श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
की पताका फहराता है, उसी प्रकार शिष्य के परमानन्द में डुबकी लगाते ही गुरु सुखसागर में तैरने लगता है।
शिष्य के प्रति ऐसी आतुरता जिस सद्गुरु में वास करती है, उसी के पास अनन्य श्रद्धा से पहले बताये हुए
भागवत धर्म सीखने चाहिये।
इति भागवतान् धर्मान् शिक्षन् भक्त्या तदुत्थया।
नारायणपरो मायामञ्जस्तरति दुस्तराम्॥ ३३॥
ऐसी भागवत धर्म की स्थिति है। सद्गुरु की शरण में जाकर भागवत धर्मोक्त भगवद्भक्ति का अभ्यास
करना चाहिये। इस भक्ति में माया की शक्ति बाधा नहीं डाल सकती। 'माया' को वेदशास्त्र के अध्ययन से
नियंत्रित नहीं किया जा सकता। ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी वह दुस्तर है। लेकिन भगवान की ओर जिनकी
लगन लग गयी है वे केवल हरिनाम के स्मरण से ही उसे पार कर लेते हैं। हरिनाम की गर्जना सुनकर माया
तत्काल भाग जाती है इसलिये इस उपाय से हरिभक्तों के सुख का पारावार नहीं रहता। हे राजा! यह माया
परात्पर नारायण की है। नारायण के चरणों का भजन करने से उसे सहज ही पार किया जा सकता है। भजन का
उपाय तुम्हें बताया। तुमने माया को पार करने का उपाय पूछा था, तो हे राजेश्वर! भगवद्भक्ति यही एक उपाय है
यह तुम निश्चित रूप से जान लो। भक्ति के पास सदैव तृप्ति रहती है, भक्ति के पास नित्य मुक्ति रहती है, भक्ति
के पास भगवत्प्राप्ति रहती है और हरिभजन से ही माया की निवृत्ति होती है। हरिनाम कीर्तन के गजर से माया
प्राण बचाकर भागती है, हरिभजन की शक्ति से सीधे सादे, भोले-भाले भक्त भी इस माया को पार कर लेते हैं।
जिस नारायण की भक्ति करने से निजभक्त सहज ही माया को पार कर जाते हैं, उस नारायण की मुख्य स्वरूप
स्थिति कैसी होती है, यह प्रश्न चक्रवर्ती जनकराजा ने उन नवयोगियों से पूछा।
राजोवाच
नारायणभिधानस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।
निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमा ॥ ३४ ॥
सभी भूतों के प्रति भगवद्भाव रखना यही माया को तरने का उपाय है यह सुनकर राजा को प्रसन्नता हुई।
उस आनन्द के आवेग में उसने परब्रह्म स्वरूप के बारे में पूछा। जिस नारायण की भक्ति करने से उत्तम भक्त
माया तर जाते हैं, उस नारायण का निजस्वरूप राजा ने बड़ी उत्कंठा से पूछा। 'ब्रह्म-परमात्मा-नारायण' एक ही
वस्तु का नाम है तो उस वस्तु की निजस्थिति कैसी रहती है इसका साद्योपांत वर्णन करने के लिये राजा ने कहा।
जो सारे संसार का अधिष्ठान है, अंतर्बाह्य जिसकी पूर्ण व्याप्ति है उसे वेदज्ञ 'नारायण' के नाम से पुकारते हैं।
सौभाग्य से ही मुझे आप जैसे ज्ञाननिधि प्राप्त हुए हैं। आपके वचनामृत के बोध से मेरी अहंभूमि गल गयी।
आपके भाषण से मेरी स्वानन्द स्फूर्ति उफन कर बाहर आ गयी। चित्तवृत्ति तो इतनी पुलकित हो उठी है कि
कितना भी भाषण करो मन तृप्त नहीं होता। राजा का यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर प्रबुद्ध का छोटा भाई
पिप्पलायन प्रसन्नता से बोलने के लिये आगे बढ़ा।
पिप्पलायन उवाच
स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सद् बहिश्च।
देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र ॥ ३५ ॥