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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिए भी रुके बिना सौ वर्ष तक निरन्तर बरसता रहता है। बिजली अपने तेज से सम्पूर्ण आकाश को जला डालती
है। उसके गर्जन से काल की भी घिग्घी बँध जाती है। इस प्रकार प्रलयकाल में मेघ उन्मत्त हो जाते हैं। इससे
अपार जल का संचय होता है। वह इतना अधिक हो जाता है कि जहाँ से मेघ बरसते हैं, उसे भी मिलाकर
समस्त त्रैलोक्य जलमय हो जाता है। ऐसे उस मेघ को 'सावर्तक मेघ' कहते हैं। उसकी वृष्टि अद्भुत रहती है।
उस समय तीर्थ, क्षेत्र, पवित्रोदक, नदियाँ और समुद्र सब एक हो जाते हैं। चन्द्र, सूर्य आदि के साथ तीनों लोक
उस जल में डूब जाते हैं। अरे! ऐसे उस ऐक्यसमुद्र में परमेश्वर का विराट् देह भी विलीन हो जाता है। हे राजा!
उस समय साकार जैसी कोई वस्तु शेष नहीं रहती।
ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप।
अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२॥
श्लोक १२—प्रलयकाल में महाभयंकर पानी ऐसे उल्हास से उछलता है कि वह समस्त दृश्य पदार्थों का
विनाश कर डालता है। उस समय विराट् पुरुष का शरीर भी पिघल जाता है। ईंधन समाप्त होने पर जिस प्रकार
अग्नि अपने पूर्व स्वरूपं में चला जाता है, उसी प्रकार विराट् शरीर का अभिमानी 'वैराज' पुरुष अव्यक्त में
अर्थात् प्रकृति में प्रवेश करता है। जो कोई ब्रह्मलोक में रहने वाले होते हैं, उन्हें महाप्रलय के समय ब्रह्मदेव के
ही साथ मुक्ति मिलती है ऐसा श्रुतिस्मृति का वचन है। जिसे 'वैराजपुरुष' कहते हैं वह 'हिरण्यगर्भ' ही है। उसे
भी प्रलयकाल में अव्यक्त में प्रवेश करना पड़ता है। तो फिर ब्रह्मदेव के साथ वहाँ के लोगों को मुक्ति मिलती है,
ऐसा जो श्रुति में कहा गया है, उस वचन की क्या व्यवस्था की जाए? (अन्तरिक्ष बताते हैं-) राजा जनक ने
जिस माया का स्वरूप पूछा है, उस माया की शक्ति इतनी दुर्धर है कि यदि भगवद्भक्ति न की जाए तो ब्रह्मदेव
को भी वह मुक्ति नहीं मिलने देती। ब्रह्मलोक प्राप्त होने पर भी यदि भगवद्भक्ति न की जाए तो मुक्ति दुर्लभ
है। निश्चय ही भक्ति के पास मुक्ति दासी की तरह रहती है। भगवद्भजन न किया जाए तो ब्रह्मदेव को भी मुक्ति
नहीं मिलती तो परमार्थ में लगे अन्य ज्ञानाभिमानी लोगों की क्या बात की जाए ? जिसे जिस पद का अभिमान
रहता है, उसके लिए वही दृढ़ बन्धन होता है। इसलिए त्रिभुवन में मोक्ष दुर्लभ हो गया है। इसलिए स्वयं शंकर
भी अपने कैलास पद का अभिमान छोड़कर दिन रात महाश्मशान में (काशी क्षेत्र में) रहकर भगवद्भजन में
लीन रहता है। इसलिए हे राजराजेश्वर ! ब्रह्मलोक प्राप्त होने पर जो वहाँ भी भगवद्भक्ति करते हैं, उन्हें ही प्रलय
के अन्त में मुक्ति प्राप्त होती है। ब्रह्मलोक में रहकर जो हरि की भक्ति नहीं करते, वे पुनरावृत्ति के फेर में फँस
जाते हैं। ऐसी माया की शक्ति अत्यन्त दुर्धर है। सारांश यह कि यदि भक्ति न की हो तो मुक्ति किस बात की ?
इसी अर्थ का ब्रह्मदेव का वचन (भागवत में) दो श्लोकों में है। उसका भावार्थ यह है, "ज्ञानाभिमानियों का
पतन होता है और भक्तों को संसार बन्धन की कभी बाधा नहीं होती। श्लोक इस प्रकार है—"
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्त भावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ १॥
तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद्भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः ।
त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभु ॥ २॥
(भागवत, द० स्कं० पूर्वार्द्ध अ २)
भगवद्भक्ति न करने पर ज्ञानीजनों को भी मुक्ति नहीं मिलती। इसी अर्थ के दृष्टांत के लिए ब्रह्मदेव का

तृतीय अध्याय ६७
भाषण यहाँ दिया हुआ है। जन्म में श्रेष्ठ ब्राह्मणजन्म और वह भी वेदशास्त्र सम्पन्न, ऐसा होने पर भी
भगवद्भजन न करने पर उसका भी निश्चित रूप से पतन होता है। भक्तों की समस्त प्राणियों के प्रति
भगवद्भावना ही होती है, इसलिए वहाँ विघ्नों को स्थान ही नहीं मिलता क्योंकि विघ्न का अर्थ है हानि। लेकिन
वही उनके लिए उपाय बन जाता है क्योंकि भावार्थ के लिए ईश्वर सदा सहायक होता है। भक्ति के बिना मुक्ति
की चाह कर प्रयत्न करने से वह प्रयत्न निष्फल होता है। अस्तु। अब वर्तमान प्रकरण (प्रलय) के सम्बन्ध में
बात करें। बैराजपुरुष भी अव्यक्त में प्रवेश करता है। वैराज का अव्यक्त में प्रवेश होते ही महाभूत विलास
(अथवा विनाश) शुरु होता है और भूतों का ह्रास् होने लगता है। राजा! उनका 'अनुप्रवेश' अर्थात् एक में दूसरे
का विलय किस प्रकार होता है उसे क्रम से सुनाता हूँ।
वायुना हृतगन्धाः भूः सलिलत्वाय कल्पते।
सलिलं तद्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते॥ १३॥
प्रलयवायु का प्रक्षोभक क्रोध पृथ्वी का गन्ध हरण कर लेता है। इसलिए पृथ्वी वहीं घुलकर चारों ओर
पानी ही पानी हो जाता है। इसके बाद वायु का भयंकर क्षोभ होकर वह जल का रस नष्ट कर डालता है।
इसलिए प्रलय के महातेज में धीरे-धीरे जल का ह्रास हो जाता है। उस तेज के स्वाभाविक गुण से, वायुबल से
तम अर्थात् अन्धकार फैल जाता है। उस समय आकाश में प्रलय वायु ही भर जाता है। उस प्रलय वायु का स्पर्श
गुण और चपलता को आकाश स्वाहा कर देता है। अर्थात् सम्पूर्ण वायु का आकाश में विलय होता है।
ह्तरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते।
हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४॥
कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लोयत।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप।
प्रविशन्ति ह्यहङ्कारं स्वगुणैरहमात्मनि॥ १५॥
आकाश के शब्दगुण को वह प्रलयकाल पूरी तरह निगल लेता है। तब तामस अभिमान क्षुब्ध होकर
समस्त आकाश को पी जाता है। दशेन्द्रियों का समुदाय राजस अहंकार में प्रवेश करता है और चित्त चतुष्ट का
मेला सात्विक अहंकार में प्रवेश करता है। हे राजश्रेष्ठ! इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवताएँ मिलकर सात्विक
अहंकार में प्रवेश करती हैं, यह जान लो। इसके बाद त्रिगुणों के साथ वे तीनों अहंकार महत्तत्व में मिल जाते
हैं और जिस प्रकार कन्या अपने बालबच्चों को लेकर अपने मैके आ जाती है, उसी प्रकार महत्तत्व भी माया से
मिल जाते हैं। मुर्गी जिस प्रकार अपने चूजों को अपने पंखों के नीचे छिपा लेती है और लगता है कि वह
अकेली बैठी है उसी प्रकार कल्पांत के समय माया अकेली बच रहती है। इस प्रकार उत्पत्ति-स्थिति और
प्रलय तक माया के तीन रूप दिखला दिये। ऐसी वह त्रिगुणात्मक माया मिथ्याभूत अर्थात् न होते हुए भी
दिखाई देनेवाली है। बच्चे जिस प्रकार खेल खेलते समय दिन में ही 'रात हो गयी' कहते हैं, उसी प्रकार पूर्ण
स्वरूप में माया की त्रिविध कल्पना करते हैं।
एषा माया भगवतः स्रर्गस्थित्यन्तकारिणी।
त्रिवर्णा वर्णितास्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ १६॥

६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीन लोकों में उत्तम, मध्यम और अधम, तीन अवस्थाएँ यथा जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति, स्वर्ग-मृत्यु-पाताल
ये तीन लोक, संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण ये तीन कर्म, सत्त्व-रज-तम ये तीन गुण ये सब माया के कार्य हैं—
ध्येय-ध्याता-ध्यान; पूज्य-पूजक-पूजन; ज्ञेय-ज्ञाता-ज्ञान यह त्रिपुटी भी माया की ही है। दृश्य-द्रष्टा-दर्शन;
कर्म-कर्ता-क्रियाचरण; भोग्य-भोक्ता-भोजन, यह त्रिपुटी भी माया की ही है, यह समझ लो। शब्द-श्रोता-श्रवण;
घ्रेय-घ्राता-घ्राण; रस-रसना-रसास्वाद, यह त्रिपुटी भी माया की ही है। कर, क्रिया और कर्ता; चरण, चाल और
चलता; वाक-वाचा-वदविता ये तीन अवस्थाएँ भी माया की ही हैं। अहं, सोहं और जड़मूढ़ता; साधक, साधन
•और साध्यता; देवी, देव और परिवार देवता, ये तीन प्रकार भी माया के ही हैं। देह, देही और देहाभिमान; भव,
भवमय और भवबन्धन; मुक्त, मुमुक्षु और अज्ञानी यह घटना भी माया की है। सुख, दुःख और जड़त्व; व्याधि,
समाधि और व्युत्थान; उत्पत्ति, स्थिति और मृत्यु इन सारे लक्षणों से माया का ही विकास होता है। आकाश में
चारों ओर नीले रंग का आभास होता है लेकिन वहाँ नीले रंग का अस्तित्व भी नहीं होता, उसी प्रकार
आत्मस्वरूप में माया का मिथ्या आभास होता है। मृगजल जिस प्रकार प्रत्यक्ष दिखाई देता है, लेकिन वह केवल
चिलचिलाती धूप ही रहती है, उसी प्रकार स्वरूप में माया प्रबल हुई दिखाई देती है, लेकिन मूल में कुछ भी
विभासित नहीं होता। माया मिथ्या है लेकिन कल्पना के कारण वह प्रबल मालूम होती है। उसका विनाश किया
जा सके ऐसा उसका स्वरूप ही नहीं है। पर नामरूप की तड़क-भड़क से उसने ब्रह्मादिकों को पागल बना रखा
है। उसने ही मिथ्या त्रिपुटी के विस्तार से सम्पूर्ण त्रैलोक्य को बन्धन में डाला हुआ दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार
दीपक के साथ छाया दिखाई देती है, लेकिन उसे नष्ट करने जाओ तो वह दिखाई नहीं देती उसी प्रकार
स्वस्वरूप में माया मिथ्या है और उसका विनाश करना देवताओं के लिए भी कठिन हो गया है। जिस प्रकार देह
के साथ छाया मिथ्या रहती है, उसी प्रकार ब्रह्मा में माया मिथ्या है। वह कल्पना के कारण ही विस्तार पाती है
इसलिए वेदशास्त्र उसे 'अजेय' मानते हैं। राजा! जहाँ कल्पना बढ़ती है वहीं माया का मूल है। राजा! जिसे
कल्पना कहते हैं, वही मुख्य माया है, इसे ध्यान में रखो। माया का निरूपण करते समय इससे अच्छा रूपक नहीं
मिलेगा। त्रिविध लक्षणों से युक्त माया तुम्हें विशद रूप से बतायी। राजा! अब तुम्हें और क्या श्रवण करने की
इच्छा है? माया भयंकर है और उसे पार करना कठिन है, यह सुनकर ऋत्विज, ब्राह्मण और सभा के सभी लोग
थर-थर काँपने लगे। राजा को भी आश्चर्य हुआ। माया का स्वरूप विचित्र है, ज्ञानी लोग भी उसका निवारण
करने में समर्थ नहीं हैं। जिसके जाल में ब्रह्मदेवादिक भी फँसे हुए हैं वहाँ दूसरों की क्या बिसात है? माया ने शिव
का भी आकलन कर उसे जीवदशा में ला दिया है। ऐसी इस माया को साधारण जन भी पार कर सकें ऐसा उपाय
इनसे पूछिए। राजा ने इसी आशय से उनसे आग्रहपूर्वक प्रश्न किया।
राजोवाच
यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः।
तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्॥ १७॥
हरि की माया अत्यन्त कठिन है, यह सुनकर राजा को हँसी आ गयी। वह मिथ्या ही सही लेकिन
देहाभिमानी को बाधक होने में समर्थ बनी। माया दुस्तर है यह शास्त्र प्रसिद्ध है लेकिन जो सीधे-सादे, भोले-
भाले हैं और बुद्धि से मन्द हैं, वे किस उपाय से तर सकेंगे इसका कोई निश्चित उपाय बताइए। जो अपने मन
को वश में नहीं कर पाये हैं किन्तु जिनका संसार सागर को पार करने का दृढ़ निश्चय है, ऐसे भोले-भाले लोग

