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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 186 में से

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पृष्ठ 100

६० गरीबदास जी की बानी
अजामेल से अधम उधारे पतित-पावन ब्रिद्१ तासु है ।
केसो आन भया बनजारा षट दल कीन्ही हाँस है ॥४४॥
धना२ भक्त का खेत निपाया माधो३ दई सिकलात३ है ।
पंडा पाव४ बुझाया सतगुरु जगन्नाथ की बात है ॥४५॥
गैबी ख्याल बिसाल सतगुरु अचल दिगंबर५ थीर है।
भक्ति हेत काया धर आये अवगत सत्त कबीर है ॥४६॥
नानक दादू अगम अगाधू तिरी जहाज खेवट सही ।
सुख सागर के हंसा आये भक्ति हिरंबर उर धरी ॥४७॥
कोटि भानु प्रकास पूरन रोम रोम की लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अवगत का दीदार है ॥४८॥
धन सतगुरु उपदेस देवा चौरासी भ्रम मेटहीं ।
तेज पुंज तन देह धरके इस बिध हमकूँ भेंटहीं ॥४६॥
सब्द निवास अकास बानी यह सतगुरु का रूप है ।
चंद सूर न पवन पानी जहाँ छाँह न धूप है ॥५०॥
रहता रमता राम साहब अवगत अलह अलेख है ।
भूले पंथ बिडंब६ बानी कुल का खाविंद७ एक है ॥५१॥
रोम रोम में जाप जप ले अष्ट कमल दल मेल है।
सुरत निरत को कमल पठवो जहँ दीपक बिन तेल है ॥५२॥
हर दम खोज हनोज८ हाजिर तिरबेनी के तीर है।
दास गरीब तबीब६ सतगुरु बन्दी छोड़ कबीर है ॥५३॥
(१) बिरद् = कीर्ति । (२) देखो नोट पृष्ठ २८ । (३) सकलात = पीताम्बर-माधवदास
जगन्नाथजी के एक प्रेमी पुजारी थे जिनको कोई कड़ी बीमारी हो गई थी । और पुजारी
लोग उनको समुद्र किनारे बैठा आये । रात को जब माधवदासजी को जाड़ा लगा तो
जगन्नाथजी अपना पीताम्बर उनको ओढ़ा आये और आरोग कर दिया । सबेरे पीताम्बर
मूर्ति पर न पाकर उसकी खोज पड़ी तो पुजारियों ने उसे माधवदास के तन पर पाकर
उनकी महिमा जानी और आदर से मंदिर में लाये । (४) पाव = आग - देखो नोट पृष्ठ
७१ । (५) बिना वस्त्र । (६) पाखंड । .(७) स्वामी । (८) सदा । (६) वैद्य ।