श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
तृतीय अध्याय ७३
शिष्यों को देता है। ये सद्गुरु के लक्षण हैं लेकिन ज्ञान के अहंकार के कारण वे पण्डितों की समझ में नहीं आते।
जो पूर्ण अनुभवी होते हैं वे ही इस रहस्य को जानते हैं, दूसरों का ज्ञान वहाँ पंगु पड़ जाता है इसके गुरुत्व की
महानता यह है कि उसमें पूर्ण शान्ति का वास रहता है। हे राजा! सद्गुरु का लक्षण यही है और मुख्य भूषण भी
यही है। संसार में शान्ति परदेसी हो गयी थी उसे निवास के लिये कहीं स्थान नहीं मिल रहा था इसलिये वह
सद्गुरु के चरणों में वास करने आयी। जिस प्रकार माँ के घर आने पर लड़की स्वेच्छा से विचरण करती है, उसी
प्रकार शान्ति भी आनन्दपूर्वक वास करने के लिए सद्गुरु के पास आती है। वेदशास्त्र का मर्म जानकर भी जो
विद्वत्ता की शेखी नहीं बघारता, जिसे आत्मानुभव से ही पूर्ण शान्ति प्राप्त हुई रहती है, वही निश्चित रूप से
सद्गुरु है। शायद श्रोतागण यह कहकर रुष्ट हो जाएँ कि व्यर्थ ही अनावश्यक विस्तार कर ग्रन्थ को बड़ा किया।
लेकिन 'निष्णात' शब्द का अर्थ लगाते समय ये सारी बातें ध्यान में आयीं। यह कोई मेरा अपना पांडित्य नहीं है
बल्कि सद्गुरु स्वयं ही पद-पद में अर्थ स्पष्ट कर मुझसे कहला रहे हैं। फिर भी सद्गुरु के लक्षण अगाध होने
के कारण उनका वर्णन करना कठिन है। वेद भी जहाँ पागल होकर मौन हो जाते हैं वहाँ मेरा बोलना कहाँ तक
काम आयेगा ? देखिये, कैसा चमत्कार है। मेरे सखा जनार्दन स्वामी प्रसन्न हुए इसलिए श्रीमद्भागवत देशी भाषा
में, अर्थात् प्राकृत में उत्तम रीति से प्रकट हुआ। एका जनार्दन की शरण में है। जब उसकी पूर्ण कृपा होती है तभी
गुरुभक्त देह में रहते हुए भी देह के बन्धन को स्पर्श नहीं करता। जिनके चरणों की सेवा करने से देह में रहते
हुए भी देह बन्धन की बाधा नहीं होती, उनकी शरण में अनन्य भाव से जाने पर जिस अगाध ज्ञान की प्राप्ति
होगी उसका पता वेदों को भी नहीं है। सद्गुरु भक्ति न करने से परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होगी, इसलिये
शिष्य के कल्याण के लिए ग्रन्थों में सद्गुरुभक्ति करने के लिये कहा गया है। इसलिए अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाना चाहिए ताकि वे अपने यथार्थ आत्मबोध बताकर शिष्य को सद्भावना से सन्तुष्ट कर सकें। राजा!
इस प्रकार सद्गुरु का लक्षण तुम्हें बताया। अब शिष्य का लक्षण बताता हूँ। ध्यान से सुनो।
तत्रभागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः।
अमाययाऽनुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदोहरिः ॥ २२ ॥
कितने ही शिष्य ऊपर से सात्विक दिखाई पड़ते हैं किन्तु अन्दर बड़े विकल्पी होते हैं। किसी को केवल
प्रतिष्ठा की चाह रहती है तो कोई स्वयं को ब्रह्मनिष्ठ समझ कर कर्म ही नहीं करते हैं। किसी को प्राणायाम
अच्छा लगता है, किसी को आसन का अभिमान रहता है, किसी के मन में सन्देह होने के कारण उसे पूर्ण
विश्वास किसी भी बात में नहीं होता। कुछ लोग बड़े आदरपूर्वक गुरु से उपदेश लेते हैं लेकिन मन में फलप्राप्ति
के सम्बन्ध में विकल्प रखते हैं। इस प्रकार शिष्यों के अनेक भेद हैं। लेकिन वास्तव में वे सारे ढोंगी होते हैं यह
ध्यान में रखो। अब सच्चे शिष्य के लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो। सच्चे शिष्य निष्कपट बुद्धिवाले, शुद्ध
सत्वगुणी तथा सच्चे परमार्थ साधक होते हैं। उनमें ढोंग नहीं होता। वे गुरुचरणों के सेवक, गुरुवचन पर बिके
हुए तथा सद्गुरु पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले होते हैं। सच्छिष्य सद्गुरु के वचनों के लिए अपने प्राणों
को भी न्योछावर कर देते हैं। गुरु की आज्ञा के बाहर वह तिलमात्र भी नहीं हिल सकता। सद्गुरु को जो केवल
मनुष्य बुद्धि से नहीं देखता, जो गुरु सेवा के लिए सदैव आनन्द से तत्पर रहता है, निजभाव से सेवा के लिये वह
अत्यन्त तत्पर रहता है, आठों पहर शरीर घिसना पड़े तो भी वह काम से जी नहीं चुराता। यह काम उच्च है या
यह काम नीच है ऐसी कल्पना भी उसके मन में नहीं आती। अपना नित्य का धर्मकर्म गौण मानकर वह गुरु की
७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सेवा को उत्तम मानता है। सेवा में किसी प्रकार का कपट न कर वह शुद्ध मन से उसे करता है। सेवा में कष्ट
जितना अधिक होता है, उतना ही उसका मन अधिक उल्हसित होता है। गुरु के लिए सच्छिष्य और असच्छिष्य
एक समान रहते हैं लेकिन जिसके हृदय में जैसा भाव रहता है उसी के अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। 'भावेषु
विद्यते देवो' यही उपदेश का सार है। अपने भाव के अनुसार ही फलभोग भोगना पड़ता है। अपनी बुद्धि के
अहंकार के बल पर मृत्यु से बचने के प्रयास में हिरण्यकशिपु मारा गया। मौका देखकर भगवान ने उसे समाप्त
कर दिया। लेकिन उधर प्रह्लाद को देखिये। देवाधिदेव मेरी रक्षा करने वाला है ऐसा उसका दृढ़ भाव था और
उसी भाव के कारण राजा ने उसे मारने के जितने भी प्रयत्न किये वे सब व्यर्थ गये। परमार्थ में ज्ञान का अभिमान
शुद्ध डाका है इसलिये जो सद्भाव से परिपूर्ण रहता है वही जन्म-मरण के बन्धन तोड़ डालता है। शिष्य की
परीक्षा करने वाला मैं ज्ञानी हूँ ऐसा अहंकार सद्गुरु को कभी नहीं होता बल्कि उसके प्रति जिसके मन में जैसी
भक्ति होती है वैसा वह फल पाता है। राजा! इसे रहने दो लेकिन देखो अच्छे शिष्य का सद्भाव कितना विचित्र
होता है। गुरु और ब्रह्म को वह ऐक्य भाव से मानता है। वह मानता है कि सद्गुरु मेरी इन्द्रियों का परिचालक,
मेरे हृदय में रहने वाली 'आत्मा' है तथा बाह्य सेवा करते समय सद्गुरु वास्तव में साक्षात 'ब्रह्ममूर्ति' है।
सद्गुरुचरणों में वह अपना तन-मन-धन अर्पण कर अपना प्राण भी उसे अर्पण कर देता है, अर्थात् सब कुछ
आत्मार्पण करता है। इससे सद्गुरु भी उस पर सन्तुष्ट होकर उससे मोहित हो जाते हैं और स्वयं स्वामी होते हुए
भी सेवक के अधीन हो जाते हैं। बलि ने सर्वस्व अर्पण कर दिया इसलिये भगवान उसके द्वार पर द्वारपाल
बनकर रह गये। भजन भक्ति का यह आनन्द है कि उसमें जो स्वामी रहता है वही सेवक के पास पहरा देता है।
जो उत्तम भक्त होते हैं वे भगवान की ऐसी अगाध प्रीति के पात्र बनते हैं, लेकिन यह लाभ भोले-भाले लोगों को
कैसे प्राप्त होगा? इसीलिए हर प्रकार से सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए ताकि वह प्रसन्न होकर शिष्य को
का उपदेश कर सके। जिस भजन से भगवान का भजन कर 'उत्तम भक्त' बने, उन सारे भागवतधर्मों
को सद्गुरु से निश्चयपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक सीखना चाहिए। भागवत धर्म का प्रमुख लक्षण है सत्संगती। सद्गुरु
भी असत्संगति का त्याग करने के लिए यही उपदेश देते हैं।
सर्वतौ मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु।
दयां मैत्रीं प्रश्रय च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३॥
मन में यदि सबसे निःसंग होने की इच्छा हो तो निश्चित रूप से सत्संग करना चाहिए और असत्संग
छोड़ देना चाहिए। देह संगति ही मुख्य असत्संग है। इसलिए उसे समूल वर्जित करना चाहिए। हे राजेश्वर!
सत्संगति ही सामर्थ्यवान है यह बात ध्यान में रखो। जहाँ दया, मैत्री और विनय इन तीन लक्षणों का पूर्णत्व के
साथ वास दिखायी दे उस पुरुष की संगति को 'सत्संग' कहना चाहिए। 'स्वहित' सिद्ध करने के लिये
'सत्संग' अत्यन्त आवश्यक है। बड़प्पन छोड़ कर साधु की शरण में लीन होना चाहिये। देहाभिमान त्याग कर
उन्हें साक्षात् दण्डवत करना चाहिए। संसार में साधु से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। संतों का पूजन करने से स्वयं
देवताओं को भी सन्तोष होता है। पूरी श्रद्धा से संतों की चरण रज को सर पर धारण करना चाहिये। संतों के
सामने अपनी बुद्धि की शेखी नहीं बघारनी चाहिये। संतों का समुदाय देखकर वे भगवत्स्वरूप हैं ऐसा भाव
एकनिष्ठा से धारण करना चाहिये। ऐसी भगवद्भावना से विनम्र होने को ही 'प्रश्रय' अथवा विनय कहते हैं।
विनम्रतापूर्वक संत चरणों की सेवा करते रहने से भूतदया की वृद्धि होती है। यही 'दया' का प्रमुख लक्षण है।
तृतीय अध्याय ७५
प्राणिमात्र का दुःख देखकर जिसके प्राण बेचैन हो उठते हैं वह किसी को दुःख देने का विचार स्वप्न में भी
नहीं कर सकता। जिससे स्वयं को दुःख होता है, ऐसा आचरण वह प्राणिमात्र के प्रति कभी भी नहीं करता।
जिससे स्वयं को सुख प्राप्त होता है, वही आचरण वह दीनों के प्रति करता है। वह समस्त प्राणियों पर समान
रूप से दया करता है, उन्हें कभी खराब शब्द नहीं कहता। प्राणिमात्र के दुःखों का जिससे निवारण हो तथा
उन्हें सुख प्राप्त हो ऐसे ही उपायों का वह चिन्तन करता है। प्राणिमात्र को दुरुक्ति कहने से, जिह्वा को काटने
के लिए तत्पर हो उठता है। प्राणिमात्र के प्रति दुर्भाव का चिन्तन करने पर वह अपने ही चित्त का निर्दलन
करने लगता है। प्राणिमात्र को दुःख होता है तो वह उनके लिए अपने प्राण बिछा देता है। सारे जीव उसे
दयार्द दृष्टि से अपने प्राणों से भी प्रिय लगते हैं। ऐसी पूर्ण करुणा का ही नाम 'दया' है। अब 'मैत्री' का
असाधारण लक्षण बताता हूँ। सुनो! सभी प्राणिमात्र के लिए सुहृदों के सिवा और कोई अपना नहीं है। इसलिए
मैत्री बिना किये ही अपने आप हो जाती है। विषयों के वियोग से वह खराब नहीं होती, विकल्पों से वह
टूटती नहीं है, सारांश यही है कि कितने ही बड़े संकट क्यों न आयें, लेकिन मैत्री वैसी की वैसी बनी रहती
है। प्राण जाने पर भी जो नहीं टूटती उसी का नाम मैत्री है। कल्पांत का घाव सामने देखते ही मित्र समुदाय
एकत्र हो जाता है। ऐसा आचरण करने से प्राणिमात्र के मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। उस श्रद्धा की व्युत्पत्ति के
सम्बन्ध में क्रम से बताऊँगा। श्रद्धा का लक्षण अत्यन्त विचित्र है। इसमें ब्रह्मदेव तथा चींटी एक समान मालूम
होते हैं। फिर भी यथोचित क्रिया कभी नहीं चूकती यह ध्यान में रखो। अर्घ्यपाद्यादि पूजन सभी प्रकार के दान
तथा सम्मान यह सब श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करना होता है। किसी को केवल अन्न ही दिया जाता है,
