गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 109, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंझूलना ६६
॥ झूलना ॥
( १ )
चढ़ो नाम की नाव जहाज भइया, तेरा पार चलन कूँ जो दिल है जी ।
अजब कहर में नाव लागी, जहँ मन मल्लाह जाजुल१ है जी ॥
चप्पे२ चित लावो बरदवान३ बाँधो, बड़ा पन्थ के बीच कूल४ है जी ।
जहँ भँवर भारी नाव डिगमिगै है, ठेकाखावे गहि गलहरी५ जी ॥
सूवा बोलता खाक के पिजरे में, सुरत सिध मेला बुलबुल है जी ।
चिदानन्द चीन्हो ब्रह्म गाजता है, जैसे मधुकर बासना फूल है जी ॥
कहै दास गरीब दलाल सोई, सौदा नाम कीन्हा समतुल है जी ॥
( २ )
बन्दी-छोड़ साहब का नाम लीजै, कटै फंद सब अंध नहि चीन्हता है ।
देई६ धाम कूँ पूज कर मगन होई, देखो सब्द की नहीं यकीनता७ है ॥
भेदी भेद दीन्हा सब्द महल कारे, सीढ़ी सुन्न में लाय कर पैठधाये ।
मारा मोरचा पहलई मोह का जी, बही८ ज्ञान तरवार सिर काट लाये ॥
चढ़े सील संतोष बिबेक बंका,९ जहँ काम दल कटक१० सब फूक दीन्हे।
जब दया के चौतरे चार आये, अनुराग निःतन्त निर्बान चीन्हे ॥
आँखी मार११मैदान गढ़ कोट ढाया, सफर जंग की राड़१२ है खेत भाई
दुरजन मारकर गगन में नाद बाजा, देख दीद वरदीद परतीत आई
चित चौतरे बैठ कर बाँधिया जी, हम लोक परलोक कूँ गमन कीन्हा।
उलटी चाल चाले नहि चूके हैं जी, निरालंब निरवान निःतन्त चीन्हा
गैबी गैब दरियाव में मार गोता, जैसे मीन का खोज नहिं पावता है ।
कहै दास गरीब दरहाल धारा, परबी प्रेम की बेग नहवावता है ॥
( ३ )
बंदी-छोड़ साहब का ध्यान धरो, निरलंब निज नूर निज नेक है जी ।
जलथल में थीर गंभीर गैबी, देखो लोक परलोक में एक है जी ॥
(१) जुलमी । (२) नाव का पानी उलचना । (३) पाल । (४) खाड़ी । (५) गलही,
नाव का माथा । (६) देवी । (७) विश्वास । (८) चली । (६) शूरवीर । (१०) फौज ।
(११) पलक भांजते । (१२) लड़ाई ।