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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

६० गरीबदास जी की बानी
अजामेल से अधम उधारे पतित-पावन ब्रिद्१ तासु है ।
केसो आन भया बनजारा षट दल कीन्ही हाँस है ॥४४॥
धना२ भक्त का खेत निपाया माधो३ दई सिकलात३ है ।
पंडा पाव४ बुझाया सतगुरु जगन्नाथ की बात है ॥४५॥
गैबी ख्याल बिसाल सतगुरु अचल दिगंबर५ थीर है ।
भक्ति हेत काया धर आये अवगत सत्त कबीर है ॥४६॥
नानक दादू अगम अगाधू तिरी जहाज खेवट सही ।
सुख सागर के हंसा आये भक्ति हिरंबर उर धरी ॥४७॥
कोटि भानु प्रकास पूरन रोम रोम की लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अवगत का दीदार है ॥४८॥
धन सतगुरु उपदेस देवा चौरासी भ्रम मेटहीं ।
तेज पुंज तन देह धरके इस बिध हमकूँ भेंटहीं ॥४६॥
सब्द निवास अकास बानी यह सतगुरु का रूप है ।
चंद सूर न पवन पानी जहाँ छाँह न धूप है ॥५०॥
रहता रमता राम साहब अवगत अलह अलेख है ।
भूले पंथ बिडंब६ बानी कुल का खाविंद७ एक है ॥५१॥
रोम रोम में जाप जप ले अष्ट कमल दल मेल है ।
सुरत निरत को कमल पठवो जहाँ दीपक बिन तेल है ॥५२॥
हर दम खोज हनोज८ हाजिर तिरबेनी के तीर है ।
दास गरीब तबीब९ सतगुरु बन्दी छोड़ कबीर है ॥५३॥
(१) बिरद् = कीर्ति । (२) देखो नोट पृष्ठ २८ । (३) सकलात = पीताम्बर–माधवदास
जगन्नाथजी के एक प्रेमी पुजारी थे जिनको कोई कड़ी बीमारी हो गई थी । और पुजारी
लोग उनको समुद्र किनारे बैठा आये । रात को जब माधवदासजी को जाड़ा लगा तो
जगन्नाथजी अपना पीताम्बर उनको ओढ़ा आये और आरोग्य कर दिया । सबेरे पीताम्बर
मूर्ति पर न पाकर उसकी खोज पड़ी तो पुजारियों ने उसे माधवदास के तन पर पाकर
उनकी महिमा जानी और आदर से मंदिर में लाये । (४) पाव = आग - देखो नोट पृष्ठ
७१ । (५) बिना वस्त्र । (६) पाखंड । (७) स्वामी । (८) सदा । (६) वैद्य ।