किसी को अन्न और वस्त्र, किसी को केवल सूखा अनाज, किसी को चारा और पानी तो किसी को पीने के
लिये केवल दूध देना चाहिये। संक्षेप में कहें तो जिससे उसे पूर्ण सुख प्राप्त हो, वह सब उसे पूरी श्रद्धा से
देना चाहिये। अनुचित श्रद्धा से किया हुआ कार्य सभी प्रकार से दुःखकर होता है। उदाहरण के लिए ब्राह्मण
को घास देना तथा गाय को पकवान परोसना अथवा श्वान को सिंहासन पर बैठाना और साधु को गन्दे गड्ढे
में बैठने के लिये कहना अनुचित श्रद्धा का लक्षण है। भले ही बाघ का उपवास हो जाय लेकिन उसे गोदान
नहीं देना चाहिये। गाय कीचड़ से लथपथ हो गयी हो तो तेल लगाकर नहीं नहलाना चाहिये। इन्द्रिय भले ही
देह के ही भाग हों लेकिन जैसे जिह्वा का कार्य नाक से नहीं होता उसी प्रकार सब प्राणियों की आत्मा भले ही
एक हो लेकिन उनकी पूजा उनकी योग्यता के अनुसार ही करनी चाहिये। योग्यता के अनुसार देने में क्रिया
भले ही भिन्न हो लेकिन अंतःकरण की श्रद्धा अभिन्न रहती है। भागवत धर्म का प्रमुख लक्षण यही है। समस्त
भूतों में भूतात्मा अभिन्न स्थिति में होती है इसलिए दया, मैत्री तथा साधु के प्रति भक्ति किस प्रकार प्राप्त
होगी? प्रबुद्ध ऋषि इसके लिये उपाय बताने लगे। साधकों को ब्रह्म प्राप्ति हेतु भागवत धर्म की स्थिति अगले
नौ श्लोकों में प्रबुद्ध राजा को बता रहे हैं।
शौचंतपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्ज्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयोः ॥ २४॥
परमार्थ साधने के लिये 'शुचिर्भूत' होना आवश्यक है। शुचिता के सिवा कभी भी स्वार्थसिद्धि नहीं हो
सकेगी। इसलिये हे राजा! शुद्ध शौच के अर्थात् शुचिता के लक्षण सुनो। अंतःकरण का मल धोये बिना बाह्य
शुद्धि नहीं होती। वासना के मल से म्लान हुए मन को स्वच्छ किये बिना अहंकार से बाह्य सफाई दिखाना
७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किसी अन्धे के घूर कर देखने की तरह है। वासना के मल से मलिन हुए मन को भक्तिभाव से गुरु वचनों पर
विश्वास कर आत्मनिष्ठा से धोकर पवित्र करना चाहिए। जिस प्रकार अग्नि में डालने से सुवर्ण की गन्दगी जल
जाती है और वह शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार गुरुसेवा के कारण जड़त्व टूट जाता है और निर्दोष चित्तशुद्धि
प्राप्त होती है। जिस प्रकार शीशा साफ करने से अपना ही चेहरा साफ दिखायी देता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धि से
आत्मशुद्धि अपने आप हो जाती है। लोहा यदि पारस को ढँकता है तो वह अपने लौहत्व को खो देता है, उसी
प्रकार अंत:शुद्धि करने से स्थूलबुद्धि का लोप हो जाता है। सूर्यकान्त को सूर्य के सामने धरने से वह सूर्य के
तेज से प्रदीप्त होता है और वही तेज अग्नि के रूप में प्रकट होकर यज्ञ याग के काम आता है। उसी प्रकार
गुरुवचन से अंत:शुद्धि होने पर अंतर्बाह्य शुचिता प्रकट होती है। ऐसी शुचिता जो नहीं करते वे वास्तव में बहुत
बड़े ढोंगी हैं। शौच जाते समय यदि जल कम ले जाएँ तो हाथ गन्दे ही रह जाते हैं और गुदाद्वार भी साफ नहीं
हो पाता। उसी प्रकार विकल्पी लोग अपवित्र बने रहते हैं। अन्दर विष भरा हुआ किन्तु ऊपर से देखने में
अत्यन्त सुन्दर। ऐसे कटुफल को कोई नहीं स्वीकारता क्योंकि उसके भीतर अत्यन्त कटुता भरी रहती है।
धोबियों के राजा को यदि तीर्थ में नहलाया जाय तो क्या वह सचमुच ब्राह्मण बन जायगा ? नट राजा का स्वांग
करे तो वह अपनी बाह्य क्रियाओं से पूज्य नहीं हो जाता। लड़की कितनी भी सुन्दर और सुकुमार हो लेकिन
यदि उसके होठों पर कोढ़ हो गया हो तो कोई उससे विवाह नहीं करता। नीचे नग्न हो और मस्तक पर मोतियों
की बनी जाली पहन ले, अथवा नकटी लड़की नाक में आवदार मोती की नथ पहन ले तो वह जिस प्रकार
उसका उपहास होगा उसी प्रकार बाहर से पवित्रता दिखलाने पर उतनी ही विडम्बना होगी। कौवे के शरीर पर
दही का लेप करने से क्या वह राजहंस बन जायेगा ? दही समझ कर यदि रूई धुनने लगे तो मक्खन तो नहीं ही
निकलेगा लेकिन ठट्ठा अवश्य होगी। उसी प्रकार यदि अंत:करण में विकल्प हो तो बाहर से पवित्रता दिखाने के
लिए जो-जो क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, उससे हे राजा ! विडम्बना ही होती है। गुरुपदेश के अनुभव से अंत:करण
को निर्मल कर लेने पर और शास्त्रीय मार्ग से बाह्यांग स्वच्छ करने पर ही सच्ची पवित्रता आती है और वहीं
अद्वैत स्थिति का वास होता है। जब अंत:करण में पूर्ण पवित्रता का वास हो जाता है तो वह बाह्य कर्मों से प्रकट
होने लगती और वही पवित्रता अपने आप परमार्थ दशा को पहुँचाती है। ईश्वर भाव का यह रहस्य जिसे
आत्मसात होता है उसका कर्म ही ब्रह्मरूप हो जाता है और उसे देहभ्रम की बाधा नहीं होती। हे नृपश्रेष्ठ इसी
का नाम है, 'पवित्रता'। अब तप की स्थिति बताता हूँ सुनो। शरीरशोषण को तप कहते हैं लेकिन वह प्रारब्ध
भोग के अनुरूप होता है। हृदय में कृष्णस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करना यही तप का शुद्ध रूप है। जिस प्रकार
'वीरश्री' का मद आँखों पर चढ़ते ही वह पुरुष अपनी दृष्टि अग्रभाग पर केन्द्रित कर रण में पराक्रम करने के
लिये अग्रसर होता है, उसी प्रकार हृदय में ईश्वर को धारण कर जो संसार में विचरण करता है वही सच्चा
'तपस्वी' है। यही तप का सच्चा स्वरूप है और इसी का नाम है शुद्ध 'तप'। इससे अधिक इसके स्वरूप के
सम्बन्ध में कहना कठिन है। फिर व्यर्थ की बकवास किसलिये ? मुमुक्षु में द्वंद्व सहिष्णुता होनी चाहिये। इसी का
नाम 'तितिक्षा' है। हे नृपवर्य ! स्मरण रखने के लिये उसे भी सुन लो। दीवार पर बने शेर और शेरनी के चित्र के
बीच में एक दीवार ही रहती है उसी प्रकार सुख और दुःख इन दोनों भोगों के बीच भी अपना ही शरीर अखण्ड
रहता है। जिस प्रकार दावाग्नि से अथवा ग्रीष्म की तपन से आकाश नहीं झुलसता, वह तपन से अलिप्त ही
रहता है पानी ठंडा हो या बर्फ ही गिरती रहे लेकिन पृथ्वी अपनी सहनशीलता के कारण काँपती नहीं है उसी
प्रकार आत्मस्वरूप के सुख के कारण सच्चा साधु भी द्वंद्व में लिप्त नहीं होता, शरीर ठंडक से ठिठुरता भी हो तो
तृतीय अध्याय ७७
भी साधु नहीं ठिठुरता, अत्यन्त गर्मी से शरीर तप्त होता है लेकिन उस देह के ताप के कारण साधु गरम नहीं
होता। सुख को देखकर वह उसे जितनी खुशी से आलिंगन देता है उतनी ही प्रसन्नता से वह दुःख भी सहन
करता है। राजा ! इसी का नाम है सच्ची 'द्वंद्व सहिष्णुता'। सामने से गुलेल का पत्थर आकर लगता है तो दुःख
होता है लेकिन वही पत्थर सोने का हो तो दुःख के स्थान पर अपार आनन्द होता है। सुख या दुःख को व्यक्त
करने वाला तत्व एक ही है। उससे एकता होने पर साधक सुखपूर्वक द्वंद्व सहन करते हैं। उसी प्रकार द्वंद्व का
अनुभव जिस ज्ञान को होता है उसे जान लेने पर द्वंद्व की परिणति निर्द्वंद्व में होती है। कड़े गन्ने में और उसके रस
में जिस प्रकार अखण्ड मिठास रहती है उसीप्रकार द्वंद्व में 'चिद्धन वस्तु' को वह देखता है। ऐसी यह अखण्डता
जब तक साधक के हाथ नहीं लगेगी, तब तक हे राजाधिराज ! ये द्वंद्व सचमुच ही सहन नहीं होंगे। इसी का नाम
द्वंद्वसहन या 'तितिक्षा' है। अब 'मौन' का क्या लक्षण होता है उसे ध्यान से सुनो। लोगों में वाद-विवाद करने से
देहाभिमान दृढ़ होता है किन्तु सद्गुरु ने उस अभिमान को शब्दों के साथ ही समूल नष्ट कर दिया। सद्गुरुं के
वचन कान में पड़ते ही स्तुति और निन्दा दोनों को निगल कर मुख से बोल नहीं निकलते। हृदय में तितिक्षा भर
जाती है। किसी का अवगुण कहने लगो तो वहाँ अपनी ही मूरत दिखायी देती है। इसीलिये किसी को कठोर
वचन कहते समय गुरुवचन से वह मौन हो जाते हैं क्योंकि स्वयं ही स्तव्य, स्तविता और स्तवन होने के कारण
अपना ही स्तवन करना मूर्खता ही होगी। जहाँ अपनी आत्मा नहीं हो ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ-जहाँ जो
भी दिखाई देता है वह निरन्तर आत्मप्रकाश के ही कारण दिखाई देता है। सद्गुरु ने ऐसी युक्ति बता दी और वह
विश्वास के कारण अंतःकरण में इस प्रकार स्थिर हो गयी जिससे वह वाचा से निन्दा या स्तुति करता ही नहीं
है। अगर अपने हित के लिये कुछ संवाद करना भी चाहता है तो, सद्गुरु के भाषण के आगे वेदशास्त्रों की
युक्तियाँ भी कुंठित हो जाती हैं। इस प्रकार स्तुति, निन्दा अथवा विवाद ही समाप्त हो जाता है। ऐसे महामौन के
कारण साधकों को परमानन्द की प्राप्ति होती है। ऐसा महामौन साध्य होने के लिये सद्गुरु वेदाध्ययन कराते हैं
अथवा उपनिषद के अर्थ का विश्लेषण कर उसका अर्थज्ञान समझाते हैं। यदि इससे भी दृढ़ मौन प्राप्त करना हो
तो श्रीरामकृष्ण का नामस्मरण करने के लिये कहते हैं। नामस्मरण की अखण्ड गर्जना के आगे वेदार्थ भी उसके
सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। जिसकी वाणी निरन्तर रामनाम की गर्जना करती रहती है उसे दण्डवत
करने के लिए तीर्थ भी वहाँ उपस्थित होते हैं, बड़े-बड़े देवतागण उसका चरणस्पर्श करते हैं और यम स्वयं
उसके चरणों का तीर्थ अपने मस्तक पर लगाता है। अरे ! जिसे रामनाम का स्मरण कहते हैं वही साक्षात
'महामौन' है। वेदों ने नाम का पूर्ण स्तवन किया है, इसीलिये हरिनाम ही शुद्ध वेदाध्ययन है। तात्पर्य यह है कि
हरि का नामस्मरण करने से वेदाध्ययन का फल प्राप्त होता है। वेद अथवा नामस्मरण इसी का नाम 'स्वाध्याय'
है यह ध्यान में रखो। महाराज ! अब 'आर्जव' का लक्षण ध्यान से श्रवण करो। आर्जव वह है जो जीव में
जीवन रहता है अथवा वस्त्र में तंतु ऐक्यभाव से रहते हैं अथवा जैसे शक्कर का करैला बनाने से उसका माधुर्य
कम नहीं होता, उसी प्रकार विषम स्वभाव जीवों का भी यह अपने मृदु स्वभाव से रंजन करता है। चन्द्र की
चन्द्रिका भले ही वक्र हो लेकिन इसके कारण भीतर का अमृत नहीं छलकता। उसी प्रकार टेढ़े स्वभाव के लोगों
को देखकर भी उसकी मनोवृत्ति में परिवर्तन नहीं होता। वह किसी को भी नीच नहीं समझता सभी को अपना
मित्र, सगा-सम्बन्धी समझता है, मानों प्रत्येक प्राणिमात्र से उसका पुराना परिचय हो। निहाई तप्त लोहे को
