श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिसका स्वभाव है उसका नाम 'आर्जव' है। यह गुरुदीक्षा नितान्त अपूर्व है। (अब ब्रह्मचर्य के बारे में बताते
हैं) देवता, दानव, बड़े-बड़े ऋषि आदि को भी मदन ने अपना दास बना कर रखा है। इस मदन की मार बहुत
कठिन है। यह अत्यन्त दुर्धर अंतःकरण में काम का स्थायी निवास है तिस पर कामवृत्ति को दबाने का प्रयास
करता है। उसका मन ही उसे निष्काम नहीं रहने देता। लेकिन लोगों को वह ठगता है। लेकिन सद्गुरु की युक्ति
ऐसी नहीं है। उनके उपदेश से काम की कामनावृत्ति ही बदल जाती है। वे शिष्य को अखण्ड ब्रह्मचर्य का
उपदेश करते हैं। मदन के राज्य में स्त्री-पुरुष का भेद है लेकिन गुरुदीक्षा अलौकिक है। इस दीक्षा में स्त्री-पुरुष
दोनों माया अर्थात् मिथ्या है और विषयसुख केवल भ्रम है। इस पर कोई शंका प्रकट करता है—'जननेन्द्रिय ही
आनन्द का स्थान है।' यह वेदवचन क्या गलत है? इस पर समाधान इस प्रकार है। जो वेदों के पूर्ण ज्ञाता हैं वह
इसका विवेचन इस प्रकार करते हैं—'शक्कर का माधुर्य कैसा है' यह यदि कोई पूछे तो बताना कठिन है। उसे
शक्कर का एक कण चखने के लिये दिया जाता है। उसे चखने पर उस कण में जो मिठास है वही शक्कर की
पूरी राशि में है ऐसा मालूम होता है। इस प्रकार लोग परमानन्द सुख की मिठास जननेन्द्रिय के रूप में चखते हैं।
इसी उद्देश्य से वेदों ने जननेन्द्रिय को आनन्द का स्थान बताया है। वह जननेन्द्रिय सुख क्षणिक होता है लेकिन
उस सुख की नित्य स्थिति को जो संभोग के बिना ही बढ़ाते हैं उन्हें स्त्री-पुरुष मिथ्या मालूम होते हैं और वे
सहज ही संज्ञान हो जाते हैं। जिस मिठास को चखा वही शक्कर है उसी प्रकार मैथुन को ही परमानन्द मानकर
विषयांध लोग मैथुन के पीछे दौड़ते हैं। जननेन्द्रिय में ही परमानन्द की मिठास होती है यह मानकर मूर्ख
शिरोमणि निरन्तर स्त्री काम का दबाव सहते रहते हैं। शक्कर का यदि नारियल बनाया जाय तो उसका कवच,
गरी आदि सब शक्कर ही होता है। उसी प्रकार विषय सुख का कल्लोल मूलतः मूल परमानन्द से ही होता है।
कितने भी प्रकार के पकवान क्यों न बनाये जाएँ लेकिन उसमें जो स्वाद आता है वह शक्कर की मिठास के
कारण ही होता है उसी प्रकार विषय के प्रति जो आकर्षण उत्पन्न होता है, वह आत्मानन्द के माधुर्य के कारण
ही होता है। यह मूल आत्मस्वरूप की मिठास उनकी समझ में नहीं आती और वे विषयों का दबाव सहते रहते
हैं। किन्तु सद्गुरुकृपा अत्यन्त बलवान है। वह विषयों की सारी आसक्ति एक ओर खींच लाती है। इसलिये
विषय की आस्था सच्छिष्य के माथे पर नहीं चढ़ पाती। गुरुवचन पर निष्ठा होने के कारण स्त्रीभोग की
आसक्ति मिथ्या हो जाती है। मूलतः यह आत्मा और आत्मी नहीं होती। मूल तत्व का अनुभव होते ही 'अखण्ड
ब्रह्मचर्य' की प्राप्ति होती है। इसी का नाम उत्तम 'नैष्ठिक ब्रह्मचर्य' है। इस अखण्ड ब्रह्मचर्य का बोध सद्गुरु
करते हैं। हे चक्रवर्त्ति राजा! अब 'अहिंसा' का रूप सुनो। स्वप्न में, सुषुप्तावस्था में अथवा जागृतावस्था में भी
प्राणिमात्र पर वक्रदृष्टि नहीं करनी चाहिए। देखो, कहीं पैर पटकने से पृथ्वी को कष्ट न हो इसलिये वह अपने
पैर बहुत आहिस्ते से रखता है। कहीं आकाश चौंक न पड़े इसलिये वह जोर से पुकारता नहीं है। अपने वचनों
से सबको सन्तोष प्रदान करता है। वाणी में मानों अमृत ही भरा है। उसकी वाणी जब आकाश में प्रवेश हो
करती है तो मानो उस शब्दानन्द चमत्कार से सारा आकाश आत्मसुख से भर जाता है। इस प्रकार उसका पूरा
भाषण आनन्दमय रहता है। पानी में छलांग लगाने से कहीं वह दब न जाय इसलिये तरंग के अनुसार पानी की
धार न कटे ऐसे हिसाब से वह जल में गोता लगाता है। ऐसे विचार से वह पानी में डुबकी लगाता है जिससे
पानी का ताप दूर हो जाता है और इस प्रकार स्नान करने से जीवन से जीवन का ताप कम होता है। कहीं वायु
को भी कष्ट न हो इसलिये वह श्वासोच्छ्वास भी जोर से नहीं लेता। उस पर नियन्त्रण रख कर ही शरीर को
चलाता है। जिस प्रकार अपने ही शरीर पर आघात करने के लिए वह कभी हाथ नहीं उठाता उसी प्रकार