सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 186 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104

६४ गरीबदास जी की बानी
कामधेनु सदा कलपबृच्छ कला, जहँ अमी महारस दूभत१ है ।
कहै दास गरीब गगन गादी, गैबी गलताना गूँजत है ॥३॥
( ४ )
झलकै निज नूर जहूर सदा, बिभरै२ निरधार अपार कला ।
कादिर कुरबान अमान सही, रहता रमता है अलख अलाह ॥१॥
सरबंग अभंग अनाहद है, जल थल पूरन है सुन्न सिला ।
दरवेस दयाल निहाल करै, करनी भरनी डूबै न जला३ ॥२॥
घट देह सनेह नहीं जाके, सरवन चसमैं नहि कंठ गला ।
कुछ रूप न रंग अभंग बिधा, सोवै न जगै बैठा न खला४ ॥३॥
करले दीदार जुहार५ सही, तेरा जुगन जुगन होय जात भला ।
कहै दास गरीब अलख लखिये, कोइ दरगह में पकरे न पला६ ॥४॥
( ५ )
निरबान निरंजन चीन्ह भइया, दुख दारिद मोछ करै करता ।
गरभ बास मिटै निज नाम रटे, क्यूँ जुगन जुगन चोले धरता ॥१॥
चल थीर करो अवगत नगरी, तू लख चौरासी क्यूँ फिरता ।
सत संगत ले निज साधन की, नहिं नाम बिना कारज सरता ॥२
दयावंत विवेकि भये ज्ञानी, टुक छेड़ करे से सब लड़ता ।
चुंडित७ मुंडित७ सब पकर लिये,इनसे जम किंकर८ ना डरता ॥३॥
तू कौन कहाँ से आन फँदा, देख आग बिरानी क्यूँ जरता ।
समझै नहिं सीख सुदरगह६ ले, बड़े भूत भये जो पिंड भरता ॥४॥
मुकता होने का भेद कहूँ, चल चौर सोहंगम जित दुरता ।
कहै दास गरीब निवास सदा, जहँ नाद अखंड अजब घुरता ॥५
( ६ )
झलकै जोती मुकता मोती, निरभै निरबानी भेटा है ।


(१) दुहा है। (२) फैल रही है। (३) जल में। (४) खड़ा । (५) प्रणाम । (६) पल्ला,
दामन । (७) जटा धारी और मूड़ मुड़ाये हुए भेष । (८) दूत, नौकर । (६) अच्छी
दरगाह को पकड़ ।