तृतीय अध्याय ६९
होंगे उनके लिए माया को पार करने का कोई सरल उपाय हो तो बताइये। पहले कवि ने संक्षेप में बतलाया है
कि 'तन्माययाऽतोबुध आभजेति' गुरु और ब्रह्म एकरूप हैं ऐसी अभेद भाव से भक्ति करने पर माया को पार
किया जा सकता है। उस भक्ति का स्पष्ट लक्षण मालूम हो और माया को तरने का भी उपाय मालूम हो, यही
इस प्रश्न को पूछने का कारण है। उसी उपाय का सुगम साधन बताने के लिए अन्तरिक्ष का छोटा बेटा 'प्रबुद्ध'
बोलने लगा।
प्रबुद्ध उवाच
कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च।
पश्येत्पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १८ ॥
जो प्रबुद्ध अर्थात् ज्ञानी होता है, वही माया से तरने की बात पूरी तरह से जानता है। हम भी प्रबुद्ध अर्थात्
ज्ञानसम्पन्न होने पर माया के बन्धन से छूट सकते हैं। मन में विषय का छन्द रहना यही मुख्य बन्धन है।
इसलिए जो विषय का अर्थात् विषयासक्ति का त्याग करता है वही प्रबुद्ध अर्थात् ज्ञानी है। यही आशय अब
स्पष्ट करके बताता हूँ, सुनिए। यदि मन विषय में लुब्ध होकर रह गया और पूर्ण वैराग्य नहीं हुआ तो माया को
पार करना सम्भव नहीं होगा। इसलिए वैराग्य की ओर प्रवृत्ति मुड़े इसलिए विषयों की निन्दा करते हैं। विषय
नाशवान हैं, किन्तु मूर्ख उसे ही बड़ा सुख मानते हैं, लेकिन वह सुख ही दुःखदायी होता है। विशेषरूप से
स्त्रीविषयक इच्छा से ही माया पीछा करती है। पास का धन खर्च कर सुख के लिए स्त्री को लाकर उसे घर की
मालकिन बनाकर रखते हैं, लेकिन वही स्त्री करोड़ों दुःखों का भोग कराती है। संसार में स्त्री की अभिलाषा से
ही माया को बल प्राप्त होता है। स्त्री कामना से ही संसार बढ़ता है, स्त्री कामना से महद् दुःख प्राप्त होता है।
सारांश, स्त्री कामना से सारा संसार मोहित हो गया है। बड़े प्रेम से स्त्री को पीढ़ी पर बिठाते ही वह संसार को
करोड़ों गुना बढ़ाती है। स्त्रीकामना ही महामोह की गाँठ बाँध कर दुःख के सागर में ढकेल देती है। जो माता नौ
महीने उसे अपने उदर में पालती है, उसे दूर कर पत्नी को परम निकट का मानते हैं। इस प्रकार माया
स्त्रीकामना से प्रबल होती है। जो अपने मुँह का ग्रास उसे खिलाती है, उसकी गन्दगी साफ करती है उस माता
की अपेक्षा स्त्री माया के कारण जगत में अपनी बन जाती है। मिलने को तो हजारों स्त्रियाँ मिल सकती हैं
लेकिन पूरे त्रिभुवन में माँ खोज कर भी नहीं मिलेगी। यह बात जिन ज्ञानियों को मालूम रहती है, वे भी स्त्री को
सिर पर बिठाते हैं। माँ की सेवा करने से भुक्ति और मुक्ति मिलती है और स्त्री की सेवा करने से नरकप्राप्ति
होती है यह बात भी जो शास्त्रज्ञ जानते हैं, वे भी स्त्री की कामना से माता की उपेक्षा करते हैं। इस प्रकार
स्त्रीकामना के विस्तार से माया सारे त्रिभुवन में फैल रही है। उसने ज्ञान सम्पन्न लोगों को भी भ्रम में डाल रखा
है। सचमुच स्त्रीकामासक्ति ही महामाया है। देखो! विषय को सुख मानकर काम्य कर्म करने से लोग अत्यन्त
दुःखी होते हैं क्योंकि काम्य कर्म दुःखदायक ही है। स्त्री कामना के कारण गृहासक्ति बढ़ती है और गृहासक्ति
के कारण प्राणी स्वयं ही अपने को कष्ट में डाल देता है। हे राजाधिराज! उन कष्टों के कारण अन्त में क्या
स्थिति होती है, वह भी तुम्हें बताता हूँ। निर्मल पानी लेकर दीवार पोंछने लगो तो पानी का निर्मलपन नष्ट होकर
वह गन्दा हो जाता है, हाथ कीचड़ से सन जाते हैं और दीवार का पलस्तर खराब होकर वह खुरदुरा हो जाता
है। उसी प्रकार ब्रह्मदेव आदि देवताओं को भी विषयसुख से सुख नहीं प्राप्त होता। ऐसे विषय को जो आनन्द
मानते हैं, वे महामूर्ख अथवा पशु ही हैं।

७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभैनात्ममृत्युना।
गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥१९॥
रात-रात भर मर कर कष्ट किया लेकिन उससे कौड़ी की भी प्राप्ति नहीं हुई। सारांश, धन प्राप्त करने के
लिए प्राणान्त कष्ट करने पड़ते हैं और ऐसे कष्ट से धन प्राप्त भी किया तो वह महादुःख का ही कारण बनता है।
धन अनर्थ का मूल है। अपने सर्वनाश का भी वही कारण है। धन न रहने पर उसे प्राप्त करने के लिए परिश्रम
करना पड़ता है। मिलने पर उसके सुरक्षा की चिन्ता करनी पड़ती है। प्राणि के लिए रात दिन हृदयरोग ही लग
जाता है। द्रव्य का लोभ अविश्वास से रहने के लिए बाध्य करता है। माँ-बाप से चोरी करना सिखलाता है।
स्त्री-पुत्रों में कलह शुरू कराता है। इष्टमित्रों को दूर करता है। ऐसा यह धन का स्वाभाविक गुण है। धन के
पास आधिव्याधि, धन के पास दुष्ट बुद्धि, धन के पास लोभ और क्रोध होता है, धन के पास असत्य सदैव रहता
है, धन के पास अनेक विकल्प होते हैं, धन पाप का केन्द्र बिन्दु होता है। सारांश, धन पूर्णरूपेण दुःख रूप ही
है। वही धन दानधर्म में खर्च करने से उसका उत्तम फल मिलता है लेकिन लालची व्यक्ति को वह नरक ले
जाता है। इस धन की तरह खराब वस्तु सारे त्रिभुवन में कोई नहीं है। नलिका में रखे चने की लालच में बन्दर
नलिका में हाथ डालकर अपना हाथ फँसा लेता है। उसी प्रकार कनककांता की अभिलाषा ही नरदेह को उस
दशा में पहुँचाती है। देखो, धन सहज ही नहीं मिल जाता और अगर मिल भी जाय तो अनीति से मिलने के
कारण हानिकारक होता है। इसलिए धन में सचमुच ही सुख नहीं है। लोग काफी सम्पत्ति खर्च कर बड़े शौक से
घर बनवाते हैं, लेकिन वह टिकाऊ न होने के कारण जल्दी ही गिर जाता है और धन के साथ-साथ जीवन भी
व्यर्थ चला जाता है। जीवन नष्ट कर, वीर्य खर्च कर पुत्र उत्पन्न करता है, वह पुत्र मर जाता है और दुःसह दुःख
के सागर में डूब जाता है। गृहस्थी में सभी सुहृद जब तक उनका स्वार्थ रहता है तब तक सगे-सम्बन्धी होकर
रहते हैं। लेकिन जब स्वार्थ का विरोध होने लगता है तो शत्रु बनकर चोट करने से नहीं चूकते। बड़ी हवस के
साथ गौ, घोड़े आदि अनेक प्रकार के पशु एकत्र करते हैं, इतने में वे पशु मर जाते हैं। उस दुःख से गृहस्थों को
कष्ट होता है। जब हमारा देह ही अशाश्वत है तो उससे खड़ा किया हुआ प्रपंच कैसे शाश्वत हो सकता है ? सारे
जगत को ही काल ने ग्रस लिया है। इस लोक में सभी विषय के ही जाल में फँसे हुए हैं। मनुष्यदेह कर्मभूमि में
आया हुआ है। यहाँ यज्ञ आदि कर्म करके उन कर्मों ने स्वर्ग को भी जीत लिया ऐसा कहते हैं। लेकिन जब यहाँ
इहलोक नश्वर है तो स्वर्ग भी वैसे ही नश्वर होगा।
एवं लोक परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम्।
सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥२०॥
मन में विषय भोग की इच्छा धारण कर इस जगत में यज्ञ करते हैं और पर्याप्त पुण्य प्राप्त कर उस पुण्य के
योग से स्वर्ग जाते हैं। स्वर्गसुख का अधिपति इन्द्र है लेकिन वह भी कहीं मेरा पतन न हो जाए इस भय से
आक्रान्त रहता है। तपस्वी लोगों पर वह विघ्न ढाता है। कुल मिलाकर स्वर्ग की स्थिति हानिकारक ही है। इस
प्रकार अपने पुण्य से स्वर्ग प्राप्ति होती है इसलिए उस स्वर्गलोक को 'पुण्यजित लोक' कहते हैं। लेकिन
पुण्यक्षय होते ही उनका भी क्षय होता है। इसलिए स्वर्ग के श्रेष्ठ पुण्यवानों को भय लगा रहता है। गाँठ में उत्तम
पुण्य होने पर स्वर्ग के भोग में अच्छा सुख प्राप्त होगा, यह कहना भी निखालस गलत है। हे राजा! उस स्वर्ग के
दुःख बताता हूँ, सुनो। जिनके पुण्य समसमान होते हैं, उन्हें समसमान पदों की प्राप्ति होती है। वे परस्पर स्पर्धा

