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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

१०४ गरीबदास जी की बानी
( २ )
है मौला मस्तान मुलायम महल रे ।
चीन्हो सब्द सिताव जीवना सहल रे ॥ १ ॥
राजा रंक फकीर फना हो जायँगे ।
बिना बंदगी बाद बहुत पछतायँगे ॥ २ ॥
जनम पदारथ पाय पुरुष जाना नहीं ।
गीदी गदहा स्वान सब्द माना नहीं ॥ ३ ॥
लेखा बारम्बार धरमराय लेत है ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब कसौटी देत है ॥ ४ ॥
( ३ )
बिना मूल अस्थूल गगन में रम रहा ।
कोई न जाने भेव सकल सब भ्रम रहा ॥ १ ॥
अच्छै बृच्छ बिस्तार अपार अजोख है ।
नहीं गाम नहिं धाम भुक्त नहि मोख है ॥ २ ॥
छत्र सिंघासन सेत पुरुष का रूप है ।
बरन अबरन बिचार न छाया धूप है ॥ ३ ॥
देख पदम उँजियार परख नहिं आवही ।
करम लिखा सो होय टरै नहिं भावही१ ॥ ४ ॥
अवगत पूरन ब्रह्म परस परवान रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब सब्द पहचान रे ॥ ५ ॥
( ४ )
सिव ब्रह्मा का राज इंद्र गिनती कहाँ ।
चार मुक्ति बैकुंठ समझ एता लहा ॥ १ ॥
संख जुगन की जूनि२ उमर बड़ धारिया ।
जा जननी कुरबान सु कागज फारिया३ ॥ २ ॥


(१) भावी = होनहार । (२) योनि ! (३) जिसका कर्म का लेखा चुक गया उसकी
जन्म देने वाली (माँ) पूजने योग्य है ।