श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
परमात्मा ही सुशोभित है। जो भी दृश्य दृश्यरूप में प्रगट होता है उसके अन्दर-बाहर आत्मस्वरूप ही भरा रहता
है। इसी अनुवृत्ति से वह सारी सृष्टि को जगमगाते हुए देखता है। उस समय जो भी भूताकृति उसे दिखायी पड़ती
है वह सब परमात्मस्वरूप ही है ऐसा उसे अनुभव होता है। इतना ही नहीं बल्कि त्रिभुवन का नियंता मैं ही हूँ
ऐसा स्फुरण उसमें होने लगता है। वह सोचता है मेरे ही आदेश से संसार चल रहा है, कलिकाल का नियंता मैं
ही हूँ, उत्पत्ति, स्थिति और लय करने वाला मैं ही हूँ। यह मूल अहंता सहज ही उत्पन्न होती है। पूर्वान्वय से
देखने पर उसे सर्वत्र अपना ही स्वरूप दिखायी देने लगता है। तब दृश्य-दर्शन-द्रष्टा यह त्रिगुट नष्ट होकर
'अहंकार' पिघल जाता है। तब परब्रह्म से एकत्व स्थापित होकर चारों ओर सच्चिदानन्द भर जाता है। ऐसा
विशुद्ध अनुभव गुरुपदेश से सच्छिष्यों को प्राप्त होता है। उस समय यह सुनकर कि भगवान वैकुण्ठ में हैं, उसे
कुछ विचित्र-सा लगता है। भगवान क्षीरसागर में रहता है यह सुनकर उसे अपार हँसी आती है। सचमुच, ऐसी
तिल रखने की भी जगह नहीं है जहाँ भगवान न हों। ऐसे उस ईश्वर को किसी एक स्थान का कहना सच्छिष्य
को नहीं पटता। वैकुण्ठ और क्षीरसागर जिसके प्रकाश से प्रकाशित होते हैं वह परमात्मा वैकुण्ठवासी अथवा
क्षीराब्धिवासी है यह कहना स्पष्ट रूप से ईश्वरत्व को नकारना है। जब सर्वत्र ईश्वर का वास है वहाँ उसकी
एकदेशी महिमा का वर्णन करना उचित नहीं होगा। वह अनाश्रमी पूर्ण ब्रह्म है, वह वैकुण्ठादि आश्रम से कभी
भी बँध कर नहीं रह सकता। जो सब में अखण्ड भरा हुआ है उसे 'आवाहन', जो सबका अधिष्ठान है उसे
'आसन', जो सर्वव्यापी है उसके लिये सिंहासन की कल्पना करना, स्थान की कल्पना करना केवल कल्पना का
खेल है। लेकिन ऐसी कल्पना करनेवाली अपनी प्रवृत्ति भी ब्रह्मरूप है यह जो नित्य देखते हैं उनकी
परब्रह्मस्थिति कभी विचलित नहीं होती। यदि वास्तव में ऐसी परब्रह्मस्थिति प्राप्त करनी है तो साधक को द्वैत की
भावना त्याग कर प्रतिदिन एकान्त में बैठना चाहिये। परमार्थ की साधना करते समय साधक को अन्न और वस्त्र
की अड़चन हो तो उसे ऐसे वस्त्र लेने चाहिये जिसके लिये धन आवश्यक न हो, जिन्हें दूसरों ने त्याग दिया है
ऐसे फटे-पुराने वस्त्र भी चल सकते हैं। उसे साग-सब्जी, फल-फूल, कंद आदि भक्षण कर अपना पेट भरना
चाहिये लेकिन परमार्थसाधन छोड़कर अन्न-वस्त्र अथवा धन प्राप्त करने नहीं जाना चाहिये। भले ही हाथ में
झोली लेकर भिक्षा माँग ले लेकिन अन्न-वस्त्र के लिए जीवन खर्च नहीं करना चाहिये। ज्ञानी साधक कभी भी
अन्न अथवा आच्छादन के लिए प्रयास नहीं करते। देह भाग्य के अधीन है, भाग्य ही उसका सहज पालन करता
है। हम भले ही रात-दिन परिश्रम करें लेकिन यदि भाग्य में नहीं हैं तो हाथ में एक कौड़ी भी नहीं लगती। ज्ञानी
साधक यह बात जानते हैं। इसलिये भाग्य से जो भी मिल जाय उस पर अपना निर्वाह कर साधक सदा निश्चिंत
रहते हैं और प्रसन्नतापूर्वक, गुरुवचन के अनुसार परमार्थ साधते हैं। देह के भाग्य के अनुसार सुख-दुःख की
घटनायें होती रहती हैं, उसमें साधकों को सन्तोष प्राप्त होता है क्योंकि उन्हें गुरुवचनों का चस्का लगा रहता है।
शरीर को उसके भाग्य के अनुसार अन्न-वस्त्र मिलता रहता है लेकिन गुरुवाक्य का सुख छोड़कर मन कभी भी
शरीर की ममता के वश में नहीं रहता। याचना किये बिना यथासमय सहज ही जो कुछ प्राप्त हो जाय उसे उत्तम
मानकर वह गुरुवचन के अनुसार उसका सेवन करता है। शरीर निर्वाह के लिये वह किसी भी चीज की इच्छा
नहीं करता। जो कुछ मिलता है उसी में सुख मानकर वह आत्मानन्द में तृप्त रहता है। भाग्य के अनुसार सुख-
दुःख भोगते समय साधक के मन को संतोष ही होता रहता है। यह अनुभव उस शिष्य को गुरुवचनों पर विश्वास
रखने से ही प्राप्त होता है। यही विश्वास दृढ़तर होने के लिए गुरु के पास आग्रहपूर्वक बैठकर पूर्ण निश्चय के
साथ ज्ञानदायक भागवत शास्त्र का अध्ययन करना चाहिये।