श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ८१
श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापिहि।
मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २६ ॥
जिसमें भगवान के सगुण अथवा निर्गुण स्वरूप का वर्णन रहता है, अथवा जिसमें भगवान ने कुछ कहा
होता है अथवा जिसमें भगवद्गुणानुवाद का वर्णन रहता है, उसे हे राजा ! तुम 'भागवत शास्त्र' समझ लो।
साधक उसे प्राणों से भी प्रिय मानते हैं। उसमें भी विशेषरूप से ज्ञान के निरूपण से उन्हें विशेष प्रेम रहता है,
उन्हें वह बहुत अच्छा लगता है। गुरुमुख से सुना हुआ ज्ञान का निरूपण उन्हें अत्यन्त मधुर लगता है और इस
प्रकार श्रीभागवत पर उनकी दृढ़ श्रद्धा रहती है। उसके श्रवण से उनका मनोरथ पूर्ण होकर विषयों की इच्छा दब
जाती है। मन में विषय के प्रति रुचि न होने पर भी साधक के लिये विषय बाधक होते हैं और उससे उन्हें
अनुताप होता है। विषयावस्था अनिवार्य होने के कारण उसका त्याग नहीं हो पाता, इसलिये मुमुक्षु के मन को
अनुताप से अत्यन्त व्यथा होती है। वास्तव में विषय से अत्यन्त प्रेम न होते हुए भी स्वयं विषय का त्याग करना
सम्भव नहीं होता। ऐसे साधकों के लिए शास्त्रों ने कुछ नियम निर्धारित कर दिये हैं। विषय के प्रति आसक्ति
नहीं है फिर भी विषय से निवृत्ति भी नहीं हो पाती, ऐसी स्थिति साधकों की रहती है। उनके लिये शास्त्रों ने कुछ
नियम बनाये हैं। जो केवल विषयासक्त रहता है वह शास्त्र की बात कभी नहीं मानता अथवा जो जीवनमुक्त
हुआ रहता है वह भी शास्त्र की बात मान्य होते हुए भी उसे स्वीकार नहीं करता। जो मुक्त हैं वे विषय को
मृगजल की तरह मानते हैं। फिर वे मृगजलवत् विषय की निवृत्ति के लिये किस शास्त्र के नियमों का पालन
करें ? सारांश यही है कि जो अत्यधिक आसक्त रहते हैं उन पर तथा जो विशुद्ध विरक्त होते हैं उन पर भी शास्त्र
का कोई नियम लागू नहीं होता। केवल मुमुक्षु पर ही शास्त्र के नियम लागू होते हैं। गुरु शिष्य का संवाद होता है
उससे ज्ञानार्थ का बोध होता है, लेकिन उस बोध में विषयबाधा आड़े आती है। वह न आये इसके लिये शास्त्रों
के नियम प्रसिद्ध हैं। मानसिक, वाचिक तथा कायिक कर्म के अनुसार—विषयबाधा तीन प्रकार की होती है। उन
तीनों के लिये शास्त्रों ने तीन प्रकार के नियम बनाये हैं। मन के लिये 'शम' अर्थात् शान्ति का नियम, इन्द्रियों के
लिये 'दम' अर्थात् निग्रह का नियम तथा वाणी के लिये 'सत्य' का नियम इस प्रकार तीन नियम बनाये हैं।
विषय कामरूप हाथी 'अहं' के मद से उन्मत्त होकर यौवन के नशे में विधि का बन्धन तोड़ देता है। चाहे सुहृद
हो, राजा हो अथवा गुरु हो वह इन सबको झटक देता है। सूँड़ से स्वर्ग के शिखर को लपेट लेता है और
लबालब भरी हुई नरक की नदी में डुबकी लगाता है। यदाकदा धर्म के जल से उसे स्नान भी कराया जाय तो
वह लोभ की धूल अपने मस्तक पर डाल लेता है और ब्रह्मदेव सरीखे देवताओं को पछाड़ कर वह ममता की
गर्जना करता है। विवेकरूपी महावत ही उस समय उसके मस्तक पर चढ़ सकता है और शास्त्रविधि के अंकुश
से उस पर नियन्त्रण कर सकता है। उस पर वैराग्ययुक्त 'उपशम' का पहरा बिठा कर विवेकरूपी महावत उसे
'दम' के शृंखलाबन्ध से उसे काबू में लाता है और उसे सत्य के खम्भे से कसकर बाँध देता है। मानसिक,
वाचिक तथा कायिक कर्मों से विषयों की अत्यधिक बाधा होती है। उन तीनों के लिये तीन प्रकार के नियम
बनाये हैं। राजा ! उन नियमों का मर्म सुनो। 'शम' की स्थिति यह है कि वह विषय से आसक्ति हटा कर मन
बुद्धि आदि जो चित्तवृत्तियाँ हैं उन्हें परमार्थ की ओर मोड़ता है। पूर्व में सूर्य के उदय होते ही जिस प्रकार
अन्धकार त्रिभुवन को छोड़कर चला जाता है उसी प्रकार गुरुपदेश से 'शम' प्राप्त होते ही मन से अपने आप
विषय की निवृत्ति होती है। जब गुरुपदेश के अनुसार 'दम' बाह्य इन्द्रियों की प्रवृत्तियों को दबा देता है तो फिर
शम की संगति से इन्द्रियों के कर्मों की निवृत्ति होती है। कन्या का पालन-पोषण कर उसे दामाद को दान देने के