सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 186 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

खाना खाते खूब परम निःचित रे ॥ ४ ॥
दल बादल गज ठाठ अदल तूमार रे ।
सहदाने१ सहनाई महल घूमार२ रे ॥ ५ ॥
हीरे मोती मुकता जवाहिर लाल रे ।
निस दिन खूबी खैर खजाने माल रे ॥ ६ ॥
लागा बान बिहंगम सब्द सबूह रे ।
भलका३ मारा ऐंच दूहबर दूह४ रे ॥ ७ ॥
राज पाट गज ठाठ छाँड़ कफनी लई ।
सार सब्द की चोट तोर बख्तर गई ॥ ८ ॥
नजरी नजर निहाल जिन्दा गुरु पीर था ।
हरे हाँ रे कहत दास गरीब तबीब५ कबीर था ॥ ६ ॥
( ६ )
क्या राजा क्या रेत६ अतीत अतीम७ रे ।
जोधा गये अपार न चम्पी सीम रे ॥ १ ॥
यह दुनिया संसार बतासा खाँड़ का ।
जोरा पीवे घोर बिसरजन८ माड़ का ॥ २ ॥
काम क्रोध मद लोभ बटाऊ लूटहीं ।
हिरस खुदी घट माँह सु बहु बिध कूटहीं ॥ ३ ॥
संसा सोग सरीर सुरसरी९ बहत हैं ।
नाहीं चौदह भुवन गमन१० में रहत हैं ॥ ४ ॥
दुरमत दोजख माहिं बलै११ बहु भाँत है ।
सतगुरु भँटा होय तो निःचै साँत१२ है ॥ ५ ॥
आजिज जीव अनाथ परा है बंद में ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब जगत सब फंद में ॥ ६ ॥


(१) तुरही । (२) धूम । (३) भाला । (४) अंधकार रूपी भ्रम दूर हो गया ।
(५) बैद । (६) रैयत । (७) यतीम । (८) धोवन । (६) नदी । (१०) थिर नहीं रहते आवा-
गमन लगा रहता है । (११) जलै । (१२) शांत ।