सहारा देती है, हथौड़े का घाव भी सहन करती है, सँडसी से लोहे के टुकड़े को पकड़कर उस पर हथौड़े से
प्रहार करते हैं, उस लोहे के साथ वह लौहगुण से ही सम्बन्ध रखती है। उसी प्रकार जिसे सभी सगे हैं, ऐसा
जिसका स्वभाव है उसका नाम 'आर्जव' है। यह गुरुदीक्षा नितान्त अपूर्व है। (अब ब्रह्मचर्य के बारे में बताते
हैं) देवता, दानव, बड़े-बड़े ऋषि आदि को भी मदन ने अपना दास बना कर रखा है। इस मदन की मार बहुत
कठिन है। यह अत्यन्त दुर्धर अंतःकरण में काम का स्थायी निवास है तिस पर कामवृत्ति को दबाने का प्रयास
करता है। उसका मन ही उसे निष्काम नहीं रहने देता। लेकिन लोगों को वह ठगता है। लेकिन सद्गुरु की युक्ति
ऐसी नहीं है। उनके उपदेश से काम की कामनावृत्ति ही बदल जाती है। वे शिष्य को अखण्ड ब्रह्मचर्य का
उपदेश करते हैं। मदन के राज्य में स्त्री-पुरुष का भेद है लेकिन गुरुदीक्षा अलौकिक है। इस दीक्षा में स्त्री-पुरुष
दोनों माया अर्थात् मिथ्या है और विषयसुख केवल भ्रम है। इस पर कोई शंका प्रकट करता है—'जननेन्द्रिय ही
आनन्द का स्थान है।' यह वेदवचन क्या गलत है? इस पर समाधान इस प्रकार है। जो वेदों के पूर्ण ज्ञाता हैं वह
इसका विवेचन इस प्रकार करते हैं—'शक्कर का माधुर्य कैसा है' यह यदि कोई पूछे तो बताना कठिन है। उसे
शक्कर का एक कण चखने के लिये दिया जाता है। उसे चखने पर उस कण में जो मिठास है वही शक्कर की
पूरी राशि में है ऐसा मालूम होता है। इस प्रकार लोग परमानन्द सुख की मिठास जननेन्द्रिय के रूप में चखते हैं।
इसी उद्देश्य से वेदों ने जननेन्द्रिय को आनन्द का स्थान बताया है। वह जननेन्द्रिय सुख क्षणिक होता है लेकिन
उस सुख की नित्य स्थिति को जो संभोग के बिना ही बढ़ाते हैं उन्हें स्त्री-पुरुष मिथ्या मालूम होते हैं और वे
सहज ही संज्ञान हो जाते हैं। जिस मिठास को चखा वही शक्कर है उसी प्रकार मैथुन को ही परमानन्द मानकर
विषयांध लोग मैथुन के पीछे दौड़ते हैं। जननेन्द्रिय में ही परमानन्द की मिठास होती है यह मानकर मूर्ख
शिरोमणि निरन्तर स्त्री काम का दबाव सहते रहते हैं। शक्कर का यदि नारियल बनाया जाय तो उसका कवच,
गरी आदि सब शक्कर ही होता है। उसी प्रकार विषय सुख का कल्लोल मूलतः मूल परमानन्द से ही होता है।
कितने भी प्रकार के पकवान क्यों न बनाये जाएँ लेकिन उसमें जो स्वाद आता है वह शक्कर की मिठास के
कारण ही होता है उसी प्रकार विषय के प्रति जो आकर्षण उत्पन्न होता है, वह आत्मानन्द के माधुर्य के कारण
ही होता है। यह मूल आत्मस्वरूप की मिठास उनकी समझ में नहीं आती और वे विषयों का दबाव सहते रहते
हैं। किन्तु सद्गुरुकृपा अत्यन्त बलवान है। वह विषयों की सारी आसक्ति एक ओर खींच लाती है। इसलिये
विषय की आस्था सच्छिष्य के माथे पर नहीं चढ़ पाती। गुरुवचन पर निष्ठा होने के कारण स्त्रीभोग की
आसक्ति मिथ्या हो जाती है। मूलतः यह आत्मा और आत्मी नहीं होती। मूल तत्व का अनुभव होते ही 'अखण्ड
ब्रह्मचर्य' की प्राप्ति होती है। इसी का नाम उत्तम 'नैष्ठिक ब्रह्मचर्य' है। इस अखण्ड ब्रह्मचर्य का बोध सद्गुरु
करते हैं। हे चक्रवर्त्ति राजा! अब 'अहिंसा' का रूप सुनो। स्वप्न में, सुषुप्तावस्था में अथवा जागृतावस्था में भी
प्राणिमात्र पर वक्रदृष्टि नहीं करनी चाहिए। देखो, कहीं पैर पटकने से पृथ्वी को कष्ट न हो इसलिये वह अपने
पैर बहुत आहिस्ते से रखता है। कहीं आकाश चौंक न पड़े इसलिये वह जोर से पुकारता नहीं है। अपने वचनों
से सबको सन्तोष प्रदान करता है। वाणी में मानों अमृत ही भरा है। उसकी वाणी जब आकाश में प्रवेश हो
करती है तो मानो उस शब्दानन्द चमत्कार से सारा आकाश आत्मसुख से भर जाता है। इस प्रकार उसका पूरा
भाषण आनन्दमय रहता है। पानी में छलांग लगाने से कहीं वह दब न जाय इसलिये तरंग के अनुसार पानी की
धार न कटे ऐसे हिसाब से वह जल में गोता लगाता है। ऐसे विचार से वह पानी में डुबकी लगाता है जिससे
पानी का ताप दूर हो जाता है और इस प्रकार स्नान करने से जीवन से जीवन का ताप कम होता है। कहीं वायु
को भी कष्ट न हो इसलिये वह श्वासोच्छ्वास भी जोर से नहीं लेता। उस पर नियन्त्रण रख कर ही शरीर को
चलाता है। जिस प्रकार अपने ही शरीर पर आघात करने के लिए वह कभी हाथ नहीं उठाता उसी प्रकार
तृतीय अध्याय ७९
प्राणिमात्र पर हाथ चलाने की बुद्धि उसके मन में उत्पन्न नहीं होती। कहीं घूर कर देखने से प्राणियों के मन में
भय न उत्पन्न हो इसलिये प्राणिमात्र को प्राणी समझ कर उनकी ओर, क्रूर दृष्टि से नहीं देखता। सारे केश कहीं
दब न जायें इसलिये वह कभी अपने शरीर को नहीं रगड़ता। इस प्रकार भूतहिंसा के भय से अपने देह के
देहपन का भी अहंकार नहीं करता। प्राणियों को जरा भी दुःख होने से प्राणियों में वास करने वाले परमात्मा को
दुःख होगा, ऐसा जिसका दृढ़ विश्वास होगा, उसके ही मन में अहिंसा का वास होता है। प्राणियों को कायिक,
वाचिक तथा मानसिक ये तीन प्रकार के दुःख होते हैं। वे जहाँ निःशेष होकर विलीन होते हैं वहीं अहिंसा का
वास होता है। हे राजाधिराज ! इसी का नाम शुद्ध अहिंसा है यह ध्यान में रखो। हे नृपवर्य ! अब 'द्वंद्व साम्य' की
दशा का वर्णन करता हूँ, ध्यान से सुनो। सुख और दुःख भाग्य के अधीन हैं और वह भाग्य पूरी तरह शरीर के
माथे लिखा है, यह सोच कर हम सद्गुरु के उपदेश के अनुसार निश्चिंत होकर रह जाते हैं। भाग्य के अनुसार
देह सुख-दुःख का भोग सहता रहता है। मूर्ख व्यक्ति उसमें हर्ष या विषाद का अनुभव करता है किन्तु शिष्य
गुरुपदेश में तल्लीन होने के कारण उसमें से किसी भी बात का स्पर्श अपने शरीर को नहीं होने देता। देह के
सुख से सुखी होने से दुःख भी अपना प्रभाव जमाता है। ये बातें गुरु ने समझायी रहती हैं इसलिये वह उनसे
मुक्त रहता है। निरभिमानी पुरुष को दुःख के संयोग से दुःख नहीं होता, उसी प्रकार सुखसंभोग में सुख का भी
अनुभव नहीं होता। दोनों ही बातों से वह अलिप्त रहता है। छाया धूप में गरम होती है तो वह छाया से ही
शीतल हो जाती है। उसी प्रकार एक बार मन में यह विश्वास होने पर कि सुख और दुःख दोनों ही मिथ्या हैं,
जो प्राप्त है उसी में आनन्द मालूम होने लगता है। देह में रहकर भाग्य के अनुसार आचरण करने पर सुख या
दुःख बाधक नहीं होता। यह अलौकिक रहस्य श्रद्धावान शिष्य को ही प्राप्त होता है। श्रद्धा के बिना यह रहस्य
कभी हाथ में नहीं आता और जब तक यह रहस्य हाथ नहीं लगता तब तक सुख-दुःख के प्रति समभाव उत्पन्न
नहीं होता। जब तक देह में 'अहंभाव' दृढ़ है तब तक द्वंद्व की पीड़ा अत्यन्त भयंकर होती है लेकिन जो
गुरुपदेश से निरभिमानी हो जाते हैं उनके लिये ये द्वंद्व मिथ्या हो जाते हैं, इसे ध्यान में रखो। जिस प्रकार स्वप्न
की दरिद्रता अथवा अमीरी जागृत होने पर मिथ्या हो जाती है, उसी प्रकार गुरुभक्तों को आत्मसाक्षात्कार के
कारण द्वंद्व बाधा की वार्त्ता भी नहीं सुनायी पड़ती। बच्चों के खेल में एकादशी और पारन जिस प्रकार समान है,
उसी प्रकार गुरुपदेश के साथ वे सारे द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। चन्दन के सुगन्ध से जिस प्रकार बेर और बबूल
भी चन्दन बन जाते हैं, उसी प्रकार गुरुवचन के अनुभव से सारे द्वंद्व आत्मस्वरूप में ही लीन हो जाते हैं। चन्दन
के आसपास के पेड़ केवल शुष्क काष्ट होते हुए भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के मस्तक पर धारण किये जाते हैं।
वह सब सत्संग की महिमा है। सद्गुरु यही सबसे बड़ा सत्संग है। उनकी संगत से शिष्य का परिवर्तन हो कर
वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है। इस प्रकार गुरुवचनों पर विश्वास करने से 'द्वंद्व साम्य' प्राप्त होता है, यह भी
गुरुवचन ही है।
सर्वत्रात्मेश्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम् ।
विविक्तचीरवसनं संतोषं येन केनचित् ॥ २५॥
सद्गुरु के वचन पर विश्वास रख वह यही मानता है कि चारों ओर परमात्मा ही भरा हुआ है और इसी
आत्मबुद्धि को निश्चय से दृढ़ कर मन में विचार करता है। (वह विचार इस प्रकार है) मुझमें परमात्मा का वास
है इसीलिये यह स्थूल शरीर हिलता-डुलता है, बोलता है। उसी के पूर्ण चित्प्रकाश से यह विश्व विश्वरूप
मालूम होता है। उसके ही आत्मप्रकाश से मेरी दृष्टि को दृश्य दिखायी देता है। दृश्य-द्रष्टा-दर्शन रूप से स्वयं
८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
परमात्मा ही सुशोभित है। जो भी दृश्य दृश्यरूप में प्रगट होता है उसके अन्दर-बाहर आत्मस्वरूप ही भरा रहता
है। इसी अनुवृत्ति से वह सारी सृष्टि को जगमगाते हुए देखता है। उस समय जो भी भूताकृति उसे दिखायी पड़ती
है वह सब परमात्मस्वरूप ही है ऐसा उसे अनुभव होता है। इतना ही नहीं बल्कि त्रिभुवन का नियंता मैं ही हूँ
ऐसा स्फुरण उसमें होने लगता है। वह सोचता है मेरे ही आदेश से संसार चल रहा है, कलिकाल का नियंता मैं
ही हूँ, उत्पत्ति, स्थिति और लय करने वाला मैं ही हूँ। यह मूल अहंता सहज ही उत्पन्न होती है। पूर्वान्वय से
देखने पर उसे सर्वत्र अपना ही स्वरूप दिखायी देने लगता है। तब दृश्य-दर्शन-द्रष्टा यह त्रिगुट नष्ट होकर
'अहंकार' पिघल जाता है। तब परब्रह्म से एकत्व स्थापित होकर चारों ओर सच्चिदानन्द भर जाता है। ऐसा
विशुद्ध अनुभव गुरुपदेश से सच्छिष्यों को प्राप्त होता है। उस समय यह सुनकर कि भगवान वैकुण्ठ में हैं, उसे
कुछ विचित्र-सा लगता है। भगवान क्षीरसागर में रहता है यह सुनकर उसे अपार हँसी आती है। सचमुच, ऐसी
तिल रखने की भी जगह नहीं है जहाँ भगवान न हों। ऐसे उस ईश्वर को किसी एक स्थान का कहना सच्छिष्य
को नहीं पटता। वैकुण्ठ और क्षीरसागर जिसके प्रकाश से प्रकाशित होते हैं वह परमात्मा वैकुण्ठवासी अथवा
क्षीराब्धिवासी है यह कहना स्पष्ट रूप से ईश्वरत्व को नकारना है। जब सर्वत्र ईश्वर का वास है वहाँ उसकी
एकदेशी महिमा का वर्णन करना उचित नहीं होगा। वह अनाश्रमी पूर्ण ब्रह्म है, वह वैकुण्ठादि आश्रम से कभी
भी बँध कर नहीं रह सकता। जो सब में अखण्ड भरा हुआ है उसे 'आवाहन', जो सबका अधिष्ठान है उसे
'आसन', जो सर्वव्यापी है उसके लिये सिंहासन की कल्पना करना, स्थान की कल्पना करना केवल कल्पना का