तृतीय अध्याय ७१
और कलह करने लगते हैं। उसके मन में रात-दिन द्वेष जगाते हैं। जिस प्रकार इस लोक में मण्डलवर्ती राजा
राज्य के लालच से कलह करते हैं उसी प्रकार स्वर्ग में रहने वालों में भी कलह मचा रहता है और उस द्वेष से वे
अत्यन्त दुःखी रहते हैं। कहीं मेरा पतन न हो जाए इस भय से उनका झुकाव कलह और द्वेष की ओर रहता है।
इससे उनका अर्जित किया हुआ पुण्य नष्ट हो जाता है और बेचारे याज्ञिक अधोमुख होकर धराशायी हो जाते हैं।
(अर्थात् पृथ्वी पर जन्म लेते हैं) इस प्रकार जो स्वर्गसुख को आनन्द मानते हैं वे शुद्ध पशु हैं क्योंकि वहाँ द्वेष
और विनाश होता है और कलह तो नित्य चलता रहता है। वे किये हुए विषय का ही नित्य सेवन करते रहते हैं
किन्तु उनके मन की कभी तृप्ति नहीं होती। फिर भी यह मिथ्या है यह बात उनकी समझ में नहीं आती। यह भी
माया की ही मोहिनी शक्ति है। जिस प्रकार वेश्या धन लेने के बाद ग्राहक को दुत्कार कर निकाल देती है, उसी
प्रकार जो विषय से लिपट कर रहता है, उसे अधिक से अधिक दुःख प्राप्त होता है। इसलिए हे राजा ! जो दोनों
लोकों का भोग साधने में लगे रहे वे माया के योग से फँसते चले गये और उनका अधिकांश जीवन व्यर्थ गया
ऐसा समझो। कर्मभूमि में नरदेह खर्च करना यही भाग्य का सम्पूर्ण सार है। देवतागण भी नरदेह की कामना करते
हैं लेकिन वे भी विषय के चक्कर में व्यर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार विषयासक्ति ने अपनी माया से कितने लोगों
को ठगा होगा इसका हिसाब कौन जाने ? इसलिए विषय की विरक्ति उत्पन्न करने के लिए गुरुभक्ति करनी
चाहिए। वही कथा
तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥ २१॥
विषय क्षणिक हैं यह जानकर पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए पूर्ण श्रद्धा धारण कर अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाना चाहिए। हे राजा ! केवल सद्गुरु वचन से ही मैं यह माया तर जाऊँगा ऐसे निश्चय से वह
एकनिष्ठ भक्ति धारण कर अपने इष्ट की प्राप्ति के लिए मुमुक्षु उसके चरणों में लगता है। जिसे 'गुरु' कहते हैं
उनके भी अनेक प्रकार हैं। हे राजा ! वे प्रकार भी तुम्हें बताता हूँ। सुनो! एक वेदाध्ययन कराने वाले गुरु होते हैं,
कोई भाषण देने में निपुण होते हैं, कोई ज्योतिष शास्त्र में निपुण होते हैं, लेकिन बुद्धिमान लोग उन्हें 'गुरु' नहीं
कहते। कोई आगमोक्त मंत्रों की उपासना करते हैं, शिष्य को मंत्र देते हैं और उसका विधिपूर्वक जप करने के
लिए कहते हैं। किन्तु उससे आत्मानुभव की प्राप्ति कब होगी इसे गुरु शिष्य दोनों को ही मालूम नहीं रहता। कोई
वायुधारणा (प्राणायाम आदि) सिखलाते हैं कोई अन्य प्रकार के ध्यान करके बताते हैं। कोई हठयोग की आदत
डालते हैं। कोई मुद्रा लगाना सिखलाते हैं। कोई ब्रह्मसंवाद में पटु हैं तो कोई तत्व निरूपण में कुशल हैं और कोई
वैराग्य सम्बन्धी भाषण इतने उत्तम ढंग से करते हैं कि उससे दोनों भोगों से घृणा हो जाती है। वे शुद्ध ब्रह्म का
निरूपण इस प्रकार करते हैं कि उसे सुनकर मनुष्य में प्रेम के सोते फूट पड़ते हैं। किन्तु अपने अंतःकरण का भ्रम
कैसे जाएगा इसका मर्म उनकी समझ में नहीं आता। घानी में डाला हुआ गन्ना जिस प्रकार नीचे के बर्तन में रस
भरता रहता है और स्वयं घानी में करकराता रहता है उसी प्रकार केवल शब्द ज्ञानी ज्ञान के निरूपण में उत्तम
वक्ता रहता है। वह अपने वक्तृत्व से लोगों का अच्छा मनोरंजन करता है लेकिन स्वयं अलिप्त रहता है उसकी
रोजी रोटी अच्छी तरह से चलती रहती है। उसे लोगों में मनचाही प्रतिष्ठा मिलती है लेकिन ऐसे गुरु से उच्चश्रेणी
की आत्मप्राप्ति की उत्कंठा पूरी नहीं होती। जिस प्रकार केवल 'अमृत' का उच्चार करने भर से उसकी रुचि नहीं
मालूम होती, उसी प्रकार शाब्दिक ज्ञान से उसे अनुभव का लाभ नहीं मिल पाता। जिसने स्वयं ही स्वाद नहीं

७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चखा वह दूसरों को कैसे स्वाद चखाएगा ? इसलिए जो पूर्ण अनुभवी है, वही सद्भाव से शिष्य का उद्धार करता
है। इसी तरह गुरुत्व के अनेक प्रकार हैं। लेकिन जो शिष्य को अपरोक्षानुभव प्राप्त कराता है उसी को
'सद्गुरुस्वामी' कहते हैं। जिसके भाषण से 'असत्' असंतता का तत्वतः निःशेष अस्त हो जाता है तथा 'सत्'
का उदय होता है उसे ही वेदशास्त्रों ने सद्गुरुत्व कहा है। जो मंत्र तंत्र का उपदेश करते हैं वे भी पूज्यत्व की
दृष्टि से श्रेष्ठ ही होते हैं लेकिन जिसमें 'पूज्य' और 'पूजक' का भेद नहीं होता वही वास्तव में 'सद्गुरु स्वामी'
है। किसी में शुद्ध ब्रह्मज्ञान रहता है, ब्रह्मस्वरूप को देखकर उसका मन उसमें रम जाता है, द्वैत की भावना
समाप्त होकर चारों वाचाएँ मौन हो जाती हैं, सारी इन्द्रियाँ तटस्थ हो जाती हैं, प्राण जहाँ पंगु हो जाता है, अत्यन्त
अद्भुत परब्रह्म को देखकर जिसके देहभाव में तटस्थता आ जाती है, ऐसा जो भी कोई आत्मानुभवी रहता है,
उससे शिष्य विनती करता है लेकिन वह उससे न कुछ पूछता है और न कुछ बताता ही है। वह तटस्थ भाव से
मौन ही रहता है। किसी को ब्रह्म का अनुभव होता है, उसका बाध्य-बाधकता का भ्रम भी नष्ट हुआ रहता है,
द्वैतभाव भी समाप्त हुआ रहता है, संसार में जिसके लिए कोई विषमभाव नहीं रहता लेकिन उसका व्यवहार कुछ
विचित्र-सा रहता है। उसमें चिड़चिड़ापन रहता है, वह कुछ अजीब-सा काम करता रहता है, साथ ही वह अपने
स्वभाव में कुछ ऐसी उग्रता का प्रदर्शन करता है कि कोई उसके निकट नहीं जा सकता। वह अपने में ही हँसता
रहता है, परमार्थ को ध्वनि से अभिव्यक्त करता है लेकिन उससे शिष्य को किसी भी बात का बोध नहीं होता।
वह दुश्चिंता में पड़ जाता है। ऐसा जो ब्रह्मज्ञानी होता है, उसकी ब्रह्मस्थिति लोगों की समझ में नहीं आती। ऐसी
अवस्था में उसके पास ज्ञानप्राप्ति के लिए भक्तिभाव से कौन जाएगा ? हे राजा अब तुम्हें सद्गुरु के वास्तविक
लक्षण बताता हूँ। यदि अंतःकरण में श्रद्धाभाव लेकर सुनोगे तो सुखी हो जाओगे। जो काया, वाचा तथा मन से
दीनजनों पर कृपालु रहता है, शिष्य के भवबन्धन तोड़ देता है, जो अहंकार का अस्तित्व नष्ट करता है, उसी
प्रकार जो शब्दज्ञान में पारंगत रहते हुए सर्वदा ब्रह्मानन्द में लीन रहता है, वह अपने शिष्य का उसकी भक्ति के
अनुरूप प्रबोधन करने में समर्थ होता है। शिष्य की भक्ति के अनुसार उसे वैसा अनुभव देता है लेकिन मन में
गुरुता का जरा भी अहंकार नहीं रहने देता। शिष्य से सेवा लेने की कल्पना वह स्वप्न में भी नहीं करता, बल्कि
वह स्वयं ही शिष्य की सेवा करता है और उसे पूज्य मानता है। शिष्य को पुत्र के समान मानना चाहिए ऐसा
स्मृतिवचन है, उसके अनुसार वह शिष्य को गौण न मानकर उसकी ओर ब्रह्मभाव से ही देखता है। शिष्य अपनी
भक्ति के कारण उसकी सेवा करता है, लेकिन वह उसे सेवक नहीं मानता। जिसके लिए सभी भूत भगवद्रूप हैं
वह शिष्य को सेवक के रूप में कैसे देखेगा ? मैं एक महान योगी हूँ, ऐसी शेखी भी वह नहीं बघारता। गुरुता का
अहंकार कभी उभरने नहीं देता। स्वप्न में भी अपने निर्वाह का संकट शिष्य पर नहीं डालता। इतना ही नहीं
बल्कि शिष्य पर संकट आने पर वह तत्काल उसका निस्तारण करता है। मैं एक अकर्ता निजात्मयोगी हूँ यह
कहकर वह विषयों का न भोग ही करता है न उन्हें पूर्ण रूप से त्याग देने का ही आग्रह करता है। प्रारब्ध के
अनुसार जो भी भोग आते हैं उन्हें देह को सौंप कर वह स्वयं परब्रह्म योग में मग्न रहता है। देह पालकी में चढ़े
अथवा विष्ठा में गिरे लेकिन उसके लिए दोनों का ही सुख या दुःख नहीं रहता। देह में रहते हुए भी उसे देह का
अहंकार नहीं होता और घर में रहते हुए भी घर की आसक्ति नहीं रहती, अन्त में लौकिक दृष्टि से लोगों में रह
कर वह लोगों जैसा व्यवहार करता है। स्त्री उसे मेरा पति, पुत्र मेरा पिता और शिष्य उसे मेरा गुरु कहते हैं
लेकिन वह उन सबमें निराले ही ढंग से व्यवहार करता है। इस प्रकार पूरी तरह व्यवहार तथा आचरण कर वह
भक्ति करता है। भूतमात्र में हरि का ही दर्शन करना चाहिए, उसी का भजन करना चाहिए यही उपदेश वह अपने

तृतीय अध्याय ७३
शिष्यों को देता है। ये सद्गुरु के लक्षण हैं लेकिन ज्ञान के अहंकार के कारण वे पण्डितों की समझ में नहीं आते।
जो पूर्ण अनुभवी होते हैं वे ही इस रहस्य को जानते हैं, दूसरों का ज्ञान वहाँ पंगु पड़ जाता है इसके गुरुत्व की
महानता यह है कि उसमें पूर्ण शान्ति का वास रहता है। हे राजा! सद्गुरु का लक्षण यही है और मुख्य भूषण भी
यही है। संसार में शान्ति परदेसी हो गयी थी उसे निवास के लिये कहीं स्थान नहीं मिल रहा था इसलिये वह
सद्गुरु के चरणों में वास करने आयी। जिस प्रकार माँ के घर आने पर लड़की स्वेच्छा से विचरण करती है, उसी
प्रकार शान्ति भी आनन्दपूर्वक वास करने के लिए सद्गुरु के पास आती है। वेदशास्त्र का मर्म जानकर भी जो
विद्वत्ता की शेखी नहीं बघारता, जिसे आत्मानुभव से ही पूर्ण शान्ति प्राप्त हुई रहती है, वही निश्चित रूप से
सद्गुरु है। शायद श्रोतागण यह कहकर रुष्ट हो जाएँ कि व्यर्थ ही अनावश्यक विस्तार कर ग्रन्थ को बड़ा किया।
लेकिन 'निष्णात' शब्द का अर्थ लगाते समय ये सारी बातें ध्यान में आयीं। यह कोई मेरा अपना पांडित्य नहीं है
बल्कि सद्गुरु स्वयं ही पद-पद में अर्थ स्पष्ट कर मुझसे कहला रहे हैं। फिर भी सद्गुरु के लक्षण अगाध होने
के कारण उनका वर्णन करना कठिन है। वेद भी जहाँ पागल होकर मौन हो जाते हैं वहाँ मेरा बोलना कहाँ तक
काम आयेगा ? देखिये, कैसा चमत्कार है। मेरे सखा जनार्दन स्वामी प्रसन्न हुए इसलिए श्रीमद्भागवत देशी भाषा
में, अर्थात् प्राकृत में उत्तम रीति से प्रकट हुआ। एका जनार्दन की शरण में है। जब उसकी पूर्ण कृपा होती है तभी
गुरुभक्त देह में रहते हुए भी देह के बन्धन को स्पर्श नहीं करता। जिनके चरणों की सेवा करने से देह में रहते
हुए भी देह बन्धन की बाधा नहीं होती, उनकी शरण में अनन्य भाव से जाने पर जिस अगाध ज्ञान की प्राप्ति
होगी उसका पता वेदों को भी नहीं है। सद्गुरु भक्ति न करने से परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होगी, इसलिये
शिष्य के कल्याण के लिए ग्रन्थों में सद्गुरुभक्ति करने के लिये कहा गया है। इसलिए अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाना चाहिए ताकि वे अपने यथार्थ आत्मबोध बताकर शिष्य को सद्भावना से सन्तुष्ट कर सकें। राजा!
इस प्रकार सद्गुरु का लक्षण तुम्हें बताया। अब शिष्य का लक्षण बताता हूँ। ध्यान से सुनो।
तत्रभागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः।
अमाययाऽनुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदोहरिः ॥ २२ ॥
कितने ही शिष्य ऊपर से सात्विक दिखाई पड़ते हैं किन्तु अन्दर बड़े विकल्पी होते हैं। किसी को केवल
प्रतिष्ठा की चाह रहती है तो कोई स्वयं को ब्रह्मनिष्ठ समझ कर कर्म ही नहीं करते हैं। किसी को प्राणायाम
अच्छा लगता है, किसी को आसन का अभिमान रहता है, किसी के मन में सन्देह होने के कारण उसे पूर्ण
विश्वास किसी भी बात में नहीं होता। कुछ लोग बड़े आदरपूर्वक गुरु से उपदेश लेते हैं लेकिन मन में फलप्राप्ति
के सम्बन्ध में विकल्प रखते हैं। इस प्रकार शिष्यों के अनेक भेद हैं। लेकिन वास्तव में वे सारे ढोंगी होते हैं यह
ध्यान में रखो। अब सच्चे शिष्य के लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो। सच्चे शिष्य निष्कपट बुद्धिवाले, शुद्ध
सत्वगुणी तथा सच्चे परमार्थ साधक होते हैं। उनमें ढोंग नहीं होता। वे गुरुचरणों के सेवक, गुरुवचन पर बिके
हुए तथा सद्गुरु पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले होते हैं। सच्छिष्य सद्गुरु के वचनों के लिए अपने प्राणों
को भी न्योछावर कर देते हैं। गुरु की आज्ञा के बाहर वह तिलमात्र भी नहीं हिल सकता। सद्गुरु को जो केवल
मनुष्य बुद्धि से नहीं देखता, जो गुरु सेवा के लिए सदैव आनन्द से तत्पर रहता है, निजभाव से सेवा के लिये वह
अत्यन्त तत्पर रहता है, आठों पहर शरीर घिसना पड़े तो भी वह काम से जी नहीं चुराता। यह काम उच्च है या
यह काम नीच है ऐसी कल्पना भी उसके मन में नहीं आती। अपना नित्य का धर्मकर्म गौण मानकर वह गुरु की

