गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ गरीबदास जी की बानी
लाख बानी पढ़े ध्यान सुन्न में धरै, महल का मरहमी भेद बेधै१ ॥
अजगैब२ के कोट में चोट लागै नहीं, सब्द अतीत में नेस३ होई ।
दास गरीब गुर भेद से पाइये, अगमपुर धाम की बाट जोई ॥७
( ४ )
घट घट में नाद उच्चार बानी, मिहीं४ महल में मारफत५ पावता है।
ताल मिरदंग जहँ संख सुर पूरिये६, बिना मुख नाद बजावता है॥
तूर तुतकार धुमार७ तिस नगर में, अजग गुलजार इक नूर चंपा।
कोकिला बैन सुख चैन सुनते भये, बिधा८ है हंस लै विरह कंपा६॥
आद अरु अंत इक मद्ध मेला भया, सिखर की सुन्न में जिकर१० लागी
केतकी कमल जहँ अजब बाड़ी बनी, भँवर गुंजार निःतन्त११ रागी॥
दुलहनी दंग दुलहा भई देखकर, संख रवि झिलमिलै नूर जोती ।
अजब दरियाव जहँ कोट बेड़े पड़े, चुगत है हंस बिन चंच१२ मोती ॥
जहँ गुमठ अनूप इक सेत छत्तर बना, गगन गुलजार जहँ नूर गादी ।
दास गरीब दिल दूसरा दूर कर, सब्द अतीत सुन्न में समाधी ॥५
( ५ )
देव ही नहीं तौ सेव किसकी करूँ, किसे पूजूँ कोई नाहिं दूजा ।
करता ही नहीं तौ किरत१३किसकी करूँ, पिंड ब्रह्मांड में एक सूझा ॥
जागा ही नहीं तौ जाग किसकूँ कहूँ, सोता ही नहीं किसकूँ जगाऊँ ।
खोया ही नहीं तौ खोज किसका करूँ, बिछुड़ा नहीं किसे ढूँढ़ लाऊँ ॥
बोलता संग और डोलता है नहीं, कला के कोट (अलख) छिप रहा प्यारा
गैब से आया और गैब छिप जायगा, गैब ही गैब रचिया पसारा ॥
प्रान कूँ सोधकर मूल कूँ दर गहो, बेद के धुंध१४से अलख न्यारा ।
बेद कुरान कूँ छाँड़ दे बावरे, नूर ही नूर करले जुहारा ॥४
करमना भरमना छाँड़ दे बावरे, छाँड़ सब बरत इक बैठ ठाहीं ।
दास गरीब परतीत ही तें कहै, ब्रह्मांड की जोत इस पिंड माहीं ॥५
(१) पावै। (२) अजगैब = छिपा हुआ। (३) निष्ठा । (४) झीना । (५) गुरज्ञान ।
(६) भरिये। (७ धूम। (८) छिद गया। (६) चिड़िया फँसाने की कल। (१०) जाप।
(११) निःतत्त। (१२) चोंच । (१३) कीर्त्ति । (१४) अँधेरा ।