खेल है। लेकिन ऐसी कल्पना करनेवाली अपनी प्रवृत्ति भी ब्रह्मरूप है यह जो नित्य देखते हैं उनकी
परब्रह्मस्थिति कभी विचलित नहीं होती। यदि वास्तव में ऐसी परब्रह्मस्थिति प्राप्त करनी है तो साधक को द्वैत की
भावना त्याग कर प्रतिदिन एकान्त में बैठना चाहिये। परमार्थ की साधना करते समय साधक को अन्न और वस्त्र
की अड़चन हो तो उसे ऐसे वस्त्र लेने चाहिये जिसके लिये धन आवश्यक न हो, जिन्हें दूसरों ने त्याग दिया है
ऐसे फटे-पुराने वस्त्र भी चल सकते हैं। उसे साग-सब्जी, फल-फूल, कंद आदि भक्षण कर अपना पेट भरना
चाहिये लेकिन परमार्थसाधन छोड़कर अन्न-वस्त्र अथवा धन प्राप्त करने नहीं जाना चाहिये। भले ही हाथ में
झोली लेकर भिक्षा माँग ले लेकिन अन्न-वस्त्र के लिए जीवन खर्च नहीं करना चाहिये। ज्ञानी साधक कभी भी
अन्न अथवा आच्छादन के लिए प्रयास नहीं करते। देह भाग्य के अधीन है, भाग्य ही उसका सहज पालन करता
है। हम भले ही रात-दिन परिश्रम करें लेकिन यदि भाग्य में नहीं हैं तो हाथ में एक कौड़ी भी नहीं लगती। ज्ञानी
साधक यह बात जानते हैं। इसलिये भाग्य से जो भी मिल जाय उस पर अपना निर्वाह कर साधक सदा निश्चिंत
रहते हैं और प्रसन्नतापूर्वक, गुरुवचन के अनुसार परमार्थ साधते हैं। देह के भाग्य के अनुसार सुख-दुःख की
घटनायें होती रहती हैं, उसमें साधकों को सन्तोष प्राप्त होता है क्योंकि उन्हें गुरुवचनों का चस्का लगा रहता है।
शरीर को उसके भाग्य के अनुसार अन्न-वस्त्र मिलता रहता है लेकिन गुरुवाक्य का सुख छोड़कर मन कभी भी
शरीर की ममता के वश में नहीं रहता। याचना किये बिना यथासमय सहज ही जो कुछ प्राप्त हो जाय उसे उत्तम
मानकर वह गुरुवचन के अनुसार उसका सेवन करता है। शरीर निर्वाह के लिये वह किसी भी चीज की इच्छा
नहीं करता। जो कुछ मिलता है उसी में सुख मानकर वह आत्मानन्द में तृप्त रहता है। भाग्य के अनुसार सुख-
दुःख भोगते समय साधक के मन को संतोष ही होता रहता है। यह अनुभव उस शिष्य को गुरुवचनों पर विश्वास
रखने से ही प्राप्त होता है। यही विश्वास दृढ़तर होने के लिए गुरु के पास आग्रहपूर्वक बैठकर पूर्ण निश्चय के
साथ ज्ञानदायक भागवत शास्त्र का अध्ययन करना चाहिये।
तृतीय अध्याय ८१
श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापिहि।
मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २६ ॥
जिसमें भगवान के सगुण अथवा निर्गुण स्वरूप का वर्णन रहता है, अथवा जिसमें भगवान ने कुछ कहा
होता है अथवा जिसमें भगवद्गुणानुवाद का वर्णन रहता है, उसे हे राजा ! तुम 'भागवत शास्त्र' समझ लो।
साधक उसे प्राणों से भी प्रिय मानते हैं। उसमें भी विशेषरूप से ज्ञान के निरूपण से उन्हें विशेष प्रेम रहता है,
उन्हें वह बहुत अच्छा लगता है। गुरुमुख से सुना हुआ ज्ञान का निरूपण उन्हें अत्यन्त मधुर लगता है और इस
प्रकार श्रीभागवत पर उनकी दृढ़ श्रद्धा रहती है। उसके श्रवण से उनका मनोरथ पूर्ण होकर विषयों की इच्छा दब
जाती है। मन में विषय के प्रति रुचि न होने पर भी साधक के लिये विषय बाधक होते हैं और उससे उन्हें
अनुताप होता है। विषयावस्था अनिवार्य होने के कारण उसका त्याग नहीं हो पाता, इसलिये मुमुक्षु के मन को
अनुताप से अत्यन्त व्यथा होती है। वास्तव में विषय से अत्यन्त प्रेम न होते हुए भी स्वयं विषय का त्याग करना
सम्भव नहीं होता। ऐसे साधकों के लिए शास्त्रों ने कुछ नियम निर्धारित कर दिये हैं। विषय के प्रति आसक्ति
नहीं है फिर भी विषय से निवृत्ति भी नहीं हो पाती, ऐसी स्थिति साधकों की रहती है। उनके लिये शास्त्रों ने कुछ
नियम बनाये हैं। जो केवल विषयासक्त रहता है वह शास्त्र की बात कभी नहीं मानता अथवा जो जीवनमुक्त
हुआ रहता है वह भी शास्त्र की बात मान्य होते हुए भी उसे स्वीकार नहीं करता। जो मुक्त हैं वे विषय को
मृगजल की तरह मानते हैं। फिर वे मृगजलवत् विषय की निवृत्ति के लिये किस शास्त्र के नियमों का पालन
करें ? सारांश यही है कि जो अत्यधिक आसक्त रहते हैं उन पर तथा जो विशुद्ध विरक्त होते हैं उन पर भी शास्त्र
का कोई नियम लागू नहीं होता। केवल मुमुक्षु पर ही शास्त्र के नियम लागू होते हैं। गुरु शिष्य का संवाद होता है
उससे ज्ञानार्थ का बोध होता है, लेकिन उस बोध में विषयबाधा आड़े आती है। वह न आये इसके लिये शास्त्रों
के नियम प्रसिद्ध हैं। मानसिक, वाचिक तथा कायिक कर्म के अनुसार—विषयबाधा तीन प्रकार की होती है। उन
तीनों के लिये शास्त्रों ने तीन प्रकार के नियम बनाये हैं। मन के लिये 'शम' अर्थात् शान्ति का नियम, इन्द्रियों के
लिये 'दम' अर्थात् निग्रह का नियम तथा वाणी के लिये 'सत्य' का नियम इस प्रकार तीन नियम बनाये हैं।
विषय कामरूप हाथी 'अहं' के मद से उन्मत्त होकर यौवन के नशे में विधि का बन्धन तोड़ देता है। चाहे सुहृद
हो, राजा हो अथवा गुरु हो वह इन सबको झटक देता है। सूँड़ से स्वर्ग के शिखर को लपेट लेता है और
लबालब भरी हुई नरक की नदी में डुबकी लगाता है। यदाकदा धर्म के जल से उसे स्नान भी कराया जाय तो
वह लोभ की धूल अपने मस्तक पर डाल लेता है और ब्रह्मदेव सरीखे देवताओं को पछाड़ कर वह ममता की
गर्जना करता है। विवेकरूपी महावत ही उस समय उसके मस्तक पर चढ़ सकता है और शास्त्रविधि के अंकुश
से उस पर नियन्त्रण कर सकता है। उस पर वैराग्ययुक्त 'उपशम' का पहरा बिठा कर विवेकरूपी महावत उसे
'दम' के शृंखलाबन्ध से उसे काबू में लाता है और उसे सत्य के खम्भे से कसकर बाँध देता है। मानसिक,
वाचिक तथा कायिक कर्मों से विषयों की अत्यधिक बाधा होती है। उन तीनों के लिये तीन प्रकार के नियम
बनाये हैं। राजा ! उन नियमों का मर्म सुनो। 'शम' की स्थिति यह है कि वह विषय से आसक्ति हटा कर मन
बुद्धि आदि जो चित्तवृत्तियाँ हैं उन्हें परमार्थ की ओर मोड़ता है। पूर्व में सूर्य के उदय होते ही जिस प्रकार
अन्धकार त्रिभुवन को छोड़कर चला जाता है उसी प्रकार गुरुपदेश से 'शम' प्राप्त होते ही मन से अपने आप
विषय की निवृत्ति होती है। जब गुरुपदेश के अनुसार 'दम' बाह्य इन्द्रियों की प्रवृत्तियों को दबा देता है तो फिर
शम की संगति से इन्द्रियों के कर्मों की निवृत्ति होती है। कन्या का पालन-पोषण कर उसे दामाद को दान देने के
८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाद जिस प्रकार कन्या बाप के कुलगोत्र को छोड़ देती है उसी प्रकार दम की सहायता से इन्द्रिय विषय का त्याग
करते हैं। कहीं 'वाणी' बहकना न शुरू करे इसलिये उसे 'सत्य' की बेड़ी पहनाकर अत्यन्त शुद्ध और स्थिर कर
देते हैं। "जो सत्यवक्ता है उसे ब्रह्मादि देवता भी वन्दन करते हैं और असत्य बोलने वाले को अधोगति प्राप्त
होती है।" इस आशय का जो प्रतिपादन करते हैं, वे भी झूठ बोलते हैं। लेकिन रामनाम के बार-बार उच्चारण
करने से जो वाचा पवित्र हो जाती है, वह भविष्य में कभी भी कल्पांत में भी असत्य में नहीं डूबेगी। मथ कर
निकाला हुआ मक्खन पुनः मट्ठे में डालने पर भी वह उसमें नहीं डूबता उसी प्रकार नाम से वाणी पवित्र होने पर
असत्य कभी उसका स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार सूर्य के किरण लगते ही घी की कनी पिघलने लगती है उसी
प्रकार सत्य के निश्चय के सामने असत्य चौंधिया जाता है और समूल नष्ट हो जाता है। चन्दन वृक्ष के सात्रिध्य
से खैर और बैर के वृक्ष भी अपने सामान्य काष्टगुण से वंचित होकर चन्दनरूप हो जाते हैं उसी प्रकार नाम के
गजट से वाणी में निजसत्व प्रगट होता है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से जुगनू लुप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार
रामनाम के प्रभाव से असत्य का अपने आप लोप हो जाता है। अमावस्या के बाद प्रतिपदा को जब चन्द्रमा अँधेरे
को हटाकर प्रगट होता है तब प्रकाश का समूह संसार में प्रगट होता है। उसी प्रकार असत्य का प्रभाव होने के
कारण वाणी भी सत्य के संभ्रम से प्रगट होती है या जिस प्रकार राजा की आज्ञा से प्रजा भी अपने धर्मानुसार
आचरण करती है। सत्य से अच्छा कोई तप नहीं है, सत्य से अच्छा कोई मार्ग नहीं है क्योंकि सत्य से सद्रूप की
प्राप्ति होती है और सत्य से ही साधक निष्पाप हो जाते हैं। इस प्रकार काया, वाचा तथा मन से जो शम, दम और
सत्य इन तीन प्रकारों से नियमों का पालन करता है, उसके विषय तत्काल भाग जाते हैं। इस प्रकार का स्वार्थ
साधने के लिये अंतःकरण में भगवच्छास्त्र के प्रति रुचि रखनी चाहिये। लेकिन द्वेषभावना से दूसरे शास्त्रों की
निन्दा भी नहीं करनी चाहिये। एक की स्तुति और दूसरे की निन्दा करने से दोष लगता है। इसलिये साधक निन्दा
की राह पर नहीं चलते। अर्धांगी लक्ष्मी का वन्दन करें और पैर से गंगा निकली है इसलिये क्या उसकी निन्दा
करें ? अपनी माँ को नमस्कार करना तथा अन्य स्त्रियों को लतियाना क्या उचित है ? अपने आराध्य देवता का
भजन करना चाहिये किन्तु वह भी निन्दा और स्तुति इन दोनों को त्याग कर जो निजसत्य धारण कर मौन का
आश्रय लेता है वही ब्रह्मज्ञान का अधिकारी होता है। इतना प्रयास न कर, कष्ट न सहकर यदि एकनिष्ठा से
भगवद्भक्ति की जाय तां हरि भक्तों को अनायास ही मुक्ति प्राप्त होती है। हे राजा ! उस भक्ति का सच्चा स्वरूप
क्या है और हरिभक्त किस प्रकार सुलभ ढंग से परमपद प्राप्त करते हैं, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः।
जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम् ॥ २७॥
भक्ति का मुख्य साधन यह है कि श्रीहरि का दिव्य जन्म, दिव्य गुण तथा दिव्य कर्म आदि का पूर्ण श्रद्धा
से श्रवण किया जाय और आनन्दपूर्वक कीर्तन किया जाय। हरिकीर्तन के सामने अन्य सभी साधन बिलकुल
निम्न श्रेणी के हैं। हरि की लीलाएँ अत्यन्त महान और अद्भुत हैं। उनका गायन करने से मन को अत्यन्त प्रसन्नता
होती है। समुद्र में पाषाण तैराये, हाथ से गोवर्धन पर्वत उठाया, बिना किसी की नींद खराब किये मथुरा को
द्वारका ले आये। गुरु के मृत पुत्र को जीवित कर दिया, मुख से दावाग्नि निगल लिया, माँ के सन्तोष के लिये
कंस द्वारा मारे हुए उनके गर्भों को लाकर दिखलाया। अजन्मा होते हुए असंख्य जन्म लेने वाला, अकर्मा होते हुए
