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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 101

सुलच्छन कुलच्छन ६१
॥ सुलच्छन कुलच्छन ॥
उत्तम कुल करतार दे द्वादस भूषन संग ।
रूप द्रव्य दे दया कर ज्ञान भजन सतसंग ॥ १ ॥
सील संतोष बिबेक दे छिमा दया इकतार ।
भाव भक्ति बैराग दे नाम निरालँब सार ॥ २ ॥
जोग जुगत जगदीस दे सूछम ध्यान दयाल ।
अकल अकीन अजनम जत अठसिध नौनिध ख्याल ॥ ३ ॥
सुरग नरक बाँचे नहीं मोछ बंध से दूर ।
बड़ी गरीबी जगत में संत चरन रज धूर ॥ ४ ॥
जीवत मुक्ता सो कहो आसा तृस्ना खंड ।
मन के जीते जीत है क्यूँ भरमे ब्रह्मांड ॥ ५ ॥
साला१ करम सरीर में सतगुरु दिया लखाय ।
गरीबदास गलतान२ पद नहि आवै नहिं जाय ॥ ६ ॥
चौरासी की चाल क्या मो सेती सुन लेह ।
चोरी जारी करत है जाके मुखड़े खेह ॥ ७ ॥
काम क्रोध मद लोभ लट छुटी रहै बिकराल ।
क्रोध कसाई उर बसै कुसबद छुरा घर घाल ॥ ८ ॥
हरष सोग है स्वान गत संसा सरप सरीर ।
राग दोष बड़ रोग है जम के परे जँजीर ॥ ६ ॥
आसा तृस्ना नदी में डूबे तीनों लोक ।
मनसा माया बिस्तरी आतम आतम दोष ॥ १० ॥
एक सत्रु इक मित्र है भूल परी रे प्रान ।
जम की नगरी जाहिगा सबद हमारा मान ॥ ११ ॥
निंदा बिदा३ छाँड़ दे संतों सँू कर प्रीत ।
भवसागर तिर जात है जीवत मुक्त अतीत ॥१२॥
(१) घर, स्थान । (२) मदहोश, मस्त । (३) बुरा भला कहना ।