७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सेवा को उत्तम मानता है। सेवा में किसी प्रकार का कपट न कर वह शुद्ध मन से उसे करता है। सेवा में कष्ट
जितना अधिक होता है, उतना ही उसका मन अधिक उल्हसित होता है। गुरु के लिए सच्छिष्य और असच्छिष्य
एक समान रहते हैं लेकिन जिसके हृदय में जैसा भाव रहता है उसी के अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। 'भावेषु
विद्यते देवो' यही उपदेश का सार है। अपने भाव के अनुसार ही फलभोग भोगना पड़ता है। अपनी बुद्धि के
अहंकार के बल पर मृत्यु से बचने के प्रयास में हिरण्यकशिपु मारा गया। मौका देखकर भगवान ने उसे समाप्त
कर दिया। लेकिन उधर प्रह्लाद को देखिये। देवाधिदेव मेरी रक्षा करने वाला है ऐसा उसका दृढ़ भाव था और
उसी भाव के कारण राजा ने उसे मारने के जितने भी प्रयत्न किये वे सब व्यर्थ गये। परमार्थ में ज्ञान का अभिमान
शुद्ध डाका है इसलिये जो सद्भाव से परिपूर्ण रहता है वही जन्म-मरण के बन्धन तोड़ डालता है। शिष्य की
परीक्षा करने वाला मैं ज्ञानी हूँ ऐसा अहंकार सद्गुरु को कभी नहीं होता बल्कि उसके प्रति जिसके मन में जैसी
भक्ति होती है वैसा वह फल पाता है। राजा! इसे रहने दो लेकिन देखो अच्छे शिष्य का सद्भाव कितना विचित्र
होता है। गुरु और ब्रह्म को वह ऐक्य भाव से मानता है। वह मानता है कि सद्गुरु मेरी इन्द्रियों का परिचालक,
मेरे हृदय में रहने वाली 'आत्मा' है तथा बाह्य सेवा करते समय सद्गुरु वास्तव में साक्षात 'ब्रह्ममूर्ति' है।
सद्गुरुचरणों में वह अपना तन-मन-धन अर्पण कर अपना प्राण भी उसे अर्पण कर देता है, अर्थात् सब कुछ
आत्मार्पण करता है। इससे सद्गुरु भी उस पर सन्तुष्ट होकर उससे मोहित हो जाते हैं और स्वयं स्वामी होते हुए
भी सेवक के अधीन हो जाते हैं। बलि ने सर्वस्व अर्पण कर दिया इसलिये भगवान उसके द्वार पर द्वारपाल
बनकर रह गये। भजन भक्ति का यह आनन्द है कि उसमें जो स्वामी रहता है वही सेवक के पास पहरा देता है।
जो उत्तम भक्त होते हैं वे भगवान की ऐसी अगाध प्रीति के पात्र बनते हैं, लेकिन यह लाभ भोले-भाले लोगों को
कैसे प्राप्त होगा? इसीलिए हर प्रकार से सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए ताकि वह प्रसन्न होकर शिष्य को
का उपदेश कर सके। जिस भजन से भगवान का भजन कर 'उत्तम भक्त' बने, उन सारे भागवतधर्मों
को सद्गुरु से निश्चयपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक सीखना चाहिए। भागवत धर्म का प्रमुख लक्षण है सत्संगती। सद्गुरु
भी असत्संगति का त्याग करने के लिए यही उपदेश देते हैं।
सर्वतौ मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु।
दयां मैत्रीं प्रश्रय च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३॥
मन में यदि सबसे निःसंग होने की इच्छा हो तो निश्चित रूप से सत्संग करना चाहिए और असत्संग
छोड़ देना चाहिए। देह संगति ही मुख्य असत्संग है। इसलिए उसे समूल वर्जित करना चाहिए। हे राजेश्वर!
सत्संगति ही सामर्थ्यवान है यह बात ध्यान में रखो। जहाँ दया, मैत्री और विनय इन तीन लक्षणों का पूर्णत्व के
साथ वास दिखायी दे उस पुरुष की संगति को 'सत्संग' कहना चाहिए। 'स्वहित' सिद्ध करने के लिये
'सत्संग' अत्यन्त आवश्यक है। बड़प्पन छोड़ कर साधु की शरण में लीन होना चाहिये। देहाभिमान त्याग कर
उन्हें साक्षात् दण्डवत करना चाहिए। संसार में साधु से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। संतों का पूजन करने से स्वयं
देवताओं को भी सन्तोष होता है। पूरी श्रद्धा से संतों की चरण रज को सर पर धारण करना चाहिये। संतों के
सामने अपनी बुद्धि की शेखी नहीं बघारनी चाहिये। संतों का समुदाय देखकर वे भगवत्स्वरूप हैं ऐसा भाव
एकनिष्ठा से धारण करना चाहिये। ऐसी भगवद्भावना से विनम्र होने को ही 'प्रश्रय' अथवा विनय कहते हैं।
विनम्रतापूर्वक संत चरणों की सेवा करते रहने से भूतदया की वृद्धि होती है। यही 'दया' का प्रमुख लक्षण है।

तृतीय अध्याय ७५
प्राणिमात्र का दुःख देखकर जिसके प्राण बेचैन हो उठते हैं वह किसी को दुःख देने का विचार स्वप्न में भी
नहीं कर सकता। जिससे स्वयं को दुःख होता है, ऐसा आचरण वह प्राणिमात्र के प्रति कभी भी नहीं करता।
जिससे स्वयं को सुख प्राप्त होता है, वही आचरण वह दीनों के प्रति करता है। वह समस्त प्राणियों पर समान
रूप से दया करता है, उन्हें कभी खराब शब्द नहीं कहता। प्राणिमात्र के दुःखों का जिससे निवारण हो तथा
उन्हें सुख प्राप्त हो ऐसे ही उपायों का वह चिन्तन करता है। प्राणिमात्र को दुरुक्ति कहने से, जिह्वा को काटने
के लिए तत्पर हो उठता है। प्राणिमात्र के प्रति दुर्भाव का चिन्तन करने पर वह अपने ही चित्त का निर्दलन
करने लगता है। प्राणिमात्र को दुःख होता है तो वह उनके लिए अपने प्राण बिछा देता है। सारे जीव उसे
दयार्द दृष्टि से अपने प्राणों से भी प्रिय लगते हैं। ऐसी पूर्ण करुणा का ही नाम 'दया' है। अब 'मैत्री' का
असाधारण लक्षण बताता हूँ। सुनो! सभी प्राणिमात्र के लिए सुहृदों के सिवा और कोई अपना नहीं है। इसलिए
मैत्री बिना किये ही अपने आप हो जाती है। विषयों के वियोग से वह खराब नहीं होती, विकल्पों से वह
टूटती नहीं है, सारांश यही है कि कितने ही बड़े संकट क्यों न आयें, लेकिन मैत्री वैसी की वैसी बनी रहती
है। प्राण जाने पर भी जो नहीं टूटती उसी का नाम मैत्री है। कल्पांत का घाव सामने देखते ही मित्र समुदाय
एकत्र हो जाता है। ऐसा आचरण करने से प्राणिमात्र के मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। उस श्रद्धा की व्युत्पत्ति के
सम्बन्ध में क्रम से बताऊँगा। श्रद्धा का लक्षण अत्यन्त विचित्र है। इसमें ब्रह्मदेव तथा चींटी एक समान मालूम
होते हैं। फिर भी यथोचित क्रिया कभी नहीं चूकती यह ध्यान में रखो। अर्घ्यपाद्यादि पूजन सभी प्रकार के दान
तथा सम्मान यह सब श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करना होता है। किसी को केवल अन्न ही दिया जाता है,
किसी को अन्न और वस्त्र, किसी को केवल सूखा अनाज, किसी को चारा और पानी तो किसी को पीने के
लिये केवल दूध देना चाहिये। संक्षेप में कहें तो जिससे उसे पूर्ण सुख प्राप्त हो, वह सब उसे पूरी श्रद्धा से
देना चाहिये। अनुचित श्रद्धा से किया हुआ कार्य सभी प्रकार से दुःखकर होता है। उदाहरण के लिए ब्राह्मण
को घास देना तथा गाय को पकवान परोसना अथवा श्वान को सिंहासन पर बैठाना और साधु को गन्दे गड्ढे
में बैठने के लिये कहना अनुचित श्रद्धा का लक्षण है। भले ही बाघ का उपवास हो जाय लेकिन उसे गोदान
नहीं देना चाहिये। गाय कीचड़ से लथपथ हो गयी हो तो तेल लगाकर नहीं नहलाना चाहिये। इन्द्रिय भले ही
देह के ही भाग हों लेकिन जैसे जिह्वा का कार्य नाक से नहीं होता उसी प्रकार सब प्राणियों की आत्मा भले ही
एक हो लेकिन उनकी पूजा उनकी योग्यता के अनुसार ही करनी चाहिये। योग्यता के अनुसार देने में क्रिया
भले ही भिन्न हो लेकिन अंतःकरण की श्रद्धा अभिन्न रहती है। भागवत धर्म का प्रमुख लक्षण यही है। समस्त
भूतों में भूतात्मा अभिन्न स्थिति में होती है इसलिए दया, मैत्री तथा साधु के प्रति भक्ति किस प्रकार प्राप्त
होगी? प्रबुद्ध ऋषि इसके लिये उपाय बताने लगे। साधकों को ब्रह्म प्राप्ति हेतु भागवत धर्म की स्थिति अगले
नौ श्लोकों में प्रबुद्ध राजा को बता रहे हैं।
शौचंतपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्ज्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयोः ॥ २४॥
परमार्थ साधने के लिये 'शुचिर्भूत' होना आवश्यक है। शुचिता के सिवा कभी भी स्वार्थसिद्धि नहीं हो
सकेगी। इसलिये हे राजा! शुद्ध शौच के अर्थात् शुचिता के लक्षण सुनो। अंतःकरण का मल धोये बिना बाह्य
शुद्धि नहीं होती। वासना के मल से म्लान हुए मन को स्वच्छ किये बिना अहंकार से बाह्य सफाई दिखाना

