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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 869 में से

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८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाद जिस प्रकार कन्या बाप के कुलगोत्र को छोड़ देती है उसी प्रकार दम की सहायता से इन्द्रिय विषय का त्याग
करते हैं। कहीं 'वाणी' बहकना न शुरू करे इसलिये उसे 'सत्य' की बेड़ी पहनाकर अत्यन्त शुद्ध और स्थिर कर
देते हैं। "जो सत्यवक्ता है उसे ब्रह्मादि देवता भी वन्दन करते हैं और असत्य बोलने वाले को अधोगति प्राप्त
होती है।" इस आशय का जो प्रतिपादन करते हैं, वे भी झूठ बोलते हैं। लेकिन रामनाम के बार-बार उच्चारण
करने से जो वाचा पवित्र हो जाती है, वह भविष्य में कभी भी कल्पांत में भी असत्य में नहीं डूबेगी। मथ कर
निकाला हुआ मक्खन पुनः मट्ठे में डालने पर भी वह उसमें नहीं डूबता उसी प्रकार नाम से वाणी पवित्र होने पर
असत्य कभी उसका स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार सूर्य के किरण लगते ही घी की कनी पिघलने लगती है उसी
प्रकार सत्य के निश्चय के सामने असत्य चौंधिया जाता है और समूल नष्ट हो जाता है। चन्दन वृक्ष के सात्रिध्य
से खैर और बैर के वृक्ष भी अपने सामान्य काष्टगुण से वंचित होकर चन्दनरूप हो जाते हैं उसी प्रकार नाम के
गजट से वाणी में निजसत्व प्रगट होता है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से जुगनू लुप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार
रामनाम के प्रभाव से असत्य का अपने आप लोप हो जाता है। अमावस्या के बाद प्रतिपदा को जब चन्द्रमा अँधेरे
को हटाकर प्रगट होता है तब प्रकाश का समूह संसार में प्रगट होता है। उसी प्रकार असत्य का प्रभाव होने के
कारण वाणी भी सत्य के संभ्रम से प्रगट होती है या जिस प्रकार राजा की आज्ञा से प्रजा भी अपने धर्मानुसार
आचरण करती है। सत्य से अच्छा कोई तप नहीं है, सत्य से अच्छा कोई मार्ग नहीं है क्योंकि सत्य से सद्रूप की
प्राप्ति होती है और सत्य से ही साधक निष्पाप हो जाते हैं। इस प्रकार काया, वाचा तथा मन से जो शम, दम और
सत्य इन तीन प्रकारों से नियमों का पालन करता है, उसके विषय तत्काल भाग जाते हैं। इस प्रकार का स्वार्थ
साधने के लिये अंतःकरण में भगवच्छास्त्र के प्रति रुचि रखनी चाहिये। लेकिन द्वेषभावना से दूसरे शास्त्रों की
निन्दा भी नहीं करनी चाहिये। एक की स्तुति और दूसरे की निन्दा करने से दोष लगता है। इसलिये साधक निन्दा
की राह पर नहीं चलते। अर्धांगी लक्ष्मी का वन्दन करें और पैर से गंगा निकली है इसलिये क्या उसकी निन्दा
करें ? अपनी माँ को नमस्कार करना तथा अन्य स्त्रियों को लतियाना क्या उचित है ? अपने आराध्य देवता का
भजन करना चाहिये किन्तु वह भी निन्दा और स्तुति इन दोनों को त्याग कर जो निजसत्य धारण कर मौन का
आश्रय लेता है वही ब्रह्मज्ञान का अधिकारी होता है। इतना प्रयास न कर, कष्ट न सहकर यदि एकनिष्ठा से
भगवद्भक्ति की जाय तां हरि भक्तों को अनायास ही मुक्ति प्राप्त होती है। हे राजा ! उस भक्ति का सच्चा स्वरूप
क्या है और हरिभक्त किस प्रकार सुलभ ढंग से परमपद प्राप्त करते हैं, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः।
जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम् ॥ २७॥
भक्ति का मुख्य साधन यह है कि श्रीहरि का दिव्य जन्म, दिव्य गुण तथा दिव्य कर्म आदि का पूर्ण श्रद्धा
से श्रवण किया जाय और आनन्दपूर्वक कीर्तन किया जाय। हरिकीर्तन के सामने अन्य सभी साधन बिलकुल
निम्न श्रेणी के हैं। हरि की लीलाएँ अत्यन्त महान और अद्भुत हैं। उनका गायन करने से मन को अत्यन्त प्रसन्नता
होती है। समुद्र में पाषाण तैराये, हाथ से गोवर्धन पर्वत उठाया, बिना किसी की नींद खराब किये मथुरा को
द्वारका ले आये। गुरु के मृत पुत्र को जीवित कर दिया, मुख से दावाग्नि निगल लिया, माँ के सन्तोष के लिये
कंस द्वारा मारे हुए उनके गर्भों को लाकर दिखलाया। अजन्मा होते हुए असंख्य जन्म लेने वाला, अकर्मा होते हुए
अद्भुत कर्म करने वाला तथा अगुणी होते हुए गुणों में विचरण करने वाला वह श्रीपति, उसके गुणकर्मों का वर्णन