अद्भुत कर्म करने वाला तथा अगुणी होते हुए गुणों में विचरण करने वाला वह श्रीपति, उसके गुणकर्मों का वर्णन
तृतीय अध्याय ८३
करने से उसे अतीव सन्तोष प्राप्त होता है। मूलतः वह आनन्दघन है, तिस पर कीर्तन में उसकी गुण कर्म लीला
गाने से वह प्रसन्न होकर डोलने लगता है। इस प्रकार कीर्तन में हरि की कीर्ति गाने से चित्त की वृत्तियाँ निर्मल हो
जाती हैं और उस वृत्ति में ध्यान की मुद्रा स्थिर हो जाती है। राजा ! वह ध्यानस्थिति बताता हूँ, सुनो। मस्तक पर
मुकुट, कान में कुण्डल, कमर में मेखला (कमरबंद) तथा जरी का पीताम्बर पहना हुआ तथा गले में आपाद
वैजयंतीमाला, ऐसा वह मेघश्याम सुशोभित होता है। ऐसी वह मनोहर, सुन्दर, सगुण मूर्ति मनश्चक्षु के सामने
प्रगट हो जाती है, अथवा नामरूप गुण का त्याग कर निर्गुण स्वरूप अर्थात् परिपूर्ण ब्रह्म शुद्ध चैतन्य का
अंतःकरण में स्फुरण होने लगता है। ऐसी मूर्ति मन में स्थिर होते ही भक्त की बाह्य क्रिया कृष्णार्पण हो जाती है,
यहाँ तक कि स्त्रीपुत्र आदि भी पूरी तरह कृष्णार्पण हो जाते हैं।
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम्।
दारान्सुतान्गृहान्प्राणान्यत्परस्मै निवेदनम् ॥ २८ ॥
अग्निहोत्रादिक 'याग' और होम, ग्रहण आदि में किया हुआ उत्तम 'दान' तथा 'तप' अर्थात् वर्णाश्रम के
अनुसार यथोचित किया हुआ जो स्वधर्म है, वेद शास्त्रों के अनुसार किया हुआ आचरण, विधि विधान के
अनुसार गुरुदीक्षा लेकर प्राप्त किया हुआ शुद्ध मंत्र अथवा केवल भगवान के नाम के मंत्र का जाप आदि सब
अर्थात् यज्ञ, दान, धर्माचरण तप-दीक्षामंत्र अथवा नाम का जाप निर्विकल्प मन से कृष्णार्पण करना चाहिये। इस
प्रकार का आचरण कर जो अनन्य भाव से हरि की शरण में जाते हैं वे हरि के प्रेम के पात्र हो जाते हैं और जिस
प्रकार माँ अपने नन्हें बालक का पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार श्रीहरि उनका पालन-पोषण करता है।
इसलिये उदर निर्वाह के जो उद्योग हों उन्हें भी कृष्णार्पण ही करना चाहिये। जो भक्त ज्ञान से सम्पन्न होते हैं वे
कभी भी 'यह मेरा है' कहकर उसके प्रति मन में अहंकार नहीं धरते। मन में जिसके प्रति अत्यन्त रुचि रहती है,
जिसके प्रति अत्यन्त प्रेम रहता है, वह सब गुरुवचनों पर विश्वास कर कृष्णार्पण कर देते हैं और इसके लिए
आठों पहर अपना शरीर सेवा में खर्च करते हैं। क्षणभर के लिये भी वे विषयाकार व्यापार नहीं करते। अन्न के
लिए पागल होकर वे धनिकों के पैर नहीं छूते हैं। विषय की इच्छा से वे अपना जीवन कौड़ियों के भाव नहीं
बेचते हैं। लाखों रुपया खर्च करने पर भी जीवन का आधा हिस्सा भी प्राप्त नहीं होगा। ऐसे अमूल्य जीवन से
भक्त केवल परमार्थ अर्जित करता है और विषयों की राशि पर थूकता है। राजा भी राज्य का वैभव त्याग कर वन
में चले जाते हैं तथा विषयासक्ति त्याग कर परमार्थ की साधना करते हैं। पूर्ण भक्ति की महिमा का वर्णन किन
शब्दों में किया जाय ? सच्चा भक्त एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता, वह सारा जीवन ही कृष्णार्पण कर देता है।
उसी प्रकार पुत्र, स्त्री आदि जो भी कोई हों उन्हें तथा स्वयं को वह भगवत्सेवा के लिये अर्पण करता है।
पुत्रदारादिक 'मेरे' हैं ऐसी ममता वह मन में कभी नहीं पालता। स्त्री, पुत्र, अपनी काया, घर तथा प्राण आदि में
अंतर्बाह्य परमात्मा ही भरा हुआ है यह वह देखता है और बिना संकल्प के अर्थात् 'अर्पण करता हूँ' कहे बिना
ही सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है।
एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।
परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ २९ ॥
इस प्रकार जो स्त्री, गृह, देह तथा सम्पत्ति ये सब शुद्ध श्रद्धा से आत्मार्पण कर सदासर्वदा भजन करते हैं वे
ही भक्त श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय होते हैं। समस्त प्राणिमात्र के हृदय में वास करने वाला जो परमात्मा भगवान
८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीकृष्ण है उसे स्वहित साधने के लिये जो पूरी तरह भजता है, उसकी उस निर्गुण परमात्मा के प्रति जब तक
दृष्टि स्थिर नहीं होती, तब तक उसे सर्वात्मभावना से सगुण मूर्ति का ही हृदय में ध्यान-भजन करना चाहिये।
यदि ध्यान में सगुण मूर्ति भी ठीक तरह से न आ रही हो तो प्रतिमा का ही ध्यान भजन करना चाहिये। उपासक
लोग अपने घरों में जिसकी पूजा करते हैं, उन्हें 'चलमूर्ति' समझना चाहिये और द्वारकादि क्षेत्र की पुराणकाल से
प्रसिद्ध मूर्ति को 'अचलमूर्ति' समझना चाहिये। उन मूर्तियों से भी श्रेष्ठ स्थान 'ब्राह्मण' का है। वे पूरी तरह पूज्य
हैं। उनका सर्वकाल, सभी प्रकार से भजन करना चाहिये। उन ब्राह्मणों में भी सदाचार सम्पन्न 'श्रोत्रिय' अर्थात्
वेदों के जानकार ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उनसे भी श्रेष्ठ और पूज्य हैं वे जो वेद शास्त्रार्थ प्रवीण हैं। उनमें भी जो
'भागवत' अर्थात् भगवद्भक्त होने के साथ-साथ भागवत धर्म में तत्पर हैं, जो निष्काम भाव से भगवद्भक्ति करते
हैं तथा जिनकी श्रीकृष्ण पर पूर्ण श्रद्धा है, जिनका हृदयस्थ श्रीकृष्ण ही आत्मा, श्रीकृष्ण नाथ ही जिनका
अनन्यस्वामी हैं ऐसे जो पूर्ण भगवद्भक्त हैं वही वास्तव में भक्तों को पूज्य हैं। जिसके देवता, मानव और वेद
भी स्तुतिपाठक चारण होते हैं वह 'सद्गुरु' अत्यन्त महानता के कारण शिष्य को सभी प्रकार से, सब से अधिक
पूज्य हैं। गुरु और ब्रह्म इन दोनों को एकसमान कहा जाय तो वह भी कम ही होगा क्योंकि गुरुवचन से ही ब्रह्म
को ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। देवता के प्रति जैसी भावना रखते हैं वैसी ही सद्गुरु के प्रति रखनी चाहिये। गुरु में
और देवता में भिन्नत्वभाव होता ही नहीं है। इसलिये देवता की पूजा करने से गुरु को सन्तोष प्राप्त होता है और
गुरु की पूजा करने से देवता को सन्तोष होता है। नाम दो होने पर भी वे प्रसन्नतापूर्वक एक ही स्वरूप में रहते
हैं। सोना और कंगन ये दो नाम होते हुए भी सुवर्ण एक ही है। उसी प्रकार गुरु में और ब्रह्मा में भेदभाव नहीं
होता। उस सद्गुरु का भजन तन, मन, धन से निष्कपट भाव से करना चाहिये। अपने सर्वस्व के साथ श्रीगुरु के
चरणों में आत्मार्पण करना चाहिये। उसी प्रकार साधु और ज्ञानसम्पन्न श्रोता को भी सद्गुरु समान ही मानना
चाहिये। उनके साथ संवाद कर श्रवण और निरूपण करते रहना चाहिये।
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः।
मिथोरतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥ ३०॥
ऐसे लोगों के पास कथानुवाद करते हुए परस्पर निजात्मबोध होता है और उस गुह्यज्ञानसंवाद से परमानन्द
छलकने लगता है। इस प्रकार हरिकथा में रुचि के कारण परस्पर श्रद्धा उत्पन्न होती है और वे परस्पर सुखसंवाद
करते हुए आत्मसुख का माधुर्य चखते रहते हैं। आत्मसुख का माधुर्य एक बार चखने से दुःखों की राशियों का
विलय हो जाता है। इस प्रकार भक्ति साम्राज्य की पताका फहरा कर साधकों को स्वानन्द साम्राज्य का उपभोग
लेना चाहिये। सद्भाव से अभेद भजन करते समय भक्तों को स्वानंद की पूर्ण प्राप्ति होती है। हे राजा! उस
स्वानंद का वास्तविक लक्षण बताता हूँ, सुनो।
स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
भक्त्या संजातया भक्त्या विभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ ३१॥
क्वचिद्रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचित् हसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः।
नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वृताः॥ ३२॥
हरिकथा की महिमा को भक्तिभावना से पूछने वाले तथा बताने वाले इन दोनों को ही बहुत पुण्य प्राप्त
होता है पाप औषधि के लिये भी नहीं मिलता। जिसके नामस्मरण मात्र से ही सारे पातक नष्ट हो जाते हैं, वह
तृतीय अध्याय ८५
स्वयं अंतःकरण में प्रविष्ट होते ही फिर पातक को कहाँ ठौर मिलेगा ? साधन रूप भक्ति की युक्ति से सप्रेम
भक्ति उत्पन्न होती है। हे ज्ञानसम्पन्न चक्रवर्ति राजा ! उस भक्ति की स्थिति बताता हूँ, सुनो। सद्भाव से की हुई
अभेद भक्ति से जब हृदय में श्रीहरि प्रकट होते हैं उस समय देह के बाह्य चिह्न भी बदलने लगते हैं। जब परस्पर
आध्यात्मिक संवाद शुरू होता है, उस समय अन्तर में स्वरूप का बोध. होता है, नेत्रों में अश्रु जमा हो जाते हैं,
शरीर पर पसीना चुहचुहाने लगता है और प्राणों की गति कुंठित हो जाती है। चित्त चैतन्य की भेंट होते ही
आनन्द से कंठ भर आता है, शरीर पर रोमांच उभरने लगते हैं तथा दृष्टि अर्धोन्मीलित होकर स्तब्ध हो जाती है।
अच्युत का चिन्तन करने पर वह प्रेम से सिहर उठता है, वह जोर-जोर से रोने लगता है, सिसकियाँ लेकर बेचैन
हो उठता है। रोने के साथ-साथ उसे हर्ष भी होने लगता है। हर्ष के उस आवेग में वह जोर-जोर से हँसने भी
लगता है। वह कहने लगता है, आज तक मैं देहाहंकार के कारण मोह-मद से ग्रस्त था, अब गुरुकृपा के बोध से
मुक्त हो गया हूँ और यह कहते हुए वह परमानन्द से डोलने लगता है। 'मैं' और 'मेरा' इस सांसारिक भावना से
मैं स्वयं को ही भुला चुका था। सद्गुरुवचन ने स्वयं को मुझसे मिलाया इस आनन्द से वह उल्लसित होता है।
सद्गुरु का वचन कितना आकर्षक है। उसके कारण ही मैं आत्मसुख का भोग करता हूँ। इस आश्चर्य से वह
स्वानंद से डोलने लगता है। जाने कैसे संसार के भूतों का भय लग रहा था। लेकिन गुरु वचन ने उसे वास्तव में
नष्ट कर दिया और यह कह कर वह लोकलज्जा का विचार न कर नाचने भी लगता है। माँ को देखकर जिस
प्रकार बालक विविध प्रकार से नाचने लगता है, उसी प्रकार गुरुवाक्य की महिमा का विचार मन में लाकर
निजभक्त अपनी ही तान में नाचने लगता है। आत्मबोध प्राप्त होने के कारण वह नृत्य विनोद से भगवान के पद
प्रसन्नतापूर्वक स्वयंसफूर्त होकर गाने लगता है। उस गुणानुवाद कीर्ति के गजर से सारा त्रिभुवन प्रसन्नता से भर
जाता है। उस आनन्दोद्गार से सन्तुष्ट होकर परमानन्द का अतिरेक हो उठता है। गाना छोड़कर वह अब जोर-
जोर से चिल्लाने लगता है। 'मेरा गाना मैं ही सुनूँ, यहाँ दूसरा कोई है ही नहीं' ऐसा ही कुछ वह कहता रहता है।
