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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

सवैया ६३
उर में अविनासी आप अलह, सतगुरु कूँ पार उतारा है।
कहँ गल कंटकैं दुनिया दूती, येहू बन कैसा गारा१ है ॥५॥
हम जान लिया जगदीस गुरू, जिन जंतर२ महल साँवरा है।
कुछ तौल न मोल नहीं जा का, देखा नहिं हलका भारा है॥६॥
कुछ रूप न रेख बिबेक लखा, चाखा नहिं मीठा खारा है।
गलतान३ समांन समाय रहा, जो पिंड ब्रह्मण्ड से न्यारा है ॥७॥
सुर संख समाधि लगाय रहे, देखा इक अजब हजारा४ है।
कहै दास गरीब अजब दरिया, झिल मिल झिल वार न थार है॥८॥
( २ )
सुख सागर न्हान चलो हंसा५, भवसागर भूल रहे लोई।
कुल काट६ लगा जम आन ठगा, अगली पिछली सबही खोई ॥ १॥
निंदत नेमी नर ताय लिये, कुछ समझैं हैं नहि गुरु-द्रोही।
संतों का दोष धरैं दिल में, अघ पाप के बीज बहुत बोई ॥२॥
सुसरे सालों हितकार करें, सासू साली कोई नंदोई।
जग लड़े मरैं परतीत नहीं, बोलै नहिं साँच जगत धोई ॥३॥
लगरे७ भडुए नहिं भेद लहैं, गुझ८ बीरज मंत्र कूँ हम गोई।
साधू माखन मध छाक रहे, जग पीवत है पिछली छोई६ ॥४॥
दिन आवत है सुनि दंग भया, जम तलब छुटी तब दे रोई।
कहे दास गरीब जगाय रहे, भडुए निस बासर रहें सोई ॥५॥
( ३ )
तप राज लिया बड़ जुलम किया, आगम अँधरो नहिं सूझत है।
घट में सत सालिग्राम सही, चेतन होकर जड़ पूजत है ॥१॥
पाती तोरै नहिं मुख मोरै, पाहन पानी सूँ लूझत१० है।
अंधे बहिरे गूँगे गहले,११ नहिं सब्द अनाहद बूझत है ॥२॥
(१) घना। (२) कलों का। (३) मस्त, मदहोश। (४) सहसदलकमल। (५) जीव।
(६) मैल, दाग। (७) फरेबी। (८) गुप्त। (६) छाछ। (१०) उलझता है। (११) बेसमझ।
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