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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 186 में से

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पृष्ठ 110

१०० गरीबदास जी की बानी
धर ध्यान दुरबीन यकीन कीजै, दिल देहरे बैठकर परख भाई ।
कुरबान करतार के सेहरे पर, जहाँ सुरत औ निरत दो निरख आई॥
अलह नूर मौला मगन आप है जी, गलतान सुबहान१ सही देख लीजै
बैठा अ्ररस२ के तखत पर आप सांई, दीदार के वास्ते सीस दीजै ॥
देख दीदार दरहाल दरिया, जाके मुकट पर संख रबि झिलमिलै जी ।
जोती जगमगै जोग बिजोग बानी, जाकी खलक में पलक जहान है जी
नहि दीखता मुगध३ दृष्ट आवै, संत खोज लिया कलधूत४ है जी।
सुन्न सैल कर सिंध में सुरत पैठी, जहाँ आप अवगत अनभूत है जी ॥
मनी मारकर छत्र कूँ फेर भइया, होय अदल अवधूत इस भेद हाजी५ ।
अलह बैठकर आप इन्साफ करता, चित चौतरे चूक नहि भई काजी ॥
पड़ै गैब की मार सुमार नाहीं, देखो कुफर कूँ कुफर दिखावता है।
फजल सिर फजल जहाँ होय भइया, जाके एक नहि पल की लावता है॥
सुन्न सिखर के महल में दिया डेरा, चौक चाँदनी बिच नहिपला६ पकड़ै
कुफर कूँ मार पैमाल नीचा करै, लालखाँ७ बाँधकर जहाँ जकड़ै ॥
मलागिर की सेज सूली नजर आवती, मिले सुलतान कूँ कुफर तोड़।
दास गरीब कबीर सतगुरु मिले, सुरत और निरत का तार जोड़। ॥
( ४ )
बंदी-छोड़ साहब कूँ चीन्ह भइया, मारो नूर के सिंध में गैब गोता ।
बिन पंख पंखी उड़ै भँवर सुन में चढ़ै, अच्छै वृक्ष में बैठ निज सुन तोता
दया की दाल और नाम चोखा८ चुगै, सत्त गुरुदत्त बानी बिलासा ।
प्रेम के पींजरे बीच बैठा रहै, करम खिड़की दई तोड़ फाँसा ॥
इक पींजरे पास मंजार६ बैठा रहै, खोज कर खोज कर खोज खोजी ।
कौन से भेद से अरस भूलत रहै, चुगै मत चुगा यह ऋद्ध१० रोगी ॥
(१) पाक (खुदा)। (२) अर्श। (३) गँवार। (४) सोना। (५) जिसने हज्ज किया है।
(६) पल्ला। (७) मन। (८) चावल । (६) बिल्ली। (१०) यह ऋद्धि अर्थात् बिभूति रोग
रूप है।