गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंझूलना १०१
सुन्न के ताक१ में पाँच परपंच हैं, तीन के भवन पर गमन कीजै ।
खड़ा मंजार सिर पीट रोवै सदा, उड़ै आकास बृछ अच्छै लीजै ॥
प्रेम बानी पढ़ै नाम निःचै रटै, चंद चकोर ज्यूँ ध्यान ध्यानी ।
दास गरीब यह खेल जो याद है, तौ पींजरा छोड़ नहिं ब्रह्म ज्ञानी ॥
( ५ )
बंदी-छोड़ साहब कूँ देख भइया, तेरे नैन में बैन बिलास बानी ।
कच्छकुरम जिन धौल धरना धरे, लोक परलोक इक सब्द ठानी ॥
सूक्ष्म सारूप बिस्तार एता किया, आदि अरु अंत मध नाहिं है रे ।
सृष्ट का करता सृष्ट में रम रहा, नैन के बीच में सही है रे ॥
गुलबास निवास जो पहुप गँध झीन है, मुग्ध की दृष्ट में नाहिं आवै ।
सुरत की सैल से निरत आगे चलै, बिना आकार का भेद पावै ॥
पिंड ब्रह्मांड से सिध न्यारी कहूँ, तिर्कुटी भिकुटी नाहिं दसमाँ ।
हद बेहद के मद्ध निज महल है, रोसनी सेज बिन देख चसमाँ ॥
रँग महल की सैर जहँ सुरत निःचल करै, निरत कूँ वार और पार पेलै ।
पिंड ब्रह्मांड का खोज पावै नहीं, बिना आकार आकार मेलै ॥
स्रवन और नैन जहँ नासिका है नहीं, नहीं मन पवन जहँ सीस द्वारा ।
सत कमल काया नहीं खोया पाया नहीं, नूर जहूर अवगत हजारा ॥
जहँ रहत है हंस जो सिध सूभर२ भरा, मीन के खोज मुस्ताक रहना ।
दास गरीब कबीर सतगुरु मिले, समझ कर खेल नहिं भेद कहना ॥
( ६ )
भली भाँत के भेद सूँ रहना यारो, अगर दीप के धाम कूँ जाना है जी ।
चिदानंद कूँ चीन्ह दीदार पावै, जाका तंबू बनाया असमान है जी ॥
बैठा चाँदनी चौक में यार मेरा, अडील३ परदा नहीं तासु के जी ।
बानी बोलता अमर अनुराग रागी, जाका गावना को नहीं गा सके जी
अरस कुरस पर पंथ है झीन मेरा, मीन खोज की बाट लखावता हूँ ।
(१) आला । (२) शुभ्र = निर्मल । (३) बिना डील का ।
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