श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किसी अन्धे के घूर कर देखने की तरह है। वासना के मल से मलिन हुए मन को भक्तिभाव से गुरु वचनों पर
विश्वास कर आत्मनिष्ठा से धोकर पवित्र करना चाहिए। जिस प्रकार अग्नि में डालने से सुवर्ण की गन्दगी जल
जाती है और वह शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार गुरुसेवा के कारण जड़त्व टूट जाता है और निर्दोष चित्तशुद्धि
प्राप्त होती है। जिस प्रकार शीशा साफ करने से अपना ही चेहरा साफ दिखायी देता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धि से
आत्मशुद्धि अपने आप हो जाती है। लोहा यदि पारस को ढँकता है तो वह अपने लौहत्व को खो देता है, उसी
प्रकार अंत:शुद्धि करने से स्थूलबुद्धि का लोप हो जाता है। सूर्यकान्त को सूर्य के सामने धरने से वह सूर्य के
तेज से प्रदीप्त होता है और वही तेज अग्नि के रूप में प्रकट होकर यज्ञ याग के काम आता है। उसी प्रकार
गुरुवचन से अंत:शुद्धि होने पर अंतर्बाह्य शुचिता प्रकट होती है। ऐसी शुचिता जो नहीं करते वे वास्तव में बहुत
बड़े ढोंगी हैं। शौच जाते समय यदि जल कम ले जाएँ तो हाथ गन्दे ही रह जाते हैं और गुदाद्वार भी साफ नहीं
हो पाता। उसी प्रकार विकल्पी लोग अपवित्र बने रहते हैं। अन्दर विष भरा हुआ किन्तु ऊपर से देखने में
अत्यन्त सुन्दर। ऐसे कटुफल को कोई नहीं स्वीकारता क्योंकि उसके भीतर अत्यन्त कटुता भरी रहती है।
धोबियों के राजा को यदि तीर्थ में नहलाया जाय तो क्या वह सचमुच ब्राह्मण बन जायगा ? नट राजा का स्वांग
करे तो वह अपनी बाह्य क्रियाओं से पूज्य नहीं हो जाता। लड़की कितनी भी सुन्दर और सुकुमार हो लेकिन
यदि उसके होठों पर कोढ़ हो गया हो तो कोई उससे विवाह नहीं करता। नीचे नग्न हो और मस्तक पर मोतियों
की बनी जाली पहन ले, अथवा नकटी लड़की नाक में आवदार मोती की नथ पहन ले तो वह जिस प्रकार
उसका उपहास होगा उसी प्रकार बाहर से पवित्रता दिखलाने पर उतनी ही विडम्बना होगी। कौवे के शरीर पर
दही का लेप करने से क्या वह राजहंस बन जायेगा ? दही समझ कर यदि रूई धुनने लगे तो मक्खन तो नहीं ही
निकलेगा लेकिन ठट्ठा अवश्य होगी। उसी प्रकार यदि अंत:करण में विकल्प हो तो बाहर से पवित्रता दिखाने के
लिए जो-जो क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, उससे हे राजा ! विडम्बना ही होती है। गुरुपदेश के अनुभव से अंत:करण
को निर्मल कर लेने पर और शास्त्रीय मार्ग से बाह्यांग स्वच्छ करने पर ही सच्ची पवित्रता आती है और वहीं
अद्वैत स्थिति का वास होता है। जब अंत:करण में पूर्ण पवित्रता का वास हो जाता है तो वह बाह्य कर्मों से प्रकट
होने लगती और वही पवित्रता अपने आप परमार्थ दशा को पहुँचाती है। ईश्वर भाव का यह रहस्य जिसे
आत्मसात होता है उसका कर्म ही ब्रह्मरूप हो जाता है और उसे देहभ्रम की बाधा नहीं होती। हे नृपश्रेष्ठ इसी
का नाम है, 'पवित्रता'। अब तप की स्थिति बताता हूँ सुनो। शरीरशोषण को तप कहते हैं लेकिन वह प्रारब्ध
भोग के अनुरूप होता है। हृदय में कृष्णस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करना यही तप का शुद्ध रूप है। जिस प्रकार
'वीरश्री' का मद आँखों पर चढ़ते ही वह पुरुष अपनी दृष्टि अग्रभाग पर केन्द्रित कर रण में पराक्रम करने के
लिये अग्रसर होता है, उसी प्रकार हृदय में ईश्वर को धारण कर जो संसार में विचरण करता है वही सच्चा
'तपस्वी' है। यही तप का सच्चा स्वरूप है और इसी का नाम है शुद्ध 'तप'। इससे अधिक इसके स्वरूप के
सम्बन्ध में कहना कठिन है। फिर व्यर्थ की बकवास किसलिये ? मुमुक्षु में द्वंद्व सहिष्णुता होनी चाहिये। इसी का
नाम 'तितिक्षा' है। हे नृपवर्य ! स्मरण रखने के लिये उसे भी सुन लो। दीवार पर बने शेर और शेरनी के चित्र के
बीच में एक दीवार ही रहती है उसी प्रकार सुख और दुःख इन दोनों भोगों के बीच भी अपना ही शरीर अखण्ड
रहता है। जिस प्रकार दावाग्नि से अथवा ग्रीष्म की तपन से आकाश नहीं झुलसता, वह तपन से अलिप्त ही
रहता है पानी ठंडा हो या बर्फ ही गिरती रहे लेकिन पृथ्वी अपनी सहनशीलता के कारण काँपती नहीं है उसी
प्रकार आत्मस्वरूप के सुख के कारण सच्चा साधु भी द्वंद्व में लिप्त नहीं होता, शरीर ठंडक से ठिठुरता भी हो तो