गानेवाला भी मैं ही और सुनने वाला भी मैं ही, मेरा गाना भी सचमुच मैं ही। सारे संसार में एक अकेला मैं ही।
द्वैत होते हुए भी द्वैत की बात नहीं, ऐसी उसकी स्थिति रहती है। भक्तिभाव से भगवान की सेवा करते रहने से
कर्मक्रिया अपने आप रुक जाती है। 'अहं-सोहं' समाप्त होकर वृत्ति का लय होता है। इस प्रकार प्रेमयुक्त भक्ति
बढ़ने से साधक का साधन-श्रम नष्ट हो जाता है। सांसारिक भ्रम दूर हो जाता है और चारों वाणियों के साथ
इन्द्रियों को शान्ति प्राप्त होती है। जहाँ एक भी नहीं है और दूजा भी नहीं है, आगे भी कुछ नहीं है और पीछे भी
कुछ नहीं है, जहाँ सुख भी आत्मसुख में विलीन हो जाता है यही स्वरूप निश्चित रूप से निज शिष्य का होता
है। बालक का लाड-प्यार किस प्रकार करना है यह उसकी माता ही जानती है, उसी प्रकार शिष्य को पूर्ण बोध
कराने की कला केवल सद्गुरु को ही मालूम होती है। बच्चे को अलंकार पहनाकर सजाने का समाधान भोगना
जैसी केवल माँ ही जानती है, उसी प्रकार शिष्य के सुख से सुखी होना केवल सद्गुरु को ही मालूम होता है।
इन्द्रियों को जिसका स्थान मालूम नहीं होता, मन और वाणी के लिये भी जो अगोचर है, बुद्धि जिसकी मर्यादा
रेखा नहीं जानती, ऐसी निर्विकार है निजवस्तु। जो दृष्टी को दिखलायी जा सके अथवा हाथ में दी जा सके, वैसे
परमार्थ को दिखलाया या दिया नहीं जा सकता लेकिन सद्गुरु शिष्य को उसका भी बोध करा देते हैं। शिष्य को
प्रबोधन करने की दृष्टि से सद्गुरु विचित्र उपदेशक है। इसलिये शिष्य के सुख से गुरुराज इस स्वानन्द का भोग
करता है। शिष्य को जैसे-जैसे परब्रह्म की प्राप्ति होने लगती है, वैसे-वैसे उसका भ्रम दूर होने लगता है, इससे
सद्गुरु का सुखसंभ्रम भी बढ़ने लगता है। रणभूमि पर सेनापति शत्रु की सेना ध्वस्त करता है तो इधर राजा यश
८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
की पताका फहराता है, उसी प्रकार शिष्य के परमानन्द में डुबकी लगाते ही गुरु सुखसागर में तैरने लगता है।
शिष्य के प्रति ऐसी आतुरता जिस सद्गुरु में वास करती है, उसी के पास अनन्य श्रद्धा से पहले बताये हुए
भागवत धर्म सीखने चाहिये।
इति भागवतान् धर्मान् शिक्षन् भक्त्या तदुत्थया।
नारायणपरो मायामञ्जस्तरति दुस्तराम्॥ ३३॥
ऐसी भागवत धर्म की स्थिति है। सद्गुरु की शरण में जाकर भागवत धर्मोक्त भगवद्भक्ति का अभ्यास
करना चाहिये। इस भक्ति में माया की शक्ति बाधा नहीं डाल सकती। 'माया' को वेदशास्त्र के अध्ययन से
नियंत्रित नहीं किया जा सकता। ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी वह दुस्तर है। लेकिन भगवान की ओर जिनकी
लगन लग गयी है वे केवल हरिनाम के स्मरण से ही उसे पार कर लेते हैं। हरिनाम की गर्जना सुनकर माया
तत्काल भाग जाती है इसलिये इस उपाय से हरिभक्तों के सुख का पारावार नहीं रहता। हे राजा! यह माया
परात्पर नारायण की है। नारायण के चरणों का भजन करने से उसे सहज ही पार किया जा सकता है। भजन का
उपाय तुम्हें बताया। तुमने माया को पार करने का उपाय पूछा था, तो हे राजेश्वर! भगवद्भक्ति यही एक उपाय है
यह तुम निश्चित रूप से जान लो। भक्ति के पास सदैव तृप्ति रहती है, भक्ति के पास नित्य मुक्ति रहती है, भक्ति
के पास भगवत्प्राप्ति रहती है और हरिभजन से ही माया की निवृत्ति होती है। हरिनाम कीर्तन के गजर से माया
प्राण बचाकर भागती है, हरिभजन की शक्ति से सीधे सादे, भोले-भाले भक्त भी इस माया को पार कर लेते हैं।
जिस नारायण की भक्ति करने से निजभक्त सहज ही माया को पार कर जाते हैं, उस नारायण की मुख्य स्वरूप
स्थिति कैसी होती है, यह प्रश्न चक्रवर्ती जनकराजा ने उन नवयोगियों से पूछा।
राजोवाच
नारायणभिधानस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।
निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमा ॥ ३४ ॥
सभी भूतों के प्रति भगवद्भाव रखना यही माया को तरने का उपाय है यह सुनकर राजा को प्रसन्नता हुई।
उस आनन्द के आवेग में उसने परब्रह्म स्वरूप के बारे में पूछा। जिस नारायण की भक्ति करने से उत्तम भक्त
माया तर जाते हैं, उस नारायण का निजस्वरूप राजा ने बड़ी उत्कंठा से पूछा। 'ब्रह्म-परमात्मा-नारायण' एक ही
वस्तु का नाम है तो उस वस्तु की निजस्थिति कैसी रहती है इसका साद्योपांत वर्णन करने के लिये राजा ने कहा।
जो सारे संसार का अधिष्ठान है, अंतर्बाह्य जिसकी पूर्ण व्याप्ति है उसे वेदज्ञ 'नारायण' के नाम से पुकारते हैं।
सौभाग्य से ही मुझे आप जैसे ज्ञाननिधि प्राप्त हुए हैं। आपके वचनामृत के बोध से मेरी अहंभूमि गल गयी।
आपके भाषण से मेरी स्वानन्द स्फूर्ति उफन कर बाहर आ गयी। चित्तवृत्ति तो इतनी पुलकित हो उठी है कि
कितना भी भाषण करो मन तृप्त नहीं होता। राजा का यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर प्रबुद्ध का छोटा भाई
पिप्पलायन प्रसन्नता से बोलने के लिये आगे बढ़ा।
पिप्पलायन उवाच
स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सद् बहिश्च।
देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र ॥ ३५ ॥
तृतीय अध्याय ८७
(पिप्पलायन ने कहा) अरे ! जिसके कारण विश्व की उत्पत्ति होती है, जिसके कारण सुरक्षा होती है
जिसके कारण प्रलयकाल को प्रलयशक्ति प्राप्त होती है ऐसे त्रैलोक्य की तीनों अवस्थाओं के लिये जो कारणीभूत
है, जगतका जो मूल उद्देश्य है, लेकिन जो स्वयं हेतुरहित तथा सदासर्वदा सच्चिदानंद से परिपूर्ण होता है, वही
'नारायण' है यह जान लो। प्रातःकाल, सायंकाल तथा दोपहर इन तीनों समय में जिस प्रकार गगन अलिप्त रहता
है उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लयावस्था में भी परमात्मा नारायण अलिप्त रहता है। तुम कहोगे कि उत्पत्ति-
स्थिति तथा प्रलय को कौन देखता है तो उसके स्पष्टीकरण के लिये दृष्टांत सुनो। जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन
तीनों को ही व्याप कर समाधि के पार भी जिसकी व्याप्ति है, जो उनका साक्षी है वही निश्चित रूप से नारायण
है यह जान लो। जागृति का ज्ञान, स्वप्न का मिथ्या भान तथा सुषुप्ति का जो पूर्ण साक्षी है वह शुद्ध चैतन्य ही
वास्तव में नारायण है। इस प्रकार परज्योति परमात्मा जो त्रिभुवन के सभी जीवों के हृदय में वास करता है, उसे
ही हे राजवर्य! निश्चित रूप से 'नारायण' कहते हैं यह ध्यान में रखो। इस प्रकार यदि ब्रह्मस्वरूप का वर्णन
किया जाय तो लगेगा कि ब्रह्म प्राप्ति अगम्य है। इसलिये जिससे सहज ही ब्रह्म की प्राप्ति हो सके ऐसा उपाय
बताता हूँ, सुनो। परमात्मा पूर्ण रूप से तुम्हारे ही हृदय में वास करता है, उसके ही कारण मन, बुद्धि और इन्द्रियों
का चलन होता है। उसके ही तेज से आँखें देख पाती हैं, उसके ही स्वाद से रसना में रस के प्रति रुचि जगती है,
उसके ही अवधान से कानों को शब्द ज्ञान का बोध होता है, उसके ही कारण अहंकार अहंभाव धारण कर पाता
है, मन मनन कर सकता है, उसके ही कारण चित्त चिंतन कर सकता है, बुद्धि को उसकी ही ब्रह्मज्ञान शक्ति से
बोद्धव्य प्राप्त होता है। उसके ही कारण जड़ देह सचेतन होता है, उसके ही कारण त्वचा को शीत-उष्ण तथा
मृत्यु और कठोर का भेद मालूम होता है, पैरों का चलना और हाथ का देना भी उसके ही आदेश से सम्भव होता
है। उसके ही कारण प्राण की श्वसन क्रिया तथा आँखों का खुलना और बन्द होना होता है। उसके ही आनन्द से
प्राणी जननेन्द्रियों का आनन्द भोगते हैं। इस प्रकार जो त्रिभुवन को चलाता है, जो स्वानंद से हृदय में वास करता
है, उसे ही 'नारायण' कहते हैं। वास्तव में 'परमात्मा' वही है। अब जिसके योग से मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रिय
विचरण करते हैं वह उनके अधीन है ऐसा यदि तुम कहोगे तो वह कल्पांत में भी सम्भव नहीं होगा। अब उस
स्वरूप का ज्ञाता बनकर उसे जानना चाहोगे तो वह सम्भव नहीं होगा क्योंकि ज्ञानी बनकर अर्थात् मैं ज्ञाता हूँ
और वह ज्ञेय है इस ज्ञान से बुद्धि का कभी आत्मस्वरूप में प्रवेश नहीं होता। ज्ञान अथवा ज्ञानाभाव इन दोनों को
छोड़ कर जब केवल सद्भाव उत्पन्न होगा, तभी परब्रह्म की अपने आप प्राप्ति होगी।
नैतन्मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः ।
शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूलमर्थोक्तमाहयदृते न निषेधसिद्धिः ॥ ३६ ॥
वैकुंठ, कैलाश, क्षीराब्धि, आदि की मन कल्पना कर सकता है, लेकिन आत्मा की वास्तविक कल्पना
करने का मनबुद्धि आदि को सामर्थ्य नहीं होता। जो मन स्वयं त्रिभुवन की कल्पना कर सकता है वह मन
आत्मस्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकता। बुद्धि भी पूर्णरूप से निश्चयात्मक है किन्तु उसके लिए भी परब्रह्म दुरूह
है। जो मन, बुद्धि के लिये अगोचर है, जो वाणी के लिये भी दुस्तर है ऐसा वह परात्पर परब्रह्म शब्दों के लिये
कभी भी गोचर होना सम्भव नहीं है। आकाश को गठरी में बाँधना चाहो तो चारों छोर खाली रह जाते हैं उसी
प्रकार शब्दों से परब्रह्म को समझाने का प्रयास करो तो शब्दार्थ का धर्म ही नष्ट हो जाता है। प्राण की गति से
जिस क्रिया शक्ति का चलन होता है उस क्रिया को भी जब परब्रह्म का आकलन नहीं होता तो इन्द्रियों को कैसे
८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हो पायेगा ? जिस प्रकार जलाशय में प्रतिबिम्बित होने पर भी सूर्य गीला नहीं होता, उसी प्रकार मन, बुद्धि और
इन्द्रियों के परे वह परमात्मा है, यह निश्चित रूप से ध्यान में रखो। मन का जो अनादि मन है, बुद्धि की जो
सज्ञान बुद्धि है, नेत्रों का जो आद्य नेत्र है, कान को भी जो ध्यानपूर्वक सुनने वाला कान है, नाक की जो मूल
नाक है, जो जिह्वा की भी जिह्वा है, जो त्वचा की अंतर्त्वचा है, जो जीवों का जीव है, जो इन्द्रियों का प्रकाशक
है, कर्म करते हुए भी जो अकर्ता है वह कभी भी इन्द्रियार्थ इन्द्रियों में विषय नहीं हो सकता। जहाँ बुद्धि की
दृष्टि नहीं पहुँच पाती वहाँ मन का मनपन कैसे प्रवेश कर पायेगा ? फिर श्रवण, नयन, घ्राण आदि के संयोग से
वह कैसे प्राप्त हो सकेगा ? जिसके पास प्राणों की शक्ति भी नहीं पहुँच पाती, वहाँ वाणी कैसे पहुँच पायेगी ?
