर में आकर लेटा है ।
साऊ६ सबही खप्पर फोरैं, सिर फोर दिया पुत जेठा७ है ।
गत बूझत है जद फूँक दिया, खर खोज नहीं सब मेटा है ॥३॥
कहै दास गरीब उपाध लगी, सब भूत भये जग हेटा है ॥४॥
( ७ )
मग८ पूछत है प्रतीत नहीं, नादी९ बादी१० झगड़ा ठानें ।
मुकता रुकता नहिं राह लहैं, नाह साध असाध कूँ जानत हैं॥१॥
देवल जाहीं मसजिद माहीं, साहब का सिरजा भानत हैं११ ।
पंडित काजी डोबी१२ बाजी, नहि नीर खीर१३ कूँ छानत हैं॥२॥
चेतन का गल काटत हैं, धर पत्थर पाहन मानत हैं ।
कहै दास गरीब निरास चले, धिरकार जनम नर लानत है॥३॥
( ८ )
दुख दुंद उपाध में जीव बँधे, समरथ की नहीं उपासा१४ है ।
नेमी धर्मी धर्म धाम फिरैं, साध संगत कूँ हासा१५ है ॥१॥
बघनी ठगनी कूँ लूट लिये, चीन्हा नहिं निरगुन रासा है ।
जल अरघ दिया जम आन लिया, नहाते जल बारह मासा है॥२॥
सूझै नहिं सिंध अबंध बिद्या, पाती तोरैं नर घासा है ।
जम मारत है मुगदर मोढ़े,१६ चसमों में देत धवाँसा है ॥३॥
चंचल चोर कठोर कुटिल, क्या पहिरत मलमल खासा है ।
जम नगन करै साहब की सौं, देगा तुझ बहुत तिरासा है ॥४॥
दिल खोज भइया निज नाम जपो, सत पूरन ब्रह्म खुलासा है ।
कहै दास गरीब पत्थर पटको, तुम डारो निरगुन पासा है॥५॥
(१) बुनने की नली जिस पर सूत भरा होता है। (२) ताजा तैयार हुआ कपड़ा ।
(३)