श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ७७
भी साधु नहीं ठिठुरता, अत्यन्त गर्मी से शरीर तप्त होता है लेकिन उस देह के ताप के कारण साधु गरम नहीं
होता। सुख को देखकर वह उसे जितनी खुशी से आलिंगन देता है उतनी ही प्रसन्नता से वह दुःख भी सहन
करता है। राजा ! इसी का नाम है सच्ची 'द्वंद्व सहिष्णुता'। सामने से गुलेल का पत्थर आकर लगता है तो दुःख
होता है लेकिन वही पत्थर सोने का हो तो दुःख के स्थान पर अपार आनन्द होता है। सुख या दुःख को व्यक्त
करने वाला तत्व एक ही है। उससे एकता होने पर साधक सुखपूर्वक द्वंद्व सहन करते हैं। उसी प्रकार द्वंद्व का
अनुभव जिस ज्ञान को होता है उसे जान लेने पर द्वंद्व की परिणति निर्द्वंद्व में होती है। कड़े गन्ने में और उसके रस
में जिस प्रकार अखण्ड मिठास रहती है उसीप्रकार द्वंद्व में 'चिद्धन वस्तु' को वह देखता है। ऐसी यह अखण्डता
जब तक साधक के हाथ नहीं लगेगी, तब तक हे राजाधिराज ! ये द्वंद्व सचमुच ही सहन नहीं होंगे। इसी का नाम
द्वंद्वसहन या 'तितिक्षा' है। अब 'मौन' का क्या लक्षण होता है उसे ध्यान से सुनो। लोगों में वाद-विवाद करने से
देहाभिमान दृढ़ होता है किन्तु सद्गुरु ने उस अभिमान को शब्दों के साथ ही समूल नष्ट कर दिया। सद्गुरुं के
वचन कान में पड़ते ही स्तुति और निन्दा दोनों को निगल कर मुख से बोल नहीं निकलते। हृदय में तितिक्षा भर
जाती है। किसी का अवगुण कहने लगो तो वहाँ अपनी ही मूरत दिखायी देती है। इसीलिये किसी को कठोर
वचन कहते समय गुरुवचन से वह मौन हो जाते हैं क्योंकि स्वयं ही स्तव्य, स्तविता और स्तवन होने के कारण
अपना ही स्तवन करना मूर्खता ही होगी। जहाँ अपनी आत्मा नहीं हो ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ-जहाँ जो
भी दिखाई देता है वह निरन्तर आत्मप्रकाश के ही कारण दिखाई देता है। सद्गुरु ने ऐसी युक्ति बता दी और वह
विश्वास के कारण अंतःकरण में इस प्रकार स्थिर हो गयी जिससे वह वाचा से निन्दा या स्तुति करता ही नहीं
है। अगर अपने हित के लिये कुछ संवाद करना भी चाहता है तो, सद्गुरु के भाषण के आगे वेदशास्त्रों की
युक्तियाँ भी कुंठित हो जाती हैं। इस प्रकार स्तुति, निन्दा अथवा विवाद ही समाप्त हो जाता है। ऐसे महामौन के
कारण साधकों को परमानन्द की प्राप्ति होती है। ऐसा महामौन साध्य होने के लिये सद्गुरु वेदाध्ययन कराते हैं
अथवा उपनिषद के अर्थ का विश्लेषण कर उसका अर्थज्ञान समझाते हैं। यदि इससे भी दृढ़ मौन प्राप्त करना हो
तो श्रीरामकृष्ण का नामस्मरण करने के लिये कहते हैं। नामस्मरण की अखण्ड गर्जना के आगे वेदार्थ भी उसके
सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। जिसकी वाणी निरन्तर रामनाम की गर्जना करती रहती है उसे दण्डवत
करने के लिए तीर्थ भी वहाँ उपस्थित होते हैं, बड़े-बड़े देवतागण उसका चरणस्पर्श करते हैं और यम स्वयं
उसके चरणों का तीर्थ अपने मस्तक पर लगाता है। अरे ! जिसे रामनाम का स्मरण कहते हैं वही साक्षात
'महामौन' है। वेदों ने नाम का पूर्ण स्तवन किया है, इसीलिये हरिनाम ही शुद्ध वेदाध्ययन है। तात्पर्य यह है कि
हरि का नामस्मरण करने से वेदाध्ययन का फल प्राप्त होता है। वेद अथवा नामस्मरण इसी का नाम 'स्वाध्याय'
है यह ध्यान में रखो। महाराज ! अब 'आर्जव' का लक्षण ध्यान से श्रवण करो। आर्जव वह है जो जीव में
जीवन रहता है अथवा वस्त्र में तंतु ऐक्यभाव से रहते हैं अथवा जैसे शक्कर का करैला बनाने से उसका माधुर्य
कम नहीं होता, उसी प्रकार विषम स्वभाव जीवों का भी यह अपने मृदु स्वभाव से रंजन करता है। चन्द्र की
चन्द्रिका भले ही वक्र हो लेकिन इसके कारण भीतर का अमृत नहीं छलकता। उसी प्रकार टेढ़े स्वभाव के लोगों
को देखकर भी उसकी मनोवृत्ति में परिवर्तन नहीं होता। वह किसी को भी नीच नहीं समझता सभी को अपना
मित्र, सगा-सम्बन्धी समझता है, मानों प्रत्येक प्राणिमात्र से उसका पुराना परिचय हो। निहाई तप्त लोहे को
सहारा देती है, हथौड़े का घाव भी सहन करती है, सँडसी से लोहे के टुकड़े को पकड़कर उस पर हथौड़े से
प्रहार करते हैं, उस लोहे के साथ वह लौहगुण से ही सम्बन्ध रखती है। उसी प्रकार जिसे सभी सगे हैं, ऐसा