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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 869 में से

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पृष्ठ 91

तृतीय अध्याय ७५
प्राणिमात्र का दुःख देखकर जिसके प्राण बेचैन हो उठते हैं वह किसी को दुःख देने का विचार स्वप्न में भी
नहीं कर सकता। जिससे स्वयं को दुःख होता है, ऐसा आचरण वह प्राणिमात्र के प्रति कभी भी नहीं करता।
जिससे स्वयं को सुख प्राप्त होता है, वही आचरण वह दीनों के प्रति करता है। वह समस्त प्राणियों पर समान
रूप से दया करता है, उन्हें कभी खराब शब्द नहीं कहता। प्राणिमात्र के दुःखों का जिससे निवारण हो तथा
उन्हें सुख प्राप्त हो ऐसे ही उपायों का वह चिन्तन करता है। प्राणिमात्र को दुरुक्ति कहने से, जिह्वा को काटने
के लिए तत्पर हो उठता है। प्राणिमात्र के प्रति दुर्भाव का चिन्तन करने पर वह अपने ही चित्त का निर्दलन
करने लगता है। प्राणिमात्र को दुःख होता है तो वह उनके लिए अपने प्राण बिछा देता है। सारे जीव उसे
दयार्द दृष्टि से अपने प्राणों से भी प्रिय लगते हैं। ऐसी पूर्ण करुणा का ही नाम 'दया' है। अब 'मैत्री' का
असाधारण लक्षण बताता हूँ। सुनो! सभी प्राणिमात्र के लिए सुहृदों के सिवा और कोई अपना नहीं है। इसलिए
मैत्री बिना किये ही अपने आप हो जाती है। विषयों के वियोग से वह खराब नहीं होती, विकल्पों से वह
टूटती नहीं है, सारांश यही है कि कितने ही बड़े संकट क्यों न आयें, लेकिन मैत्री वैसी की वैसी बनी रहती
है। प्राण जाने पर भी जो नहीं टूटती उसी का नाम मैत्री है। कल्पांत का घाव सामने देखते ही मित्र समुदाय
एकत्र हो जाता है। ऐसा आचरण करने से प्राणिमात्र के मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। उस श्रद्धा की व्युत्पत्ति के
सम्बन्ध में क्रम से बताऊँगा। श्रद्धा का लक्षण अत्यन्त विचित्र है। इसमें ब्रह्मदेव तथा चींटी एक समान मालूम
होते हैं। फिर भी यथोचित क्रिया कभी नहीं चूकती यह ध्यान में रखो। अर्घ्यपाद्यादि पूजन सभी प्रकार के दान
तथा सम्मान यह सब श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करना होता है। किसी को केवल अन्न ही दिया जाता है,
किसी को अन्न और वस्त्र, किसी को केवल सूखा अनाज, किसी को चारा और पानी तो किसी को पीने के
लिये केवल दूध देना चाहिये। संक्षेप में कहें तो जिससे उसे पूर्ण सुख प्राप्त हो, वह सब उसे पूरी श्रद्धा से
देना चाहिये। अनुचित श्रद्धा से किया हुआ कार्य सभी प्रकार से दुःखकर होता है। उदाहरण के लिए ब्राह्मण
को घास देना तथा गाय को पकवान परोसना अथवा श्वान को सिंहासन पर बैठाना और साधु को गन्दे गड्ढे
में बैठने के लिये कहना अनुचित श्रद्धा का लक्षण है। भले ही बाघ का उपवास हो जाय लेकिन उसे गोदान
नहीं देना चाहिये। गाय कीचड़ से लथपथ हो गयी हो तो तेल लगाकर नहीं नहलाना चाहिये। इन्द्रिय भले ही
देह के ही भाग हों लेकिन जैसे जिह्वा का कार्य नाक से नहीं होता उसी प्रकार सब प्राणियों की आत्मा भले ही
एक हो लेकिन उनकी पूजा उनकी योग्यता के अनुसार ही करनी चाहिये। योग्यता के अनुसार देने में क्रिया
भले ही भिन्न हो लेकिन अंतःकरण की श्रद्धा अभिन्न रहती है। भागवत धर्म का प्रमुख लक्षण यही है। समस्त
भूतों में भूतात्मा अभिन्न स्थिति में होती है इसलिए दया, मैत्री तथा साधु के प्रति भक्ति किस प्रकार प्राप्त
होगी? प्रबुद्ध ऋषि इसके लिये उपाय बताने लगे। साधकों को ब्रह्म प्राप्ति हेतु भागवत धर्म की स्थिति अगले
नौ श्लोकों में प्रबुद्ध राजा को बता रहे हैं।
शौचंतपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्ज्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयोः ॥ २४॥
परमार्थ साधने के लिये 'शुचिर्भूत' होना आवश्यक है। शुचिता के सिवा कभी भी स्वार्थसिद्धि नहीं हो
सकेगी। इसलिये हे राजा! शुद्ध शौच के अर्थात् शुचिता के लक्षण सुनो। अंतःकरण का मल धोये बिना बाह्य
शुद्धि नहीं होती। वासना के मल से म्लान हुए मन को स्वच्छ किये बिना अहंकार से बाह्य सफाई दिखाना