७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किसी अन्धे के घूर कर देखने की तरह है। वासना के मल से मलिन हुए मन को भक्तिभाव से गुरु वचनों पर
विश्वास कर आत्मनिष्ठा से धोकर पवित्र करना चाहिए। जिस प्रकार अग्नि में डालने से सुवर्ण की गन्दगी जल
जाती है और वह शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार गुरुसेवा के कारण जड़त्व टूट जाता है और निर्दोष चित्तशुद्धि
प्राप्त होती है। जिस प्रकार शीशा साफ करने से अपना ही चेहरा साफ दिखायी देता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धि से
आत्मशुद्धि अपने आप हो जाती है। लोहा यदि पारस को ढँकता है तो वह अपने लौहत्व को खो देता है, उसी
प्रकार अंत:शुद्धि करने से स्थूलबुद्धि का लोप हो जाता है। सूर्यकान्त को सूर्य के सामने धरने से वह सूर्य के
तेज से प्रदीप्त होता है और वही तेज अग्नि के रूप में प्रकट होकर यज्ञ याग के काम आता है। उसी प्रकार
गुरुवचन से अंत:शुद्धि होने पर अंतर्बाह्य शुचिता प्रकट होती है। ऐसी शुचिता जो नहीं करते वे वास्तव में बहुत
बड़े ढोंगी हैं। शौच जाते समय यदि जल कम ले जाएँ तो हाथ गन्दे ही रह जाते हैं और गुदाद्वार भी साफ नहीं
हो पाता। उसी प्रकार विकल्पी लोग अपवित्र बने रहते हैं। अन्दर विष भरा हुआ किन्तु ऊपर से देखने में
अत्यन्त सुन्दर। ऐसे कटुफल को कोई नहीं स्वीकारता क्योंकि उसके भीतर अत्यन्त कटुता भरी रहती है।
धोबियों के राजा को यदि तीर्थ में नहलाया जाय तो क्या वह सचमुच ब्राह्मण बन जायगा ? नट राजा का स्वांग
करे तो वह अपनी बाह्य क्रियाओं से पूज्य नहीं हो जाता। लड़की कितनी भी सुन्दर और सुकुमार हो लेकिन
यदि उसके होठों पर कोढ़ हो गया हो तो कोई उससे विवाह नहीं करता। नीचे नग्न हो और मस्तक पर मोतियों
की बनी जाली पहन ले, अथवा नकटी लड़की नाक में आवदार मोती की नथ पहन ले तो वह जिस प्रकार
उसका उपहास होगा उसी प्रकार बाहर से पवित्रता दिखलाने पर उतनी ही विडम्बना होगी। कौवे के शरीर पर
दही का लेप करने से क्या वह राजहंस बन जायेगा ? दही समझ कर यदि रूई धुनने लगे तो मक्खन तो नहीं ही
निकलेगा लेकिन ठट्ठा अवश्य होगी। उसी प्रकार यदि अंत:करण में विकल्प हो तो बाहर से पवित्रता दिखाने के
लिए जो-जो क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, उससे हे राजा ! विडम्बना ही होती है। गुरुपदेश के अनुभव से अंत:करण
को निर्मल कर लेने पर और शास्त्रीय मार्ग से बाह्यांग स्वच्छ करने पर ही सच्ची पवित्रता आती है और वहीं
अद्वैत स्थिति का वास होता है। जब अंत:करण में पूर्ण पवित्रता का वास हो जाता है तो वह बाह्य कर्मों से प्रकट
होने लगती और वही पवित्रता अपने आप परमार्थ दशा को पहुँचाती है। ईश्वर भाव का यह रहस्य जिसे
आत्मसात होता है उसका कर्म ही ब्रह्मरूप हो जाता है और उसे देहभ्रम की बाधा नहीं होती। हे नृपश्रेष्ठ इसी
का नाम है, 'पवित्रता'। अब तप की स्थिति बताता हूँ सुनो। शरीरशोषण को तप कहते हैं लेकिन वह प्रारब्ध
भोग के अनुरूप होता है। हृदय में कृष्णस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करना यही तप का शुद्ध रूप है। जिस प्रकार
'वीरश्री' का मद आँखों पर चढ़ते ही वह पुरुष अपनी दृष्टि अग्रभाग पर केन्द्रित कर रण में पराक्रम करने के
लिये अग्रसर होता है, उसी प्रकार हृदय में ईश्वर को धारण कर जो संसार में विचरण करता है वही सच्चा
'तपस्वी' है। यही तप का सच्चा स्वरूप है और इसी का नाम है शुद्ध 'तप'। इससे अधिक इसके स्वरूप के
सम्बन्ध में कहना कठिन है। फिर व्यर्थ की बकवास किसलिये ? मुमुक्षु में द्वंद्व सहिष्णुता होनी चाहिये। इसी का
नाम 'तितिक्षा' है। हे नृपवर्य ! स्मरण रखने के लिये उसे भी सुन लो। दीवार पर बने शेर और शेरनी के चित्र के
बीच में एक दीवार ही रहती है उसी प्रकार सुख और दुःख इन दोनों भोगों के बीच भी अपना ही शरीर अखण्ड
रहता है। जिस प्रकार दावाग्नि से अथवा ग्रीष्म की तपन से आकाश नहीं झुलसता, वह तपन से अलिप्त ही
रहता है पानी ठंडा हो या बर्फ ही गिरती रहे लेकिन पृथ्वी अपनी सहनशीलता के कारण काँपती नहीं है उसी
प्रकार आत्मस्वरूप के सुख के कारण सच्चा साधु भी द्वंद्व में लिप्त नहीं होता, शरीर ठंडक से ठिठुरता भी हो तो

तृतीय अध्याय ७७
भी साधु नहीं ठिठुरता, अत्यन्त गर्मी से शरीर तप्त होता है लेकिन उस देह के ताप के कारण साधु गरम नहीं
होता। सुख को देखकर वह उसे जितनी खुशी से आलिंगन देता है उतनी ही प्रसन्नता से वह दुःख भी सहन
करता है। राजा ! इसी का नाम है सच्ची 'द्वंद्व सहिष्णुता'। सामने से गुलेल का पत्थर आकर लगता है तो दुःख
होता है लेकिन वही पत्थर सोने का हो तो दुःख के स्थान पर अपार आनन्द होता है। सुख या दुःख को व्यक्त
करने वाला तत्व एक ही है। उससे एकता होने पर साधक सुखपूर्वक द्वंद्व सहन करते हैं। उसी प्रकार द्वंद्व का
अनुभव जिस ज्ञान को होता है उसे जान लेने पर द्वंद्व की परिणति निर्द्वंद्व में होती है। कड़े गन्ने में और उसके रस
में जिस प्रकार अखण्ड मिठास रहती है उसीप्रकार द्वंद्व में 'चिद्धन वस्तु' को वह देखता है। ऐसी यह अखण्डता
जब तक साधक के हाथ नहीं लगेगी, तब तक हे राजाधिराज ! ये द्वंद्व सचमुच ही सहन नहीं होंगे। इसी का नाम
द्वंद्वसहन या 'तितिक्षा' है। अब 'मौन' का क्या लक्षण होता है उसे ध्यान से सुनो। लोगों में वाद-विवाद करने से
देहाभिमान दृढ़ होता है किन्तु सद्गुरु ने उस अभिमान को शब्दों के साथ ही समूल नष्ट कर दिया। सद्गुरुं के
वचन कान में पड़ते ही स्तुति और निन्दा दोनों को निगल कर मुख से बोल नहीं निकलते। हृदय में तितिक्षा भर
जाती है। किसी का अवगुण कहने लगो तो वहाँ अपनी ही मूरत दिखायी देती है। इसीलिये किसी को कठोर
वचन कहते समय गुरुवचन से वह मौन हो जाते हैं क्योंकि स्वयं ही स्तव्य, स्तविता और स्तवन होने के कारण
अपना ही स्तवन करना मूर्खता ही होगी। जहाँ अपनी आत्मा नहीं हो ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ-जहाँ जो
भी दिखाई देता है वह निरन्तर आत्मप्रकाश के ही कारण दिखाई देता है। सद्गुरु ने ऐसी युक्ति बता दी और वह
विश्वास के कारण अंतःकरण में इस प्रकार स्थिर हो गयी जिससे वह वाचा से निन्दा या स्तुति करता ही नहीं
है। अगर अपने हित के लिये कुछ संवाद करना भी चाहता है तो, सद्गुरु के भाषण के आगे वेदशास्त्रों की
युक्तियाँ भी कुंठित हो जाती हैं। इस प्रकार स्तुति, निन्दा अथवा विवाद ही समाप्त हो जाता है। ऐसे महामौन के
कारण साधकों को परमानन्द की प्राप्ति होती है। ऐसा महामौन साध्य होने के लिये सद्गुरु वेदाध्ययन कराते हैं
अथवा उपनिषद के अर्थ का विश्लेषण कर उसका अर्थज्ञान समझाते हैं। यदि इससे भी दृढ़ मौन प्राप्त करना हो
तो श्रीरामकृष्ण का नामस्मरण करने के लिये कहते हैं। नामस्मरण की अखण्ड गर्जना के आगे वेदार्थ भी उसके
सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। जिसकी वाणी निरन्तर रामनाम की गर्जना करती रहती है उसे दण्डवत
करने के लिए तीर्थ भी वहाँ उपस्थित होते हैं, बड़े-बड़े देवतागण उसका चरणस्पर्श करते हैं और यम स्वयं
उसके चरणों का तीर्थ अपने मस्तक पर लगाता है। अरे ! जिसे रामनाम का स्मरण कहते हैं वही साक्षात
'महामौन' है। वेदों ने नाम का पूर्ण स्तवन किया है, इसीलिये हरिनाम ही शुद्ध वेदाध्ययन है। तात्पर्य यह है कि
हरि का नामस्मरण करने से वेदाध्ययन का फल प्राप्त होता है। वेद अथवा नामस्मरण इसी का नाम 'स्वाध्याय'
है यह ध्यान में रखो। महाराज ! अब 'आर्जव' का लक्षण ध्यान से श्रवण करो। आर्जव वह है जो जीव में
जीवन रहता है अथवा वस्त्र में तंतु ऐक्यभाव से रहते हैं अथवा जैसे शक्कर का करैला बनाने से उसका माधुर्य
कम नहीं होता, उसी प्रकार विषम स्वभाव जीवों का भी यह अपने मृदु स्वभाव से रंजन करता है। चन्द्र की
चन्द्रिका भले ही वक्र हो लेकिन इसके कारण भीतर का अमृत नहीं छलकता। उसी प्रकार टेढ़े स्वभाव के लोगों
को देखकर भी उसकी मनोवृत्ति में परिवर्तन नहीं होता। वह किसी को भी नीच नहीं समझता सभी को अपना
मित्र, सगा-सम्बन्धी समझता है, मानों प्रत्येक प्राणिमात्र से उसका पुराना परिचय हो। निहाई तप्त लोहे को
सहारा देती है, हथौड़े का घाव भी सहन करती है, सँडसी से लोहे के टुकड़े को पकड़कर उस पर हथौड़े से
प्रहार करते हैं, उस लोहे के साथ वह लौहगुण से ही सम्बन्ध रखती है। उसी प्रकार जिसे सभी सगे हैं, ऐसा

जिसका स्वभाव है उसका नाम 'आर्जव' है। यह गुरुदीक्षा नितान्त अपूर्व है। (अब ब्रह्मचर्य के बारे में बताते
हैं) देवता, दानव, बड़े-बड़े ऋषि आदि को भी मदन ने अपना दास बना कर रखा है। इस मदन की मार बहुत
कठिन है। यह अत्यन्त दुर्धर अंतःकरण में काम का स्थायी निवास है तिस पर कामवृत्ति को दबाने का प्रयास
करता है। उसका मन ही उसे निष्काम नहीं रहने देता। लेकिन लोगों को वह ठगता है। लेकिन सद्गुरु की युक्ति
ऐसी नहीं है। उनके उपदेश से काम की कामनावृत्ति ही बदल जाती है। वे शिष्य को अखण्ड ब्रह्मचर्य का
उपदेश करते हैं। मदन के राज्य में स्त्री-पुरुष का भेद है लेकिन गुरुदीक्षा अलौकिक है। इस दीक्षा में स्त्री-पुरुष
दोनों माया अर्थात् मिथ्या है और विषयसुख केवल भ्रम है। इस पर कोई शंका प्रकट करता है—'जननेन्द्रिय ही
आनन्द का स्थान है।' यह वेदवचन क्या गलत है? इस पर समाधान इस प्रकार है। जो वेदों के पूर्ण ज्ञाता हैं वह
इसका विवेचन इस प्रकार करते हैं—'शक्कर का माधुर्य कैसा है' यह यदि कोई पूछे तो बताना कठिन है। उसे
शक्कर का एक कण चखने के लिये दिया जाता है। उसे चखने पर उस कण में जो मिठास है वही शक्कर की
पूरी राशि में है ऐसा मालूम होता है। इस प्रकार लोग परमानन्द सुख की मिठास जननेन्द्रिय के रूप में चखते हैं।
इसी उद्देश्य से वेदों ने जननेन्द्रिय को आनन्द का स्थान बताया है। वह जननेन्द्रिय सुख क्षणिक होता है लेकिन
उस सुख की नित्य स्थिति को जो संभोग के बिना ही बढ़ाते हैं उन्हें स्त्री-पुरुष मिथ्या मालूम होते हैं और वे
सहज ही संज्ञान हो जाते हैं। जिस मिठास को चखा वही शक्कर है उसी प्रकार मैथुन को ही परमानन्द मानकर
विषयांध लोग मैथुन के पीछे दौड़ते हैं। जननेन्द्रिय में ही परमानन्द की मिठास होती है यह मानकर मूर्ख
शिरोमणि निरन्तर स्त्री काम का दबाव सहते रहते हैं। शक्कर का यदि नारियल बनाया जाय तो उसका कवच,
गरी आदि सब शक्कर ही होता है। उसी प्रकार विषय सुख का कल्लोल मूलतः मूल परमानन्द से ही होता है।
कितने भी प्रकार के पकवान क्यों न बनाये जाएँ लेकिन उसमें जो स्वाद आता है वह शक्कर की मिठास के
कारण ही होता है उसी प्रकार विषय के प्रति जो आकर्षण उत्पन्न होता है, वह आत्मानन्द के माधुर्य के कारण
ही होता है। यह मूल आत्मस्वरूप की मिठास उनकी समझ में नहीं आती और वे विषयों का दबाव सहते रहते
हैं। किन्तु सद्गुरुकृपा अत्यन्त बलवान है। वह विषयों की सारी आसक्ति एक ओर खींच लाती है। इसलिये
विषय की आस्था सच्छिष्य के माथे पर नहीं चढ़ पाती। गुरुवचन पर निष्ठा होने के कारण स्त्रीभोग की
आसक्ति मिथ्या हो जाती है। मूलतः यह आत्मा और आत्मी नहीं होती। मूल तत्व का अनुभव होते ही 'अखण्ड
ब्रह्मचर्य' की प्राप्ति होती है। इसी का नाम उत्तम 'नैष्ठिक ब्रह्मचर्य' है। इस अखण्ड ब्रह्मचर्य का बोध सद्गुरु
करते हैं। हे चक्रवर्त्ति राजा! अब 'अहिंसा' का रूप सुनो। स्वप्न में, सुषुप्तावस्था में अथवा जागृतावस्था में भी
प्राणिमात्र पर वक्रदृष्टि नहीं करनी चाहिए। देखो, कहीं पैर पटकने से पृथ्वी को कष्ट न हो इसलिये वह अपने
पैर बहुत आहिस्ते से रखता है। कहीं आकाश चौंक न पड़े इसलिये वह जोर से पुकारता नहीं है। अपने वचनों
से सबको सन्तोष प्रदान करता है। वाणी में मानों अमृत ही भरा है। उसकी वाणी जब आकाश में प्रवेश हो
करती है तो मानो उस शब्दानन्द चमत्कार से सारा आकाश आत्मसुख से भर जाता है। इस प्रकार उसका पूरा
भाषण आनन्दमय रहता है। पानी में छलांग लगाने से कहीं वह दब न जाय इसलिये तरंग के अनुसार पानी की
धार न कटे ऐसे हिसाब से वह जल में गोता लगाता है। ऐसे विचार से वह पानी में डुबकी लगाता है जिससे
पानी का ताप दूर हो जाता है और इस प्रकार स्नान करने से जीवन से जीवन का ताप कम होता है। कहीं वायु
को भी कष्ट न हो इसलिये वह श्वासोच्छ्वास भी जोर से नहीं लेता। उस पर नियन्त्रण रख कर ही शरीर को
चलाता है। जिस प्रकार अपने ही शरीर पर आघात करने के लिए वह कभी हाथ नहीं उठाता उसी प्रकार

