श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ८३
करने से उसे अतीव सन्तोष प्राप्त होता है। मूलतः वह आनन्दघन है, तिस पर कीर्तन में उसकी गुण कर्म लीला
गाने से वह प्रसन्न होकर डोलने लगता है। इस प्रकार कीर्तन में हरि की कीर्ति गाने से चित्त की वृत्तियाँ निर्मल हो
जाती हैं और उस वृत्ति में ध्यान की मुद्रा स्थिर हो जाती है। राजा ! वह ध्यानस्थिति बताता हूँ, सुनो। मस्तक पर
मुकुट, कान में कुण्डल, कमर में मेखला (कमरबंद) तथा जरी का पीताम्बर पहना हुआ तथा गले में आपाद
वैजयंतीमाला, ऐसा वह मेघश्याम सुशोभित होता है। ऐसी वह मनोहर, सुन्दर, सगुण मूर्ति मनश्चक्षु के सामने
प्रगट हो जाती है, अथवा नामरूप गुण का त्याग कर निर्गुण स्वरूप अर्थात् परिपूर्ण ब्रह्म शुद्ध चैतन्य का
अंतःकरण में स्फुरण होने लगता है। ऐसी मूर्ति मन में स्थिर होते ही भक्त की बाह्य क्रिया कृष्णार्पण हो जाती है,
यहाँ तक कि स्त्रीपुत्र आदि भी पूरी तरह कृष्णार्पण हो जाते हैं।
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम्।
दारान्सुतान्गृहान्प्राणान्यत्परस्मै निवेदनम् ॥ २८ ॥
अग्निहोत्रादिक 'याग' और होम, ग्रहण आदि में किया हुआ उत्तम 'दान' तथा 'तप' अर्थात् वर्णाश्रम के
अनुसार यथोचित किया हुआ जो स्वधर्म है, वेद शास्त्रों के अनुसार किया हुआ आचरण, विधि विधान के
अनुसार गुरुदीक्षा लेकर प्राप्त किया हुआ शुद्ध मंत्र अथवा केवल भगवान के नाम के मंत्र का जाप आदि सब
अर्थात् यज्ञ, दान, धर्माचरण तप-दीक्षामंत्र अथवा नाम का जाप निर्विकल्प मन से कृष्णार्पण करना चाहिये। इस
प्रकार का आचरण कर जो अनन्य भाव से हरि की शरण में जाते हैं वे हरि के प्रेम के पात्र हो जाते हैं और जिस
प्रकार माँ अपने नन्हें बालक का पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार श्रीहरि उनका पालन-पोषण करता है।
इसलिये उदर निर्वाह के जो उद्योग हों उन्हें भी कृष्णार्पण ही करना चाहिये। जो भक्त ज्ञान से सम्पन्न होते हैं वे
कभी भी 'यह मेरा है' कहकर उसके प्रति मन में अहंकार नहीं धरते। मन में जिसके प्रति अत्यन्त रुचि रहती है,
जिसके प्रति अत्यन्त प्रेम रहता है, वह सब गुरुवचनों पर विश्वास कर कृष्णार्पण कर देते हैं और इसके लिए
आठों पहर अपना शरीर सेवा में खर्च करते हैं। क्षणभर के लिये भी वे विषयाकार व्यापार नहीं करते। अन्न के
लिए पागल होकर वे धनिकों के पैर नहीं छूते हैं। विषय की इच्छा से वे अपना जीवन कौड़ियों के भाव नहीं
बेचते हैं। लाखों रुपया खर्च करने पर भी जीवन का आधा हिस्सा भी प्राप्त नहीं होगा। ऐसे अमूल्य जीवन से
भक्त केवल परमार्थ अर्जित करता है और विषयों की राशि पर थूकता है। राजा भी राज्य का वैभव त्याग कर वन
में चले जाते हैं तथा विषयासक्ति त्याग कर परमार्थ की साधना करते हैं। पूर्ण भक्ति की महिमा का वर्णन किन
शब्दों में किया जाय ? सच्चा भक्त एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता, वह सारा जीवन ही कृष्णार्पण कर देता है।
उसी प्रकार पुत्र, स्त्री आदि जो भी कोई हों उन्हें तथा स्वयं को वह भगवत्सेवा के लिये अर्पण करता है।
पुत्रदारादिक 'मेरे' हैं ऐसी ममता वह मन में कभी नहीं पालता। स्त्री, पुत्र, अपनी काया, घर तथा प्राण आदि में
अंतर्बाह्य परमात्मा ही भरा हुआ है यह वह देखता है और बिना संकल्प के अर्थात् 'अर्पण करता हूँ' कहे बिना
ही सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है।
एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।
परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ २९ ॥
इस प्रकार जो स्त्री, गृह, देह तथा सम्पत्ति ये सब शुद्ध श्रद्धा से आत्मार्पण कर सदासर्वदा भजन करते हैं वे
ही भक्त श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय होते हैं। समस्त प्राणिमात्र के हृदय में वास करने वाला जो परमात्मा भगवान