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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 869 में से

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पृष्ठ 95

तृतीय अध्याय ७९
प्राणिमात्र पर हाथ चलाने की बुद्धि उसके मन में उत्पन्न नहीं होती। कहीं घूर कर देखने से प्राणियों के मन में
भय न उत्पन्न हो इसलिये प्राणिमात्र को प्राणी समझ कर उनकी ओर, क्रूर दृष्टि से नहीं देखता। सारे केश कहीं
दब न जायें इसलिये वह कभी अपने शरीर को नहीं रगड़ता। इस प्रकार भूतहिंसा के भय से अपने देह के
देहपन का भी अहंकार नहीं करता। प्राणियों को जरा भी दुःख होने से प्राणियों में वास करने वाले परमात्मा को
दुःख होगा, ऐसा जिसका दृढ़ विश्वास होगा, उसके ही मन में अहिंसा का वास होता है। प्राणियों को कायिक,
वाचिक तथा मानसिक ये तीन प्रकार के दुःख होते हैं। वे जहाँ निःशेष होकर विलीन होते हैं वहीं अहिंसा का
वास होता है। हे राजाधिराज ! इसी का नाम शुद्ध अहिंसा है यह ध्यान में रखो। हे नृपवर्य ! अब 'द्वंद्व साम्य' की
दशा का वर्णन करता हूँ, ध्यान से सुनो। सुख और दुःख भाग्य के अधीन हैं और वह भाग्य पूरी तरह शरीर के
माथे लिखा है, यह सोच कर हम सद्गुरु के उपदेश के अनुसार निश्चिंत होकर रह जाते हैं। भाग्य के अनुसार
देह सुख-दुःख का भोग सहता रहता है। मूर्ख व्यक्ति उसमें हर्ष या विषाद का अनुभव करता है किन्तु शिष्य
गुरुपदेश में तल्लीन होने के कारण उसमें से किसी भी बात का स्पर्श अपने शरीर को नहीं होने देता। देह के
सुख से सुखी होने से दुःख भी अपना प्रभाव जमाता है। ये बातें गुरु ने समझायी रहती हैं इसलिये वह उनसे
मुक्त रहता है। निरभिमानी पुरुष को दुःख के संयोग से दुःख नहीं होता, उसी प्रकार सुखसंभोग में सुख का भी
अनुभव नहीं होता। दोनों ही बातों से वह अलिप्त रहता है। छाया धूप में गरम होती है तो वह छाया से ही
शीतल हो जाती है। उसी प्रकार एक बार मन में यह विश्वास होने पर कि सुख और दुःख दोनों ही मिथ्या हैं,
जो प्राप्त है उसी में आनन्द मालूम होने लगता है। देह में रहकर भाग्य के अनुसार आचरण करने पर सुख या
दुःख बाधक नहीं होता। यह अलौकिक रहस्य श्रद्धावान शिष्य को ही प्राप्त होता है। श्रद्धा के बिना यह रहस्य
कभी हाथ में नहीं आता और जब तक यह रहस्य हाथ नहीं लगता तब तक सुख-दुःख के प्रति समभाव उत्पन्न
नहीं होता। जब तक देह में 'अहंभाव' दृढ़ है तब तक द्वंद्व की पीड़ा अत्यन्त भयंकर होती है लेकिन जो
गुरुपदेश से निरभिमानी हो जाते हैं उनके लिये ये द्वंद्व मिथ्या हो जाते हैं, इसे ध्यान में रखो। जिस प्रकार स्वप्न
की दरिद्रता अथवा अमीरी जागृत होने पर मिथ्या हो जाती है, उसी प्रकार गुरुभक्तों को आत्मसाक्षात्कार के
कारण द्वंद्व बाधा की वार्त्ता भी नहीं सुनायी पड़ती। बच्चों के खेल में एकादशी और पारन जिस प्रकार समान है,
उसी प्रकार गुरुपदेश के साथ वे सारे द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। चन्दन के सुगन्ध से जिस प्रकार बेर और बबूल
भी चन्दन बन जाते हैं, उसी प्रकार गुरुवचन के अनुभव से सारे द्वंद्व आत्मस्वरूप में ही लीन हो जाते हैं। चन्दन
के आसपास के पेड़ केवल शुष्क काष्ट होते हुए भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के मस्तक पर धारण किये जाते हैं।
वह सब सत्संग की महिमा है। सद्गुरु यही सबसे बड़ा सत्संग है। उनकी संगत से शिष्य का परिवर्तन हो कर
वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है। इस प्रकार गुरुवचनों पर विश्वास करने से 'द्वंद्व साम्य' प्राप्त होता है, यह भी
गुरुवचन ही है।
सर्वत्रात्मेश्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम् ।
विविक्तचीरवसनं संतोषं येन केनचित् ॥ २५॥
सद्गुरु के वचन पर विश्वास रख वह यही मानता है कि चारों ओर परमात्मा ही भरा हुआ है और इसी
आत्मबुद्धि को निश्चय से दृढ़ कर मन में विचार करता है। (वह विचार इस प्रकार है) मुझमें परमात्मा का वास
है इसीलिये यह स्थूल शरीर हिलता-डुलता है, बोलता है। उसी के पूर्ण चित्प्रकाश से यह विश्व विश्वरूप
मालूम होता है। उसके ही आत्मप्रकाश से मेरी दृष्टि को दृश्य दिखायी देता है। दृश्य-द्रष्टा-दर्शन रूप से स्वयं