तृतीय अध्याय ७९
प्राणिमात्र पर हाथ चलाने की बुद्धि उसके मन में उत्पन्न नहीं होती। कहीं घूर कर देखने से प्राणियों के मन में
भय न उत्पन्न हो इसलिये प्राणिमात्र को प्राणी समझ कर उनकी ओर, क्रूर दृष्टि से नहीं देखता। सारे केश कहीं
दब न जायें इसलिये वह कभी अपने शरीर को नहीं रगड़ता। इस प्रकार भूतहिंसा के भय से अपने देह के
देहपन का भी अहंकार नहीं करता। प्राणियों को जरा भी दुःख होने से प्राणियों में वास करने वाले परमात्मा को
दुःख होगा, ऐसा जिसका दृढ़ विश्वास होगा, उसके ही मन में अहिंसा का वास होता है। प्राणियों को कायिक,
वाचिक तथा मानसिक ये तीन प्रकार के दुःख होते हैं। वे जहाँ निःशेष होकर विलीन होते हैं वहीं अहिंसा का
वास होता है। हे राजाधिराज ! इसी का नाम शुद्ध अहिंसा है यह ध्यान में रखो। हे नृपवर्य ! अब 'द्वंद्व साम्य' की
दशा का वर्णन करता हूँ, ध्यान से सुनो। सुख और दुःख भाग्य के अधीन हैं और वह भाग्य पूरी तरह शरीर के
माथे लिखा है, यह सोच कर हम सद्गुरु के उपदेश के अनुसार निश्चिंत होकर रह जाते हैं। भाग्य के अनुसार
देह सुख-दुःख का भोग सहता रहता है। मूर्ख व्यक्ति उसमें हर्ष या विषाद का अनुभव करता है किन्तु शिष्य
गुरुपदेश में तल्लीन होने के कारण उसमें से किसी भी बात का स्पर्श अपने शरीर को नहीं होने देता। देह के
सुख से सुखी होने से दुःख भी अपना प्रभाव जमाता है। ये बातें गुरु ने समझायी रहती हैं इसलिये वह उनसे
मुक्त रहता है। निरभिमानी पुरुष को दुःख के संयोग से दुःख नहीं होता, उसी प्रकार सुखसंभोग में सुख का भी
अनुभव नहीं होता। दोनों ही बातों से वह अलिप्त रहता है। छाया धूप में गरम होती है तो वह छाया से ही
शीतल हो जाती है। उसी प्रकार एक बार मन में यह विश्वास होने पर कि सुख और दुःख दोनों ही मिथ्या हैं,
जो प्राप्त है उसी में आनन्द मालूम होने लगता है। देह में रहकर भाग्य के अनुसार आचरण करने पर सुख या
दुःख बाधक नहीं होता। यह अलौकिक रहस्य श्रद्धावान शिष्य को ही प्राप्त होता है। श्रद्धा के बिना यह रहस्य
कभी हाथ में नहीं आता और जब तक यह रहस्य हाथ नहीं लगता तब तक सुख-दुःख के प्रति समभाव उत्पन्न
नहीं होता। जब तक देह में 'अहंभाव' दृढ़ है तब तक द्वंद्व की पीड़ा अत्यन्त भयंकर होती है लेकिन जो
गुरुपदेश से निरभिमानी हो जाते हैं उनके लिये ये द्वंद्व मिथ्या हो जाते हैं, इसे ध्यान में रखो। जिस प्रकार स्वप्न
की दरिद्रता अथवा अमीरी जागृत होने पर मिथ्या हो जाती है, उसी प्रकार गुरुभक्तों को आत्मसाक्षात्कार के
कारण द्वंद्व बाधा की वार्त्ता भी नहीं सुनायी पड़ती। बच्चों के खेल में एकादशी और पारन जिस प्रकार समान है,
उसी प्रकार गुरुपदेश के साथ वे सारे द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। चन्दन के सुगन्ध से जिस प्रकार बेर और बबूल
भी चन्दन बन जाते हैं, उसी प्रकार गुरुवचन के अनुभव से सारे द्वंद्व आत्मस्वरूप में ही लीन हो जाते हैं। चन्दन
के आसपास के पेड़ केवल शुष्क काष्ट होते हुए भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के मस्तक पर धारण किये जाते हैं।
वह सब सत्संग की महिमा है। सद्गुरु यही सबसे बड़ा सत्संग है। उनकी संगत से शिष्य का परिवर्तन हो कर
वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है। इस प्रकार गुरुवचनों पर विश्वास करने से 'द्वंद्व साम्य' प्राप्त होता है, यह भी
गुरुवचन ही है।
सर्वत्रात्मेश्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम् ।
विविक्तचीरवसनं संतोषं येन केनचित् ॥ २५॥
सद्गुरु के वचन पर विश्वास रख वह यही मानता है कि चारों ओर परमात्मा ही भरा हुआ है और इसी
आत्मबुद्धि को निश्चय से दृढ़ कर मन में विचार करता है। (वह विचार इस प्रकार है) मुझमें परमात्मा का वास
है इसीलिये यह स्थूल शरीर हिलता-डुलता है, बोलता है। उसी के पूर्ण चित्प्रकाश से यह विश्व विश्वरूप
मालूम होता है। उसके ही आत्मप्रकाश से मेरी दृष्टि को दृश्य दिखायी देता है। दृश्य-द्रष्टा-दर्शन रूप से स्वयं

८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
परमात्मा ही सुशोभित है। जो भी दृश्य दृश्यरूप में प्रगट होता है उसके अन्दर-बाहर आत्मस्वरूप ही भरा रहता
है। इसी अनुवृत्ति से वह सारी सृष्टि को जगमगाते हुए देखता है। उस समय जो भी भूताकृति उसे दिखायी पड़ती
है वह सब परमात्मस्वरूप ही है ऐसा उसे अनुभव होता है। इतना ही नहीं बल्कि त्रिभुवन का नियंता मैं ही हूँ
ऐसा स्फुरण उसमें होने लगता है। वह सोचता है मेरे ही आदेश से संसार चल रहा है, कलिकाल का नियंता मैं
ही हूँ, उत्पत्ति, स्थिति और लय करने वाला मैं ही हूँ। यह मूल अहंता सहज ही उत्पन्न होती है। पूर्वान्वय से
देखने पर उसे सर्वत्र अपना ही स्वरूप दिखायी देने लगता है। तब दृश्य-दर्शन-द्रष्टा यह त्रिगुट नष्ट होकर
'अहंकार' पिघल जाता है। तब परब्रह्म से एकत्व स्थापित होकर चारों ओर सच्चिदानन्द भर जाता है। ऐसा
विशुद्ध अनुभव गुरुपदेश से सच्छिष्यों को प्राप्त होता है। उस समय यह सुनकर कि भगवान वैकुण्ठ में हैं, उसे
कुछ विचित्र-सा लगता है। भगवान क्षीरसागर में रहता है यह सुनकर उसे अपार हँसी आती है। सचमुच, ऐसी
तिल रखने की भी जगह नहीं है जहाँ भगवान न हों। ऐसे उस ईश्वर को किसी एक स्थान का कहना सच्छिष्य
को नहीं पटता। वैकुण्ठ और क्षीरसागर जिसके प्रकाश से प्रकाशित होते हैं वह परमात्मा वैकुण्ठवासी अथवा
क्षीराब्धिवासी है यह कहना स्पष्ट रूप से ईश्वरत्व को नकारना है। जब सर्वत्र ईश्वर का वास है वहाँ उसकी
एकदेशी महिमा का वर्णन करना उचित नहीं होगा। वह अनाश्रमी पूर्ण ब्रह्म है, वह वैकुण्ठादि आश्रम से कभी
भी बँध कर नहीं रह सकता। जो सब में अखण्ड भरा हुआ है उसे 'आवाहन', जो सबका अधिष्ठान है उसे
'आसन', जो सर्वव्यापी है उसके लिये सिंहासन की कल्पना करना, स्थान की कल्पना करना केवल कल्पना का
खेल है। लेकिन ऐसी कल्पना करनेवाली अपनी प्रवृत्ति भी ब्रह्मरूप है यह जो नित्य देखते हैं उनकी
परब्रह्मस्थिति कभी विचलित नहीं होती। यदि वास्तव में ऐसी परब्रह्मस्थिति प्राप्त करनी है तो साधक को द्वैत की
भावना त्याग कर प्रतिदिन एकान्त में बैठना चाहिये। परमार्थ की साधना करते समय साधक को अन्न और वस्त्र
की अड़चन हो तो उसे ऐसे वस्त्र लेने चाहिये जिसके लिये धन आवश्यक न हो, जिन्हें दूसरों ने त्याग दिया है
ऐसे फटे-पुराने वस्त्र भी चल सकते हैं। उसे साग-सब्जी, फल-फूल, कंद आदि भक्षण कर अपना पेट भरना
चाहिये लेकिन परमार्थसाधन छोड़कर अन्न-वस्त्र अथवा धन प्राप्त करने नहीं जाना चाहिये। भले ही हाथ में
झोली लेकर भिक्षा माँग ले लेकिन अन्न-वस्त्र के लिए जीवन खर्च नहीं करना चाहिये। ज्ञानी साधक कभी भी
अन्न अथवा आच्छादन के लिए प्रयास नहीं करते। देह भाग्य के अधीन है, भाग्य ही उसका सहज पालन करता
है। हम भले ही रात-दिन परिश्रम करें लेकिन यदि भाग्य में नहीं हैं तो हाथ में एक कौड़ी भी नहीं लगती। ज्ञानी
साधक यह बात जानते हैं। इसलिये भाग्य से जो भी मिल जाय उस पर अपना निर्वाह कर साधक सदा निश्चिंत
रहते हैं और प्रसन्नतापूर्वक, गुरुवचन के अनुसार परमार्थ साधते हैं। देह के भाग्य के अनुसार सुख-दुःख की
घटनायें होती रहती हैं, उसमें साधकों को सन्तोष प्राप्त होता है क्योंकि उन्हें गुरुवचनों का चस्का लगा रहता है।
शरीर को उसके भाग्य के अनुसार अन्न-वस्त्र मिलता रहता है लेकिन गुरुवाक्य का सुख छोड़कर मन कभी भी
शरीर की ममता के वश में नहीं रहता। याचना किये बिना यथासमय सहज ही जो कुछ प्राप्त हो जाय उसे उत्तम
मानकर वह गुरुवचन के अनुसार उसका सेवन करता है। शरीर निर्वाह के लिये वह किसी भी चीज की इच्छा
नहीं करता। जो कुछ मिलता है उसी में सुख मानकर वह आत्मानन्द में तृप्त रहता है। भाग्य के अनुसार सुख-
दुःख भोगते समय साधक के मन को संतोष ही होता रहता है। यह अनुभव उस शिष्य को गुरुवचनों पर विश्वास
रखने से ही प्राप्त होता है। यही विश्वास दृढ़तर होने के लिए गुरु के पास आग्रहपूर्वक बैठकर पूर्ण निश्चय के
साथ ज्ञानदायक भागवत शास्त्र का अध्ययन करना चाहिये।