वह लज्जा से मुड़ कर अपने आप लौट जाती है। फिर उसके आगे कर्मेन्द्रियों की क्या प्रतिष्ठा होगी ? अग्नि से
क्षण प्रति क्षण ज्वाला तथा चिनगारियाँ निकलती रहती हैं किन्तु उनसे अग्नि का पूर्ण स्वरूप प्रगट नहीं होता।
सूर्य से असंख्य सूर्यकान्त चमकते रहते हैं लेकिन उनमें सूर्य प्रकट नहीं होता। उसी प्रकार ब्रह्मा से अनेक
इन्द्रिय व्यक्त होते हैं लेकिन उन इन्द्रियों की ब्रह्मा से जान-पहचान कभी भी और किसी भी तरह होना सम्भव
नहीं है। यदि केले के फल से केला उत्पन्न हो सके या शक्कर से ईंख उत्पन्न हो तभी इन्द्रिय ब्रह्मा को जान
पायेंगे लेकिन वह ब्रह्मादिकों के लिये भी साध्य नहीं है। यदि इन्द्रियों को ब्रह्मज्ञान नहीं हो पाता तो जीवों का
बन्धन कभी नहीं टूटेगा इसलिये जन्ममरण से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। 'शब्दादेवापरोक्षेति' ऐसी श्रुतिशास्त्रों की
मान्यता है लेकिन वह भी झूठ ही लगता है ऐसा तुम कहोगे। तो हे राजा ! शब्द स्वयं लय हो जाता है और जीव
को ब्रह्मज्ञान देता है। इसके सम्बन्ध में जो निरूपण सुना रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो। वेदों ने तो बाजी लगाकर
जीव को संसारबन्धन से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है लेकिन सभी शास्त्रों की छानबीन करने के बाद लगता
है कि उन्होंने भी हाथ टेक दिये हैं। श्रुति ने 'नेति नेति' कह कर अनात्म पदार्थों का निषेध किया और एक
प्रकार से आत्मस्वरूप की पहचान बतायी लेकिन आत्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप वेद भी नहीं बता पाये। शब्द से जो
निःशब्द का ज्ञान कराता है वही 'परब्रह्म' है ऐसा समझना चाहिये। यह पहचान जिसकी समझ में आती है, वह
स्वयं सहज ही ब्रह्मरूप हो जाता है। श्रुति 'नेति नेति' अर्थात् 'यह नहीं, यह नहीं' कह कर निषेधरूपी वचनों से
परब्रह्म का दर्शन कराता है। इस श्रुतिशब्द की सहायता से जो निःशब्द परब्रह्म को जान सकता है वही परब्रह्म
तक पहुँचता है। शब्द अपने निषेध से जिसका ज्ञान कराता है, उस तत्त्व में जिसकी बुद्धि समरस होती है, वही
तत्त्व निश्चित रूप से परब्रह्म है। आखिर निषेध की मर्यादा भी वही है। शब्द अपनी सारी शक्ति से जीव को
ब्रह्म की प्राप्ति करा देता है। 'शब्दादेवा परोक्षेते' अर्थात् 'शब्दों से ही अपरोक्ष ज्ञान' जिसे कहते हैं, वह यही है।
जहाँ वाणी पूरी तरह कुंठित हो जाती है, जहाँ मन और बुद्धि नहीं पहुँच पाती वही निषेध की सीमा है। उसी
को 'परब्रह्म' कहते हैं। जो वाणी को सवाक बनाता है किन्तु वाणी जिसे नहीं कह पाती जो मन और बुद्धि
वालों को जानता है लेकिन मन बुद्धि जिसे नहीं जानती, जो नेत्रों को रूप आदि दिखाता है लेकिन जिसे नेत्र
नहीं देखते जो श्रवण और घ्राण इन दोनों को सुनने की और घ्राण लेने की शक्ति देता है जिसे जानने के लिये
दूसरा कोई नहीं है ऐसे जो 'स्वसंवेद्य' अर्थात् स्वयं ही अपने को जानने वाले हैं, जिसे जानने वाला अन्य कोई
नहीं है। वहाँ शब्द को प्रवेश करने के लिये अवकाश ही कहाँ है ? जो कृश भी नहीं है और विपुल भी नहीं है,
जो सीधे भी नहीं है और वक्र भी नहीं है, जो सूक्ष्म भी नहीं है और स्थूल भी नहीं है ऐसी जो निर्विकार वस्तु
है जिसमें न रूप है न गुण है, जिसे न आश्रम है न वर्ण है, जिसमें 'मैं' पना नहीं है और 'दूजा' पन भी नहीं है,
उसी प्रकार जिसे जन्म और मरण नहीं है, जो न हलका है न भारी है, जो न दुबला पतला है न पुष्ट ही है, जो
न बसा हुआ है और न उजाड़ ही है, जो निःशेष निर्धर्म है, जो न छोटा है न लम्बा है, जो न वरिष्ठ है और न
कनिष्ठ है, जिसका विवेक से विचार करने पर विवेक भी सिकुड़ जाता है, जिसका न आदि है न अन्त है
जिसकी मध्यस्थिति भी नहीं है गुणयुक्त नहीं है और गुणातीत भी नहीं है, जो अद्वय भाव से अच्युत और अनन्त
है, उस स्वरूप का शब्दों में वर्णन करने का प्रयास वेदों ने किया, श्रुतियों ने भी बहुत हो-हल्ला किया किन्तु
बड़े कष्ट से 'नेति-नेति' कहने के कारण उन्हें लज्जा से गर्दन झुकानी पड़ गयी। तो क्या वेद उस स्वरूप को
बिना जाने ही लौट गये ? ऐसी बात नहीं है। उसने उसे जान लिया लेकिन वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सका
इसलिए वह मौन धारण कर बैठ गया और निःशब्द होकर तटस्थ रह गया। इस प्रकार वेदों ने मौन धारण कर
लेने के बाद सभी छः शास्त्र सकते में आ गये। वे अपने-अपने मत के अभिमान के कारण वितंडावाद में. उलझ
गये। शब्दवृत्ति जब शान्त हो जाती है, तभी ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, इस बात का वेदों को पूरा विश्वास हो गया
इसीलिये उन्होंने शब्दों से शब्दों का निषेध कर हमेशा के लिये मौन धारण कर लिया। वेदराज के मौन धारण
करते ही बेचारे शास्त्र इधर-उधर भागने लगे। शब्दों का जंगल ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उन्हें सच्चा समाधान नहीं ही मिला।
कल्पना का विराम होते ही जिन्हें ब्रह्म की प्राप्ति होती है उन्हें षड्दर्शन में मेल दिखायी देने लगता है, शास्त्रों
को अपने आप समझ आ जाती है और सारा त्रिभुवन एकरूप दिखायी देने लगता है। 'ब्रह्म' एक ही एक है
तथा अद्वय है, ऐसा सिद्धान्त आपही ने प्रतिपादित किया था तो फिर त्रिभुवन में जो एकता दिखायी देने लगी वह
किसको ? ऐसा हे राजा ! तुम कहोगे। तो तुम्हें बताता हूँ कि जिसकी वासना की गाँठ टूट गयी, अहंकार की गाँठ
खुल गयी, भाग्य केवल शरीर तक ही सीमित रह गया उनको ही यह सृष्टि ऐक्यरूप से भासित होने लगी। उस
अनुभव का किस्सा सुनाते समय उल्हास मालूम हुआ और स्वानन्द से सन्तुष्ट होकर पिप्पलायन मुनि
ब्रह्मैक्यरूप से सृष्टि की प्रशंसा करने लगे।
सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम्।
ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब्रह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत्॥३७॥
ब्रह्म और आत्मा एक है इस अनुभव से प्रपंच भी ब्रह्मरूप ही दिखायी देने लगता है। जिस प्रकार आकाश
में नीलापन का आभास होता है उसी प्रकार ब्रह्म में भी माया विचरती रहती है। उसकी करनी बड़ी अद्भुत है।
उसने नपुंसक में भी पुरुषत्व उत्पन्न किया। उसका पतिव्रता धर्म भी बड़ा विचित्र है। उसने नपुंसक में काम
उत्पन्न किया अनात्मा का नामकरण किया और उसके ही कारण निष्कर्म में कर्म उत्पन्न हुआ। वह निःसंग की
संगति में ही रममाण हुई और बिना शरीर का स्पर्श किये उसे गर्भ ठहर गया। प्रधान और महत्तत्त्व से उसे गर्भ
ठहरा और उसने विकारयुक्त त्रिगुणों को जन्म दिया। उस विचित्र स्त्री ने ज्ञानाज्ञानरूपी गाँव में वास कर अपनी
विद्या और अविद्या-स्वभाव के अनुसार शिव-भेद उस पुरुष को भोगने के लिये बाध्य किया। जिस प्रकार
सुवर्ण में अलंकार, तंतू में वस्त्राकार अथवा दीवार पर चित्र का आभास होता है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया का
साकार आभास होता है। मिट्टी के गोकुल बनाये, उनकी भिन्न-भिन्न नामों से पूजा की लेकिन उनमें की मिट्टी
एक ही होती है उसी प्रकार ब्रह्म में जगद्रूप से माया का आभास होता है। घी के कण जिस प्रकार घी से भिन्न
नहीं होते, उसी प्रकार ब्रह्म में भी माया अनेक प्रकार दिखाती है। मूल रूप से ब्रह्म तो अकेला है, वह अनेक
कैसे हुआ ? तो वह माया की संगति का प्रभाव है ऐसा स्पष्टीकरण पिप्पलायन ने दिया। ब्रह्म मूलतः ओंकार रूप
है, वही अकार-उकार-मकार इस प्रकार तीन रूपों में प्रगट हुआ। सत्त्वादि तीन गुणात्मक विकार उसी के हैं।
९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीनों गुण समान होने पर उसे 'प्रधान' कहते हैं। वही क्रिया शक्तिसूत्र है। उसमें जब ज्ञान उत्पन्न होता है तो उसी
को 'महत्तत्त्व' कहते हैं। अहंब्रह्मं यह जो पूर्णस्फूर्ति है, उसमें का 'अहं' ही देहाकृति में आया। उस देहाभिमान
के कारण ही परब्रह्म को 'जीव' कहते हैं। 'क्रिया' का अर्थ है दस इन्द्रिय उनके अधिष्ठातृ देवताओं को 'ज्ञान'
कहते हैं। विषय को 'अर्थ' और सुख-दुःख को 'फल' कहते हैं। तीन गुण, पंचभूत, पाँच विषय, दस इन्द्रिय,
उनकी सहायता से सुख-दुःख भोगने वाला जीव और ज्ञान, क्रिया, कर्माचरण इन सबको भी पूर्णब्रह्म समझना
चाहिये। चीनी का कटहल बनाओ तो भी उसके काँटे, छिलका, गुठली आदि शुद्ध शक्कर ही होती है, उसी
प्रकार जगत के रूप में सारा ब्रह्म ही है। कपड़े की गुड़िया बनायी, उसमें भिन्न-भिन्न अवयव बनाये फिर भी
उसमें एक जैसा सूत ही होता है, उसी प्रकार जो अविकृत ब्रह्म है, वही जगत के आकार में दिखायी देता है।
जगत, विश्व, प्रपंच ये नाम अलग-अलग होने पर भी वह सारा शुद्ध परब्रह्म ही है। उपनिषद का प्रमुख तत्त्व
यही है और वेदांत का परम परमार्थ यही है। अब संसार के रूप में परब्रह्म फैला हुआ है और संसार तो
विकारयुक्त है तो कोई ब्रह्म को भी विकारयुक्त कहेगा। लेकिन हे राजा! ऐसा कभी नहीं होगा।
नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि।
सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत्॥ ३८॥
ब्रह्मा को माता-पिता नहीं है इसलिये उसे जन्म नहीं है। आत्मा यदि एकदेशी होता तो उसने माता के गर्भ-
में जन्म लिया होता। आत्मा के सिवा संसार में तिलमात्र के लिये भी जगह नहीं है। वह इतना परिपूर्ण है
