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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 869 में से

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पृष्ठ 101

तृतीय अध्याय ८५
स्वयं अंतःकरण में प्रविष्ट होते ही फिर पातक को कहाँ ठौर मिलेगा ? साधन रूप भक्ति की युक्ति से सप्रेम
भक्ति उत्पन्न होती है। हे ज्ञानसम्पन्न चक्रवर्ति राजा ! उस भक्ति की स्थिति बताता हूँ, सुनो। सद्भाव से की हुई
अभेद भक्ति से जब हृदय में श्रीहरि प्रकट होते हैं उस समय देह के बाह्य चिह्न भी बदलने लगते हैं। जब परस्पर
आध्यात्मिक संवाद शुरू होता है, उस समय अन्तर में स्वरूप का बोध. होता है, नेत्रों में अश्रु जमा हो जाते हैं,
शरीर पर पसीना चुहचुहाने लगता है और प्राणों की गति कुंठित हो जाती है। चित्त चैतन्य की भेंट होते ही
आनन्द से कंठ भर आता है, शरीर पर रोमांच उभरने लगते हैं तथा दृष्टि अर्धोन्मीलित होकर स्तब्ध हो जाती है।
अच्युत का चिन्तन करने पर वह प्रेम से सिहर उठता है, वह जोर-जोर से रोने लगता है, सिसकियाँ लेकर बेचैन
हो उठता है। रोने के साथ-साथ उसे हर्ष भी होने लगता है। हर्ष के उस आवेग में वह जोर-जोर से हँसने भी
लगता है। वह कहने लगता है, आज तक मैं देहाहंकार के कारण मोह-मद से ग्रस्त था, अब गुरुकृपा के बोध से
मुक्त हो गया हूँ और यह कहते हुए वह परमानन्द से डोलने लगता है। 'मैं' और 'मेरा' इस सांसारिक भावना से
मैं स्वयं को ही भुला चुका था। सद्गुरुवचन ने स्वयं को मुझसे मिलाया इस आनन्द से वह उल्लसित होता है।
सद्गुरु का वचन कितना आकर्षक है। उसके कारण ही मैं आत्मसुख का भोग करता हूँ। इस आश्चर्य से वह
स्वानंद से डोलने लगता है। जाने कैसे संसार के भूतों का भय लग रहा था। लेकिन गुरु वचन ने उसे वास्तव में
नष्ट कर दिया और यह कह कर वह लोकलज्जा का विचार न कर नाचने भी लगता है। माँ को देखकर जिस
प्रकार बालक विविध प्रकार से नाचने लगता है, उसी प्रकार गुरुवाक्य की महिमा का विचार मन में लाकर
निजभक्त अपनी ही तान में नाचने लगता है। आत्मबोध प्राप्त होने के कारण वह नृत्य विनोद से भगवान के पद
प्रसन्नतापूर्वक स्वयंसफूर्त होकर गाने लगता है। उस गुणानुवाद कीर्ति के गजर से सारा त्रिभुवन प्रसन्नता से भर
जाता है। उस आनन्दोद्गार से सन्तुष्ट होकर परमानन्द का अतिरेक हो उठता है। गाना छोड़कर वह अब जोर-
जोर से चिल्लाने लगता है। 'मेरा गाना मैं ही सुनूँ, यहाँ दूसरा कोई है ही नहीं' ऐसा ही कुछ वह कहता रहता है।
गानेवाला भी मैं ही और सुनने वाला भी मैं ही, मेरा गाना भी सचमुच मैं ही। सारे संसार में एक अकेला मैं ही।
द्वैत होते हुए भी द्वैत की बात नहीं, ऐसी उसकी स्थिति रहती है। भक्तिभाव से भगवान की सेवा करते रहने से
कर्मक्रिया अपने आप रुक जाती है। 'अहं-सोहं' समाप्त होकर वृत्ति का लय होता है। इस प्रकार प्रेमयुक्त भक्ति
बढ़ने से साधक का साधन-श्रम नष्ट हो जाता है। सांसारिक भ्रम दूर हो जाता है और चारों वाणियों के साथ
इन्द्रियों को शान्ति प्राप्त होती है। जहाँ एक भी नहीं है और दूजा भी नहीं है, आगे भी कुछ नहीं है और पीछे भी
कुछ नहीं है, जहाँ सुख भी आत्मसुख में विलीन हो जाता है यही स्वरूप निश्चित रूप से निज शिष्य का होता
है। बालक का लाड-प्यार किस प्रकार करना है यह उसकी माता ही जानती है, उसी प्रकार शिष्य को पूर्ण बोध
कराने की कला केवल सद्गुरु को ही मालूम होती है। बच्चे को अलंकार पहनाकर सजाने का समाधान भोगना
जैसी केवल माँ ही जानती है, उसी प्रकार शिष्य के सुख से सुखी होना केवल सद्गुरु को ही मालूम होता है।
इन्द्रियों को जिसका स्थान मालूम नहीं होता, मन और वाणी के लिये भी जो अगोचर है, बुद्धि जिसकी मर्यादा
रेखा नहीं जानती, ऐसी निर्विकार है निजवस्तु। जो दृष्टी को दिखलायी जा सके अथवा हाथ में दी जा सके, वैसे
परमार्थ को दिखलाया या दिया नहीं जा सकता लेकिन सद्गुरु शिष्य को उसका भी बोध करा देते हैं। शिष्य को
प्रबोधन करने की दृष्टि से सद्गुरु विचित्र उपदेशक है। इसलिये शिष्य के सुख से गुरुराज इस स्वानन्द का भोग
करता है। शिष्य को जैसे-जैसे परब्रह्म की प्राप्ति होने लगती है, वैसे-वैसे उसका भ्रम दूर होने लगता है, इससे
सद्गुरु का सुखसंभ्रम भी बढ़ने लगता है। रणभूमि पर सेनापति शत्रु की सेना ध्वस्त करता है तो इधर राजा यश