तृतीय अध्याय ८१
श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापिहि।
मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २६ ॥
जिसमें भगवान के सगुण अथवा निर्गुण स्वरूप का वर्णन रहता है, अथवा जिसमें भगवान ने कुछ कहा
होता है अथवा जिसमें भगवद्गुणानुवाद का वर्णन रहता है, उसे हे राजा ! तुम 'भागवत शास्त्र' समझ लो।
साधक उसे प्राणों से भी प्रिय मानते हैं। उसमें भी विशेषरूप से ज्ञान के निरूपण से उन्हें विशेष प्रेम रहता है,
उन्हें वह बहुत अच्छा लगता है। गुरुमुख से सुना हुआ ज्ञान का निरूपण उन्हें अत्यन्त मधुर लगता है और इस
प्रकार श्रीभागवत पर उनकी दृढ़ श्रद्धा रहती है। उसके श्रवण से उनका मनोरथ पूर्ण होकर विषयों की इच्छा दब
जाती है। मन में विषय के प्रति रुचि न होने पर भी साधक के लिये विषय बाधक होते हैं और उससे उन्हें
अनुताप होता है। विषयावस्था अनिवार्य होने के कारण उसका त्याग नहीं हो पाता, इसलिये मुमुक्षु के मन को
अनुताप से अत्यन्त व्यथा होती है। वास्तव में विषय से अत्यन्त प्रेम न होते हुए भी स्वयं विषय का त्याग करना
सम्भव नहीं होता। ऐसे साधकों के लिए शास्त्रों ने कुछ नियम निर्धारित कर दिये हैं। विषय के प्रति आसक्ति
नहीं है फिर भी विषय से निवृत्ति भी नहीं हो पाती, ऐसी स्थिति साधकों की रहती है। उनके लिये शास्त्रों ने कुछ
नियम बनाये हैं। जो केवल विषयासक्त रहता है वह शास्त्र की बात कभी नहीं मानता अथवा जो जीवनमुक्त
हुआ रहता है वह भी शास्त्र की बात मान्य होते हुए भी उसे स्वीकार नहीं करता। जो मुक्त हैं वे विषय को
मृगजल की तरह मानते हैं। फिर वे मृगजलवत् विषय की निवृत्ति के लिये किस शास्त्र के नियमों का पालन
करें ? सारांश यही है कि जो अत्यधिक आसक्त रहते हैं उन पर तथा जो विशुद्ध विरक्त होते हैं उन पर भी शास्त्र
का कोई नियम लागू नहीं होता। केवल मुमुक्षु पर ही शास्त्र के नियम लागू होते हैं। गुरु शिष्य का संवाद होता है
उससे ज्ञानार्थ का बोध होता है, लेकिन उस बोध में विषयबाधा आड़े आती है। वह न आये इसके लिये शास्त्रों
के नियम प्रसिद्ध हैं। मानसिक, वाचिक तथा कायिक कर्म के अनुसार—विषयबाधा तीन प्रकार की होती है। उन
तीनों के लिये शास्त्रों ने तीन प्रकार के नियम बनाये हैं। मन के लिये 'शम' अर्थात् शान्ति का नियम, इन्द्रियों के
लिये 'दम' अर्थात् निग्रह का नियम तथा वाणी के लिये 'सत्य' का नियम इस प्रकार तीन नियम बनाये हैं।
विषय कामरूप हाथी 'अहं' के मद से उन्मत्त होकर यौवन के नशे में विधि का बन्धन तोड़ देता है। चाहे सुहृद
हो, राजा हो अथवा गुरु हो वह इन सबको झटक देता है। सूँड़ से स्वर्ग के शिखर को लपेट लेता है और
लबालब भरी हुई नरक की नदी में डुबकी लगाता है। यदाकदा धर्म के जल से उसे स्नान भी कराया जाय तो
वह लोभ की धूल अपने मस्तक पर डाल लेता है और ब्रह्मदेव सरीखे देवताओं को पछाड़ कर वह ममता की
गर्जना करता है। विवेकरूपी महावत ही उस समय उसके मस्तक पर चढ़ सकता है और शास्त्रविधि के अंकुश
से उस पर नियन्त्रण कर सकता है। उस पर वैराग्ययुक्त 'उपशम' का पहरा बिठा कर विवेकरूपी महावत उसे
'दम' के शृंखलाबन्ध से उसे काबू में लाता है और उसे सत्य के खम्भे से कसकर बाँध देता है। मानसिक,
वाचिक तथा कायिक कर्मों से विषयों की अत्यधिक बाधा होती है। उन तीनों के लिये तीन प्रकार के नियम
बनाये हैं। राजा ! उन नियमों का मर्म सुनो। 'शम' की स्थिति यह है कि वह विषय से आसक्ति हटा कर मन
बुद्धि आदि जो चित्तवृत्तियाँ हैं उन्हें परमार्थ की ओर मोड़ता है। पूर्व में सूर्य के उदय होते ही जिस प्रकार
अन्धकार त्रिभुवन को छोड़कर चला जाता है उसी प्रकार गुरुपदेश से 'शम' प्राप्त होते ही मन से अपने आप
विषय की निवृत्ति होती है। जब गुरुपदेश के अनुसार 'दम' बाह्य इन्द्रियों की प्रवृत्तियों को दबा देता है तो फिर
शम की संगति से इन्द्रियों के कर्मों की निवृत्ति होती है। कन्या का पालन-पोषण कर उसे दामाद को दान देने के

८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाद जिस प्रकार कन्या बाप के कुलगोत्र को छोड़ देती है उसी प्रकार दम की सहायता से इन्द्रिय विषय का त्याग
करते हैं। कहीं 'वाणी' बहकना न शुरू करे इसलिये उसे 'सत्य' की बेड़ी पहनाकर अत्यन्त शुद्ध और स्थिर कर
देते हैं। "जो सत्यवक्ता है उसे ब्रह्मादि देवता भी वन्दन करते हैं और असत्य बोलने वाले को अधोगति प्राप्त
होती है।" इस आशय का जो प्रतिपादन करते हैं, वे भी झूठ बोलते हैं। लेकिन रामनाम के बार-बार उच्चारण
करने से जो वाचा पवित्र हो जाती है, वह भविष्य में कभी भी कल्पांत में भी असत्य में नहीं डूबेगी। मथ कर
निकाला हुआ मक्खन पुनः मट्ठे में डालने पर भी वह उसमें नहीं डूबता उसी प्रकार नाम से वाणी पवित्र होने पर
असत्य कभी उसका स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार सूर्य के किरण लगते ही घी की कनी पिघलने लगती है उसी
प्रकार सत्य के निश्चय के सामने असत्य चौंधिया जाता है और समूल नष्ट हो जाता है। चन्दन वृक्ष के सात्रिध्य
से खैर और बैर के वृक्ष भी अपने सामान्य काष्टगुण से वंचित होकर चन्दनरूप हो जाते हैं उसी प्रकार नाम के
गजट से वाणी में निजसत्व प्रगट होता है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से जुगनू लुप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार
रामनाम के प्रभाव से असत्य का अपने आप लोप हो जाता है। अमावस्या के बाद प्रतिपदा को जब चन्द्रमा अँधेरे
को हटाकर प्रगट होता है तब प्रकाश का समूह संसार में प्रगट होता है। उसी प्रकार असत्य का प्रभाव होने के
कारण वाणी भी सत्य के संभ्रम से प्रगट होती है या जिस प्रकार राजा की आज्ञा से प्रजा भी अपने धर्मानुसार
आचरण करती है। सत्य से अच्छा कोई तप नहीं है, सत्य से अच्छा कोई मार्ग नहीं है क्योंकि सत्य से सद्रूप की
प्राप्ति होती है और सत्य से ही साधक निष्पाप हो जाते हैं। इस प्रकार काया, वाचा तथा मन से जो शम, दम और
सत्य इन तीन प्रकारों से नियमों का पालन करता है, उसके विषय तत्काल भाग जाते हैं। इस प्रकार का स्वार्थ
साधने के लिये अंतःकरण में भगवच्छास्त्र के प्रति रुचि रखनी चाहिये। लेकिन द्वेषभावना से दूसरे शास्त्रों की
निन्दा भी नहीं करनी चाहिये। एक की स्तुति और दूसरे की निन्दा करने से दोष लगता है। इसलिये साधक निन्दा
की राह पर नहीं चलते। अर्धांगी लक्ष्मी का वन्दन करें और पैर से गंगा निकली है इसलिये क्या उसकी निन्दा
करें ? अपनी माँ को नमस्कार करना तथा अन्य स्त्रियों को लतियाना क्या उचित है ? अपने आराध्य देवता का
भजन करना चाहिये किन्तु वह भी निन्दा और स्तुति इन दोनों को त्याग कर जो निजसत्य धारण कर मौन का
आश्रय लेता है वही ब्रह्मज्ञान का अधिकारी होता है। इतना प्रयास न कर, कष्ट न सहकर यदि एकनिष्ठा से
भगवद्भक्ति की जाय तां हरि भक्तों को अनायास ही मुक्ति प्राप्त होती है। हे राजा ! उस भक्ति का सच्चा स्वरूप
क्या है और हरिभक्त किस प्रकार सुलभ ढंग से परमपद प्राप्त करते हैं, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः।
जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम् ॥ २७॥
भक्ति का मुख्य साधन यह है कि श्रीहरि का दिव्य जन्म, दिव्य गुण तथा दिव्य कर्म आदि का पूर्ण श्रद्धा
से श्रवण किया जाय और आनन्दपूर्वक कीर्तन किया जाय। हरिकीर्तन के सामने अन्य सभी साधन बिलकुल
निम्न श्रेणी के हैं। हरि की लीलाएँ अत्यन्त महान और अद्भुत हैं। उनका गायन करने से मन को अत्यन्त प्रसन्नता
होती है। समुद्र में पाषाण तैराये, हाथ से गोवर्धन पर्वत उठाया, बिना किसी की नींद खराब किये मथुरा को
द्वारका ले आये। गुरु के मृत पुत्र को जीवित कर दिया, मुख से दावाग्नि निगल लिया, माँ के सन्तोष के लिये
कंस द्वारा मारे हुए उनके गर्भों को लाकर दिखलाया। अजन्मा होते हुए असंख्य जन्म लेने वाला, अकर्मा होते हुए
अद्भुत कर्म करने वाला तथा अगुणी होते हुए गुणों में विचरण करने वाला वह श्रीपति, उसके गुणकर्मों का वर्णन

तृतीय अध्याय ८३
करने से उसे अतीव सन्तोष प्राप्त होता है। मूलतः वह आनन्दघन है, तिस पर कीर्तन में उसकी गुण कर्म लीला
गाने से वह प्रसन्न होकर डोलने लगता है। इस प्रकार कीर्तन में हरि की कीर्ति गाने से चित्त की वृत्तियाँ निर्मल हो
जाती हैं और उस वृत्ति में ध्यान की मुद्रा स्थिर हो जाती है। राजा ! वह ध्यानस्थिति बताता हूँ, सुनो। मस्तक पर
मुकुट, कान में कुण्डल, कमर में मेखला (कमरबंद) तथा जरी का पीताम्बर पहना हुआ तथा गले में आपाद
वैजयंतीमाला, ऐसा वह मेघश्याम सुशोभित होता है। ऐसी वह मनोहर, सुन्दर, सगुण मूर्ति मनश्चक्षु के सामने
प्रगट हो जाती है, अथवा नामरूप गुण का त्याग कर निर्गुण स्वरूप अर्थात् परिपूर्ण ब्रह्म शुद्ध चैतन्य का
अंतःकरण में स्फुरण होने लगता है। ऐसी मूर्ति मन में स्थिर होते ही भक्त की बाह्य क्रिया कृष्णार्पण हो जाती है,
यहाँ तक कि स्त्रीपुत्र आदि भी पूरी तरह कृष्णार्पण हो जाते हैं।
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम्।
दारान्सुतान्गृहान्प्राणान्यत्परस्मै निवेदनम् ॥ २८ ॥
अग्निहोत्रादिक 'याग' और होम, ग्रहण आदि में किया हुआ उत्तम 'दान' तथा 'तप' अर्थात् वर्णाश्रम के
अनुसार यथोचित किया हुआ जो स्वधर्म है, वेद शास्त्रों के अनुसार किया हुआ आचरण, विधि विधान के
अनुसार गुरुदीक्षा लेकर प्राप्त किया हुआ शुद्ध मंत्र अथवा केवल भगवान के नाम के मंत्र का जाप आदि सब
अर्थात् यज्ञ, दान, धर्माचरण तप-दीक्षामंत्र अथवा नाम का जाप निर्विकल्प मन से कृष्णार्पण करना चाहिये। इस
प्रकार का आचरण कर जो अनन्य भाव से हरि की शरण में जाते हैं वे हरि के प्रेम के पात्र हो जाते हैं और जिस
प्रकार माँ अपने नन्हें बालक का पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार श्रीहरि उनका पालन-पोषण करता है।
इसलिये उदर निर्वाह के जो उद्योग हों उन्हें भी कृष्णार्पण ही करना चाहिये। जो भक्त ज्ञान से सम्पन्न होते हैं वे
कभी भी 'यह मेरा है' कहकर उसके प्रति मन में अहंकार नहीं धरते। मन में जिसके प्रति अत्यन्त रुचि रहती है,
जिसके प्रति अत्यन्त प्रेम रहता है, वह सब गुरुवचनों पर विश्वास कर कृष्णार्पण कर देते हैं और इसके लिए
आठों पहर अपना शरीर सेवा में खर्च करते हैं। क्षणभर के लिये भी वे विषयाकार व्यापार नहीं करते। अन्न के
लिए पागल होकर वे धनिकों के पैर नहीं छूते हैं। विषय की इच्छा से वे अपना जीवन कौड़ियों के भाव नहीं
बेचते हैं। लाखों रुपया खर्च करने पर भी जीवन का आधा हिस्सा भी प्राप्त नहीं होगा। ऐसे अमूल्य जीवन से
भक्त केवल परमार्थ अर्जित करता है और विषयों की राशि पर थूकता है। राजा भी राज्य का वैभव त्याग कर वन
में चले जाते हैं तथा विषयासक्ति त्याग कर परमार्थ की साधना करते हैं। पूर्ण भक्ति की महिमा का वर्णन किन
शब्दों में किया जाय ? सच्चा भक्त एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता, वह सारा जीवन ही कृष्णार्पण कर देता है।
उसी प्रकार पुत्र, स्त्री आदि जो भी कोई हों उन्हें तथा स्वयं को वह भगवत्सेवा के लिये अर्पण करता है।
पुत्रदारादिक 'मेरे' हैं ऐसी ममता वह मन में कभी नहीं पालता। स्त्री, पुत्र, अपनी काया, घर तथा प्राण आदि में
अंतर्बाह्य परमात्मा ही भरा हुआ है यह वह देखता है और बिना संकल्प के अर्थात् 'अर्पण करता हूँ' कहे बिना
ही सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है।
एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।
परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ २९ ॥
इस प्रकार जो स्त्री, गृह, देह तथा सम्पत्ति ये सब शुद्ध श्रद्धा से आत्मार्पण कर सदासर्वदा भजन करते हैं वे
ही भक्त श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय होते हैं। समस्त प्राणिमात्र के हृदय में वास करने वाला जो परमात्मा भगवान