इसीलिये उसे जन्म का स्पर्श नहीं है। जन्म से पूर्व बालक का अस्तित्व नहीं होता, जन्म लेने पर उसका अस्तित्व
मानते हैं लेकिन यह आस्ति-नास्ति की भाषा आत्मा के पास नहीं है। अब है, पहले नहीं था, इस प्रकार का
'आस्तिक्य' आत्मा में कभी प्रवेश नहीं करता। वह नित्य, निरन्तर ऐसा ही है। देहरूप से जन्म लेनेवाले बालक
का दिन-प्रतिदिन विकास होता दिखायी देता है, उस प्रकार का बालजन्म आत्मा का न होने के कारण उसकी
'वृद्धि' अर्थात् विकास नहीं होता। जिसमें वृद्धि नहीं होती उसके स्वरूप में कभी भी 'विपरिणाम' अर्थात्
परिवर्तन नहीं होता। उसमें बाल, युवा और वार्धक्य ये अवस्थायें कभी भी नहीं होतीं। मैं बाल्यावस्था में छोटा
था, युवावस्था में बड़ा हो गया और हाय, अब मैं वृद्ध हो गया हूँ। ये तीन अवस्थाएँ देखने वाला अर्थात् जानने
वाला परमात्मा है। साक्षी अथवा देखने वाला उन अवस्थाओं से परे होता है, वह कभी अवस्थाभूत नहीं होता।
ऐसा वह परमात्मा सचमुच देह में होते हुए भी अवस्थारहित अथवा देहातीत होता है। आत्मा अवस्थाशून्य,
अविकारी तथा पूर्ण है। उसमें कभी भी क्षीणता नहीं आती। उसी प्रकार जिसे 'जन्म' ही नहीं है उसे 'मरण' कैसे
आयेगा? तुम कहोगे कि ऐसी आत्मा है कौन? तो यह जान लो कि वह सर्वज्ञ है और केवल 'ज्ञानस्वरूप' है।
अब तुम कहोगे कि ज्ञान भी क्षणिक है, घटज्ञान से परज्ञान नष्ट होता है, लेकिन ऐसी बात नहीं है। उस विषय
को जानने वाली इन्द्रिय वृत्ति ही नष्ट हो जाती है, ज्ञान वैसा का वैसा अविनाशी ही होता है। इसका उदाहरण यह
है कि जिस प्रकार प्राण देह की वृद्धि करता है लेकिन केवल देह ही बाल, युवा आदि अवस्थाओं के अधीन
होता है, प्राण अवस्थारहित होता है इसीलिये वह जैसा का तैसा रहता है। प्राण देह का चालक है, उसे देहावस्था
की बाधा नहीं होती और आत्मा तो प्राण को भी चैतन्य प्रदान करता है। इसलिये उसमें देहावस्था सम्भव नहीं है।
इसी उदाहरण से परब्रह्म का निर्विकार स्वरूप समझना चाहिये। आत्मा देह की इन्द्रियों से बिलकुल अलग है,
यह अगले श्लोक में स्पष्ट किया गया है।
तृतीय अध्याय ९१
अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्चितेषु प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र ।
सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ ३९ ॥
अंडज, स्वेदज, जारज और चौथा, अन्द्रिज, इनमें आत्मा की संगति से प्राण सहज सर्वकाल रहता है। प्राण
के साथ आत्मा रहने से उसे 'जीव' कहते हैं। जब उस प्राण को देहावस्था की बाधा नहीं होती तो फिर जीव के
माथे पर वे कैसे सवार होंगी ? देहेन्द्रियों में विचरण करते हुए भी आत्मा देहावस्था से अलिप्त रहता है। वह
किस तरह अलिप्त रहता है इसे उदाहरण देकर समझाता हूँ। आत्मा जब सविकार देह में रहता है तो उसे
सविकार मानते हैं। वही देहेन्द्रियों को छोड़कर पूर्वस्मृति से स्वप्न में भी रहता है। देहेन्द्रिय के बिना रहने वाले
लिंगदेह में आत्मा जागृत अवस्था के अभिमान संकल्प से स्वप्न भी देखता है। जब वह स्वप्न भी शान्त हो जाता
है और देहाभिमान का लय हो जाता है तो सुषुप्तावस्था में जो विकारशून्य पूर्ण परमात्मा है वही शेष रहता है।
देहेन्द्रियों के साथ जब अभिमान भी लीन हो जाता है तो स्फुरण का स्फुरण नहीं होता। जब सारा शून्य ही हो
गया तो फिर चिद्धन (ज्ञानमय) आत्मा भी नहीं है, ऐसा तुम कहोगे। उसका उत्तर देता हूँ—सुषुप्ति में यदि
आत्मा न होता तो 'मैं सुख से सोया हुआ था' इसका स्मरण कैसे हुआ होता ? अर्थात् यह जहाँ जागता है उसे
'शून्य' कभी नहीं कहा जा सकता। जो मैं जागृति में 'जानने वाला' वही मैं स्वप्न देखने वाला और वही मैं
सुषुप्ति में सुख भोगने वाला है। इस प्रकार वह तीनों अवस्थाओं में साक्षी होता है। ऐसी तीन अवस्थाओं में जो
पूर्ण साक्षीरूप से विचरण करता है वह कभी भी शून्य नहीं है। हे राजा ! वही परिपूर्ण परमात्मा है और वह शुद्ध
चिद्धनस्वरूप है। अब जब सुषुप्ति में ब्रह्मानुभव होता है तो फिर संसार का आभास क्यों होता है ऐसा तुम पूछोगे
तो उस अवस्था में अहंकार अविद्या में लीन रहता है। (उसका विनाश नहीं हुआ रहता) इसलिये संसारभ्रम
उत्पन्न होता है। वह अविद्या जब अहंकार के साथ नष्ट होती है, उस समय जगद्रूप से ब्रह्म का ही आभास होने
लगता है और जन्म-मरण का ठिकाना ही नष्ट होकर जीव परब्रह्म के साथ ऐक्य प्राप्त करता है। फिर वहाँ हेतु,
दृष्टांत, प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता इन सबसे रहित एक परब्रह्म परमात्मा ही सदैव परमानन्दस्वरूप में रहता है। उस
अवस्था में सुख पर सुख की तरंगें मचलने लगती हैं आनन्द ही आनन्द का उपभोग लेता है, स्वानंदानुभव से
परिपूर्ण होने के कारण सारा जगत परमानन्द से भर जाता है। हे राजा ! इस माया का विलय होकर इस प्रकार का
अनुभव कब होगा ऐसा यदि तुम पूछोगे तो मैं यही कहूँगा कि निष्काम भावना से उस यदुवर्य श्रीकृष्ण का भजन
करना चाहिये।
यह्र्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या चेतोमलानि विधमेदगुणकर्मजानि।
तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं साक्षाद् यथामलदृशोः सवितुप्रकाशः ॥ ४० ॥
यदि मन में निर्विकार स्वरूप की प्राप्ति की इच्छा हो तो उत्कट प्रेम से अविश्रांत भगवद्भक्ति करनी
चाहिये। पुत्र और वित्त की बात छोड़ कर लौकिक की लज्जा त्याग कर भगवद्भजन की चाह से निर्लज्ज होकर
नाचना चाहिये। इन तीनों की आसक्ति त्याग कर श्रीहरिचरण का भजन करते रहने से चित्त का मल क्षण
प्रतिक्षण नष्ट होने लगता है। कर्म से उत्पन्न होने वाले जो रजतम्रादि दोष चित्त में बस्ती बनाकर बैठ जाते हैं। वे
सब भक्तिप्रेम रूपी जल से धुल जाते हैं। सप्रेम भक्ति जैसे-जैसे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे विरक्ति चरणों के पास
आ जाती है, इससे विषयासक्ति अपने आप कम होकर चित्तवृत्ति निर्मल हो जाती है। चित्तवृत्ति जब निर्मल हो
जाती है तो वह सारे भूतों में परमात्मा को अनन्य प्रीति से भजने लगता है। यह ज्ञानोत्तर चौथी भक्ति अत्यन्त श्रेष्ठ
९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। यह भक्ति अत्यन्त उदार रहती है, वह भक्त का अहंकार नष्ट कर डालती है, वह देवतागण, मानव, स्त्रियों,
शूद्र इन सबका उद्धार कर जीव को आनन्दित करती है। यह भक्ति जब बढ़ती है तो भवभय की निःशेष शान्ति
होती है। चारों मुक्ति चरणों के पास आ जाती हैं। हरि की भक्ति अत्यन्त उदार है। आँखों में जब कचरा आ जाता
है तो सूर्य बिम्ब उसे नहीं दिखायी देता फिर अन्य सारे पदार्थ कैसे दिखाई देंगे ? कचरा निकल जाने पर दृष्टि
निर्मल हो जाती है, सूर्यमण्डल के साथ-साथ अन्य पदार्थ भी साफ-साफ दिखायी देने लगते हैं। उसी प्रकार
परमात्मा हृदय में रहता अवश्य है लेकिन जब तक चित्तवृत्ति मलिन रहती है तब तक उस परब्रह्म का प्रकाश
नहीं होता क्योंकि चित्त वासना के दोष से दूषित हुआ रहता है। इसलिये भगवद्भक्ति करने से ही चित्तवृत्ति
निर्मल होती है और ऐसे भजनों से ही भक्त निर्विकार स्वरूप तक पहुँचते हैं। परमप्राप्ति के लिये संसार में एक
भगवद्भक्ति ही समर्थ है। हे नृपवर्य ! मैंने तुमसे उसका यथार्थ वर्णन किया है। आँखों का पटल हटते ही जिस
प्रकार प्रकाश के साथ सूर्य दिखायी देता है, उसी प्रकार कल्पना नष्ट होते ही निश्चित रूप से परब्रह्म भी प्रकट
होता है। मन जब निश्चयपूर्वक निर्विकल्प साम्यावस्था में पहुँचता है, तब देह में विचरण करते हुए भी
भवबन्धन उसे स्पर्श नहीं करता, यह बात निश्चित रूप से जान लो। इस प्रकार पिप्पलायन ने अत्यन्त
आनन्दपूर्वक, गर्जना करते हुए भाषण दिया। तब राजा को मनःपूर्वक सन्तोष हुआ और अनुभव का लक्षण
मालूम हुआ। इस प्रकार ब्रह्मनिरूपण सुनते-सुनते राजा का लालच बढ़ गया और उन्होंने निरूपण बढ़ाने के लिए
पुनः प्रश्न किया। जिसके कारण कर्मबन्धन टूट सके ऐसे कर्मयोग का समूल लक्षण सुनने के लिये राजा ने
आग्रहपूर्वक प्रश्न किया।
राजोवाच
कर्मयोगं वदत नः पुरुषो येन संस्कृतः ।
विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम् ॥ ४१ ॥
राजा ने आत्मश्रद्धा से परिपूर्ण होकर अत्यन्त विनीत भाव से पूछा, स्वामी ! जिसके योग से कर्म का बन्धन
टूटता है, वह कर्मयोग मुझे पूरी तरह बताइये। किस कर्म के योग से सारा कर्म नष्ट होकर अपने आप
नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त होती है और पुरुष की पुरुषोत्तम से भेंट होती है, उसका सच्चा मर्म मुझे बताइये।
एवं प्रश्नममृषीन्पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके ।
नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४२ ॥
स्वामी ! पहले यही प्रश्न मैंने सनकादिक से पिता के सान्निध्य में पूछा था, उसका उत्तर उन्होंने क्यों नहीं
दिया ? मेरी इस आशंका का भी समाधान कीजिये। राजा का मन अत्यन्त पवित्र था, उनका उत्तर देने के लिये
आविर्होत्र बड़े हर्ष के साथ आगे बढ़ा और उसने कर्म वैचित्र्य का निरूपण किया।
आविर्होत्र उवाच
कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः ।
वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४३ ॥
(आविर्होत्र ने कहा) हे नृपनन्दन ! कर्म, अकर्म और विकर्म साधारण नहीं हैं। उनके विभाग का निर्णय
बड़े-बड़े ज्ञानी, स्मृतिकार भी नहीं कर पाये। जो स्वयं प्रतिसृष्टि करने वाले थे वे भी कर्म के विभाग का निर्णय