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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 869 में से

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पृष्ठ 90

७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सेवा को उत्तम मानता है। सेवा में किसी प्रकार का कपट न कर वह शुद्ध मन से उसे करता है। सेवा में कष्ट
जितना अधिक होता है, उतना ही उसका मन अधिक उल्हसित होता है। गुरु के लिए सच्छिष्य और असच्छिष्य
एक समान रहते हैं लेकिन जिसके हृदय में जैसा भाव रहता है उसी के अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। 'भावेषु
विद्यते देवो' यही उपदेश का सार है। अपने भाव के अनुसार ही फलभोग भोगना पड़ता है। अपनी बुद्धि के
अहंकार के बल पर मृत्यु से बचने के प्रयास में हिरण्यकशिपु मारा गया। मौका देखकर भगवान ने उसे समाप्त
कर दिया। लेकिन उधर प्रह्लाद को देखिये। देवाधिदेव मेरी रक्षा करने वाला है ऐसा उसका दृढ़ भाव था और
उसी भाव के कारण राजा ने उसे मारने के जितने भी प्रयत्न किये वे सब व्यर्थ गये। परमार्थ में ज्ञान का अभिमान
शुद्ध डाका है इसलिये जो सद्भाव से परिपूर्ण रहता है वही जन्म-मरण के बन्धन तोड़ डालता है। शिष्य की
परीक्षा करने वाला मैं ज्ञानी हूँ ऐसा अहंकार सद्गुरु को कभी नहीं होता बल्कि उसके प्रति जिसके मन में जैसी
भक्ति होती है वैसा वह फल पाता है। राजा! इसे रहने दो लेकिन देखो अच्छे शिष्य का सद्भाव कितना विचित्र
होता है। गुरु और ब्रह्म को वह ऐक्य भाव से मानता है। वह मानता है कि सद्गुरु मेरी इन्द्रियों का परिचालक,
मेरे हृदय में रहने वाली 'आत्मा' है तथा बाह्य सेवा करते समय सद्गुरु वास्तव में साक्षात 'ब्रह्ममूर्ति' है।
सद्गुरुचरणों में वह अपना तन-मन-धन अर्पण कर अपना प्राण भी उसे अर्पण कर देता है, अर्थात् सब कुछ
आत्मार्पण करता है। इससे सद्गुरु भी उस पर सन्तुष्ट होकर उससे मोहित हो जाते हैं और स्वयं स्वामी होते हुए
भी सेवक के अधीन हो जाते हैं। बलि ने सर्वस्व अर्पण कर दिया इसलिये भगवान उसके द्वार पर द्वारपाल
बनकर रह गये। भजन भक्ति का यह आनन्द है कि उसमें जो स्वामी रहता है वही सेवक के पास पहरा देता है।
जो उत्तम भक्त होते हैं वे भगवान की ऐसी अगाध प्रीति के पात्र बनते हैं, लेकिन यह लाभ भोले-भाले लोगों को
कैसे प्राप्त होगा? इसीलिए हर प्रकार से सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए ताकि वह प्रसन्न होकर शिष्य को
का उपदेश कर सके। जिस भजन से भगवान का भजन कर 'उत्तम भक्त' बने, उन सारे भागवतधर्मों
को सद्गुरु से निश्चयपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक सीखना चाहिए। भागवत धर्म का प्रमुख लक्षण है सत्संगती। सद्गुरु
भी असत्संगति का त्याग करने के लिए यही उपदेश देते हैं।
सर्वतौ मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु।
दयां मैत्रीं प्रश्रय च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३॥
मन में यदि सबसे निःसंग होने की इच्छा हो तो निश्चित रूप से सत्संग करना चाहिए और असत्संग
छोड़ देना चाहिए। देह संगति ही मुख्य असत्संग है। इसलिए उसे समूल वर्जित करना चाहिए। हे राजेश्वर!
सत्संगति ही सामर्थ्यवान है यह बात ध्यान में रखो। जहाँ दया, मैत्री और विनय इन तीन लक्षणों का पूर्णत्व के
साथ वास दिखायी दे उस पुरुष की संगति को 'सत्संग' कहना चाहिए। 'स्वहित' सिद्ध करने के लिये
'सत्संग' अत्यन्त आवश्यक है। बड़प्पन छोड़ कर साधु की शरण में लीन होना चाहिये। देहाभिमान त्याग कर
उन्हें साक्षात् दण्डवत करना चाहिए। संसार में साधु से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। संतों का पूजन करने से स्वयं
देवताओं को भी सन्तोष होता है। पूरी श्रद्धा से संतों की चरण रज को सर पर धारण करना चाहिये। संतों के
सामने अपनी बुद्धि की शेखी नहीं बघारनी चाहिये। संतों का समुदाय देखकर वे भगवत्स्वरूप हैं ऐसा भाव
एकनिष्ठा से धारण करना चाहिये। ऐसी भगवद्भावना से विनम्र होने को ही 'प्रश्रय' अथवा विनय कहते हैं।
विनम्रतापूर्वक संत चरणों की सेवा करते रहने से भूतदया की वृद्धि होती है। यही 'दया' का प्रमुख लक्षण है।