गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरिल १०५
एती उमर बिलंद१ मरेगा अंत रे ।
सतगुरु लगे न कान न भेंटे संत रे ॥ ३ ॥
सौ करोड़ मँडलीक२ जु सावंत३ संग हैं ।
सूरे अनंत अपार पड़े बेनंग हैं ॥ ४ ॥
लंक सरीखा कोट चोट पैमाल है ।
मरना है मैदान सही सिर काल है ॥ ५ ॥
रावन की रस रीत रँगीला राज था ।
चौदह भवन बिवान मनोमई साज था ॥ ६ ॥
इंदर बरुन कुबेर सुमेर सलामियां४ ।
होय होय गये अनंत घने बहु नामियां ॥ ७ ॥
तेंतिस कोट की बंध बिथा५ सुन लीजिये ।
बाँध लाया ससि भानु सजा सुर६ दीजिये ॥ ८ ॥
एक रे जोरा काल सु कूप उसारिया७ ।
ऐसे छल बल कीन्ह सु रावन मारिया ॥ ६ ॥
फोकट राजर पाट पिटेगा अंत रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब भजो निज कंत रे ॥ १० ॥
( ५ )
महमूदी चौतार हमारा८ पहिरता ।
सुलतानी का देस बलख सा सहर था ॥ १ ॥
सोलह सहस सहेली पदमनी भोग रे ।
सतगुरु के उपदेस लिया तज जोग रे ॥ २ ॥
तुरी६ अठारह लाख ऊँट गैबर१० घना ।
सीस महल में सैल बाग नौलख बना ॥ ३ ॥
कस्तूरी तन लेप गुलाबी गंध रे ।
(१) वृथा गई । (२) एक देश का राजा । (३) वीर । (४) सिर झुकाते थे । (५) कष्ट ।
(६) देवता । (७) लटकाया । (८) चार लड़ की हजारा फूलों की माला । (६) घोड़ा ।
(१०) हाथियों का झुंड ।