८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीकृष्ण है उसे स्वहित साधने के लिये जो पूरी तरह भजता है, उसकी उस निर्गुण परमात्मा के प्रति जब तक
दृष्टि स्थिर नहीं होती, तब तक उसे सर्वात्मभावना से सगुण मूर्ति का ही हृदय में ध्यान-भजन करना चाहिये।
यदि ध्यान में सगुण मूर्ति भी ठीक तरह से न आ रही हो तो प्रतिमा का ही ध्यान भजन करना चाहिये। उपासक
लोग अपने घरों में जिसकी पूजा करते हैं, उन्हें 'चलमूर्ति' समझना चाहिये और द्वारकादि क्षेत्र की पुराणकाल से
प्रसिद्ध मूर्ति को 'अचलमूर्ति' समझना चाहिये। उन मूर्तियों से भी श्रेष्ठ स्थान 'ब्राह्मण' का है। वे पूरी तरह पूज्य
हैं। उनका सर्वकाल, सभी प्रकार से भजन करना चाहिये। उन ब्राह्मणों में भी सदाचार सम्पन्न 'श्रोत्रिय' अर्थात्
वेदों के जानकार ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उनसे भी श्रेष्ठ और पूज्य हैं वे जो वेद शास्त्रार्थ प्रवीण हैं। उनमें भी जो
'भागवत' अर्थात् भगवद्भक्त होने के साथ-साथ भागवत धर्म में तत्पर हैं, जो निष्काम भाव से भगवद्भक्ति करते
हैं तथा जिनकी श्रीकृष्ण पर पूर्ण श्रद्धा है, जिनका हृदयस्थ श्रीकृष्ण ही आत्मा, श्रीकृष्ण नाथ ही जिनका
अनन्यस्वामी हैं ऐसे जो पूर्ण भगवद्भक्त हैं वही वास्तव में भक्तों को पूज्य हैं। जिसके देवता, मानव और वेद
भी स्तुतिपाठक चारण होते हैं वह 'सद्गुरु' अत्यन्त महानता के कारण शिष्य को सभी प्रकार से, सब से अधिक
पूज्य हैं। गुरु और ब्रह्म इन दोनों को एकसमान कहा जाय तो वह भी कम ही होगा क्योंकि गुरुवचन से ही ब्रह्म
को ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। देवता के प्रति जैसी भावना रखते हैं वैसी ही सद्गुरु के प्रति रखनी चाहिये। गुरु में
और देवता में भिन्नत्वभाव होता ही नहीं है। इसलिये देवता की पूजा करने से गुरु को सन्तोष प्राप्त होता है और
गुरु की पूजा करने से देवता को सन्तोष होता है। नाम दो होने पर भी वे प्रसन्नतापूर्वक एक ही स्वरूप में रहते
हैं। सोना और कंगन ये दो नाम होते हुए भी सुवर्ण एक ही है। उसी प्रकार गुरु में और ब्रह्मा में भेदभाव नहीं
होता। उस सद्गुरु का भजन तन, मन, धन से निष्कपट भाव से करना चाहिये। अपने सर्वस्व के साथ श्रीगुरु के
चरणों में आत्मार्पण करना चाहिये। उसी प्रकार साधु और ज्ञानसम्पन्न श्रोता को भी सद्गुरु समान ही मानना
चाहिये। उनके साथ संवाद कर श्रवण और निरूपण करते रहना चाहिये।
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः।
मिथोरतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥ ३०॥
ऐसे लोगों के पास कथानुवाद करते हुए परस्पर निजात्मबोध होता है और उस गुह्यज्ञानसंवाद से परमानन्द
छलकने लगता है। इस प्रकार हरिकथा में रुचि के कारण परस्पर श्रद्धा उत्पन्न होती है और वे परस्पर सुखसंवाद
करते हुए आत्मसुख का माधुर्य चखते रहते हैं। आत्मसुख का माधुर्य एक बार चखने से दुःखों की राशियों का
विलय हो जाता है। इस प्रकार भक्ति साम्राज्य की पताका फहरा कर साधकों को स्वानन्द साम्राज्य का उपभोग
लेना चाहिये। सद्भाव से अभेद भजन करते समय भक्तों को स्वानंद की पूर्ण प्राप्ति होती है। हे राजा! उस
स्वानंद का वास्तविक लक्षण बताता हूँ, सुनो।
स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
भक्त्या संजातया भक्त्या विभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ ३१॥
क्वचिद्रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचित् हसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः।
नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वृताः॥ ३२॥
हरिकथा की महिमा को भक्तिभावना से पूछने वाले तथा बताने वाले इन दोनों को ही बहुत पुण्य प्राप्त
होता है पाप औषधि के लिये भी नहीं मिलता। जिसके नामस्मरण मात्र से ही सारे पातक नष्ट हो जाते हैं, वह

तृतीय अध्याय ८५
स्वयं अंतःकरण में प्रविष्ट होते ही फिर पातक को कहाँ ठौर मिलेगा ? साधन रूप भक्ति की युक्ति से सप्रेम
भक्ति उत्पन्न होती है। हे ज्ञानसम्पन्न चक्रवर्ति राजा ! उस भक्ति की स्थिति बताता हूँ, सुनो। सद्भाव से की हुई
अभेद भक्ति से जब हृदय में श्रीहरि प्रकट होते हैं उस समय देह के बाह्य चिह्न भी बदलने लगते हैं। जब परस्पर
आध्यात्मिक संवाद शुरू होता है, उस समय अन्तर में स्वरूप का बोध. होता है, नेत्रों में अश्रु जमा हो जाते हैं,
शरीर पर पसीना चुहचुहाने लगता है और प्राणों की गति कुंठित हो जाती है। चित्त चैतन्य की भेंट होते ही
आनन्द से कंठ भर आता है, शरीर पर रोमांच उभरने लगते हैं तथा दृष्टि अर्धोन्मीलित होकर स्तब्ध हो जाती है।
अच्युत का चिन्तन करने पर वह प्रेम से सिहर उठता है, वह जोर-जोर से रोने लगता है, सिसकियाँ लेकर बेचैन
हो उठता है। रोने के साथ-साथ उसे हर्ष भी होने लगता है। हर्ष के उस आवेग में वह जोर-जोर से हँसने भी
लगता है। वह कहने लगता है, आज तक मैं देहाहंकार के कारण मोह-मद से ग्रस्त था, अब गुरुकृपा के बोध से
मुक्त हो गया हूँ और यह कहते हुए वह परमानन्द से डोलने लगता है। 'मैं' और 'मेरा' इस सांसारिक भावना से
मैं स्वयं को ही भुला चुका था। सद्गुरुवचन ने स्वयं को मुझसे मिलाया इस आनन्द से वह उल्लसित होता है।
सद्गुरु का वचन कितना आकर्षक है। उसके कारण ही मैं आत्मसुख का भोग करता हूँ। इस आश्चर्य से वह
स्वानंद से डोलने लगता है। जाने कैसे संसार के भूतों का भय लग रहा था। लेकिन गुरु वचन ने उसे वास्तव में
नष्ट कर दिया और यह कह कर वह लोकलज्जा का विचार न कर नाचने भी लगता है। माँ को देखकर जिस
प्रकार बालक विविध प्रकार से नाचने लगता है, उसी प्रकार गुरुवाक्य की महिमा का विचार मन में लाकर
निजभक्त अपनी ही तान में नाचने लगता है। आत्मबोध प्राप्त होने के कारण वह नृत्य विनोद से भगवान के पद
प्रसन्नतापूर्वक स्वयंसफूर्त होकर गाने लगता है। उस गुणानुवाद कीर्ति के गजर से सारा त्रिभुवन प्रसन्नता से भर
जाता है। उस आनन्दोद्गार से सन्तुष्ट होकर परमानन्द का अतिरेक हो उठता है। गाना छोड़कर वह अब जोर-
जोर से चिल्लाने लगता है। 'मेरा गाना मैं ही सुनूँ, यहाँ दूसरा कोई है ही नहीं' ऐसा ही कुछ वह कहता रहता है।
गानेवाला भी मैं ही और सुनने वाला भी मैं ही, मेरा गाना भी सचमुच मैं ही। सारे संसार में एक अकेला मैं ही।
द्वैत होते हुए भी द्वैत की बात नहीं, ऐसी उसकी स्थिति रहती है। भक्तिभाव से भगवान की सेवा करते रहने से
कर्मक्रिया अपने आप रुक जाती है। 'अहं-सोहं' समाप्त होकर वृत्ति का लय होता है। इस प्रकार प्रेमयुक्त भक्ति
बढ़ने से साधक का साधन-श्रम नष्ट हो जाता है। सांसारिक भ्रम दूर हो जाता है और चारों वाणियों के साथ
इन्द्रियों को शान्ति प्राप्त होती है। जहाँ एक भी नहीं है और दूजा भी नहीं है, आगे भी कुछ नहीं है और पीछे भी
कुछ नहीं है, जहाँ सुख भी आत्मसुख में विलीन हो जाता है यही स्वरूप निश्चित रूप से निज शिष्य का होता
है। बालक का लाड-प्यार किस प्रकार करना है यह उसकी माता ही जानती है, उसी प्रकार शिष्य को पूर्ण बोध
कराने की कला केवल सद्गुरु को ही मालूम होती है। बच्चे को अलंकार पहनाकर सजाने का समाधान भोगना
जैसी केवल माँ ही जानती है, उसी प्रकार शिष्य के सुख से सुखी होना केवल सद्गुरु को ही मालूम होता है।
इन्द्रियों को जिसका स्थान मालूम नहीं होता, मन और वाणी के लिये भी जो अगोचर है, बुद्धि जिसकी मर्यादा
रेखा नहीं जानती, ऐसी निर्विकार है निजवस्तु। जो दृष्टी को दिखलायी जा सके अथवा हाथ में दी जा सके, वैसे
परमार्थ को दिखलाया या दिया नहीं जा सकता लेकिन सद्गुरु शिष्य को उसका भी बोध करा देते हैं। शिष्य को
प्रबोधन करने की दृष्टि से सद्गुरु विचित्र उपदेशक है। इसलिये शिष्य के सुख से गुरुराज इस स्वानन्द का भोग
करता है। शिष्य को जैसे-जैसे परब्रह्म की प्राप्ति होने लगती है, वैसे-वैसे उसका भ्रम दूर होने लगता है, इससे
सद्गुरु का सुखसंभ्रम भी बढ़ने लगता है। रणभूमि पर सेनापति शत्रु की सेना ध्वस्त करता है तो इधर राजा यश