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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 869 में से

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८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीकृष्ण है उसे स्वहित साधने के लिये जो पूरी तरह भजता है, उसकी उस निर्गुण परमात्मा के प्रति जब तक
दृष्टि स्थिर नहीं होती, तब तक उसे सर्वात्मभावना से सगुण मूर्ति का ही हृदय में ध्यान-भजन करना चाहिये।
यदि ध्यान में सगुण मूर्ति भी ठीक तरह से न आ रही हो तो प्रतिमा का ही ध्यान भजन करना चाहिये। उपासक
लोग अपने घरों में जिसकी पूजा करते हैं, उन्हें 'चलमूर्ति' समझना चाहिये और द्वारकादि क्षेत्र की पुराणकाल से
प्रसिद्ध मूर्ति को 'अचलमूर्ति' समझना चाहिये। उन मूर्तियों से भी श्रेष्ठ स्थान 'ब्राह्मण' का है। वे पूरी तरह पूज्य
हैं। उनका सर्वकाल, सभी प्रकार से भजन करना चाहिये। उन ब्राह्मणों में भी सदाचार सम्पन्न 'श्रोत्रिय' अर्थात्
वेदों के जानकार ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उनसे भी श्रेष्ठ और पूज्य हैं वे जो वेद शास्त्रार्थ प्रवीण हैं। उनमें भी जो
'भागवत' अर्थात् भगवद्भक्त होने के साथ-साथ भागवत धर्म में तत्पर हैं, जो निष्काम भाव से भगवद्भक्ति करते
हैं तथा जिनकी श्रीकृष्ण पर पूर्ण श्रद्धा है, जिनका हृदयस्थ श्रीकृष्ण ही आत्मा, श्रीकृष्ण नाथ ही जिनका
अनन्यस्वामी हैं ऐसे जो पूर्ण भगवद्भक्त हैं वही वास्तव में भक्तों को पूज्य हैं। जिसके देवता, मानव और वेद
भी स्तुतिपाठक चारण होते हैं वह 'सद्गुरु' अत्यन्त महानता के कारण शिष्य को सभी प्रकार से, सब से अधिक
पूज्य हैं। गुरु और ब्रह्म इन दोनों को एकसमान कहा जाय तो वह भी कम ही होगा क्योंकि गुरुवचन से ही ब्रह्म
को ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। देवता के प्रति जैसी भावना रखते हैं वैसी ही सद्गुरु के प्रति रखनी चाहिये। गुरु में
और देवता में भिन्नत्वभाव होता ही नहीं है। इसलिये देवता की पूजा करने से गुरु को सन्तोष प्राप्त होता है और
गुरु की पूजा करने से देवता को सन्तोष होता है। नाम दो होने पर भी वे प्रसन्नतापूर्वक एक ही स्वरूप में रहते
हैं। सोना और कंगन ये दो नाम होते हुए भी सुवर्ण एक ही है। उसी प्रकार गुरु में और ब्रह्मा में भेदभाव नहीं
होता। उस सद्गुरु का भजन तन, मन, धन से निष्कपट भाव से करना चाहिये। अपने सर्वस्व के साथ श्रीगुरु के
चरणों में आत्मार्पण करना चाहिये। उसी प्रकार साधु और ज्ञानसम्पन्न श्रोता को भी सद्गुरु समान ही मानना
चाहिये। उनके साथ संवाद कर श्रवण और निरूपण करते रहना चाहिये।
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः।
मिथोरतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥ ३०॥
ऐसे लोगों के पास कथानुवाद करते हुए परस्पर निजात्मबोध होता है और उस गुह्यज्ञानसंवाद से परमानन्द
छलकने लगता है। इस प्रकार हरिकथा में रुचि के कारण परस्पर श्रद्धा उत्पन्न होती है और वे परस्पर सुखसंवाद
करते हुए आत्मसुख का माधुर्य चखते रहते हैं। आत्मसुख का माधुर्य एक बार चखने से दुःखों की राशियों का
विलय हो जाता है। इस प्रकार भक्ति साम्राज्य की पताका फहरा कर साधकों को स्वानन्द साम्राज्य का उपभोग
लेना चाहिये। सद्भाव से अभेद भजन करते समय भक्तों को स्वानंद की पूर्ण प्राप्ति होती है। हे राजा! उस
स्वानंद का वास्तविक लक्षण बताता हूँ, सुनो।
स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
भक्त्या संजातया भक्त्या विभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ ३१॥
क्वचिद्रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचित् हसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः।
नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वृताः॥ ३२॥
हरिकथा की महिमा को भक्तिभावना से पूछने वाले तथा बताने वाले इन दोनों को ही बहुत पुण्य प्राप्त
होता है पाप औषधि के लिये भी नहीं मिलता। जिसके नामस्मरण मात्र से ही सारे पातक नष्ट हो जाते हैं, वह